वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
वृत्तिव्याप्तेरावश्यकता ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८१
दो पदार्थों की एकता होना अशक्य है । परन्तु उस 'तत्' और 'त्वम्' पदों के लक्ष्य ( चैतन्य ) तो सन्निकृष्ट ही हैं । इसलिये 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न हुई अन्तःकरण-वृत्ति के स्वीकार करने में कोई बाधक नहीं है । इसी कारण लक्ष्यचैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य को एकदेशस्थित दो उपाधियों से अवच्छिन्नत्व है । इस प्रकार उन दो चैतन्यों का अभेद होने से 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है । इस ज्ञान में प्रमाता ही विषय होने से ( उस वाक्यजन्य ज्ञान में प्रमातृ पद को—'तत्त्वं' पद से लक्ष्यभूत चैतन्य को—ही विषयत्व होने से ) विषय चैतन्य और वृत्ति चैतन्य का ऐक्य ( एकता ) हो पाता है ।
शंका—'तत्त्वम्' पद से लक्ष्यभूत ब्रह्म शास्त्रजन्यज्ञान का विषय है—यह कहने पर 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' आदि श्रुतियों की क्या गति है ?
समाधान—यह श्रुति विज्ञाता के 'फलव्याप्यत्व' का निराकरण करती है । वह उसके 'वृत्तिव्याप्यत्व' का निराकरण नहीं करती । पंचदशीकार कहते हैं—'फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् । ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ॥'
इन्द्रियसन्निकर्ष के कारण अन्तःकरण की घटादिविषयाकार वृत्ति के उत्पन्न होने पर उसमें चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है । उस 'चैतन्य' को 'फल' कहते हैं । चैतन्य-प्रतिबिम्ब से युक्त हुई वृत्ति, विषय को व्याप्त करती है । इस कारण उस वृत्ति के साथ फलरूप चैतन्य की व्याप्ति भी सिद्ध ही है । ऐसा होने से घटादि जड़ विषयों को फलव्याप्यत्व है । परन्तु वह फलव्याप्यत्व 'ब्रह्म' में नहीं बन पाता । कारण—ब्रह्म, साक्षात् चैतन्यात्मक है । इस कारण वृत्ति के साथ रहनेवाला चैतन्य भी चिद्रूप ब्रह्म में किसी प्रकार का अतिशय पैदा नहीं कर सकता । दूसरी बात यह भी है कि ब्रह्म में फलव्याप्ति के मानने पर वह ब्रह्म जड़ हो जायगा । कारण जड़ में ही फलव्याप्ति का सम्भव होता है और जड़ के साक्षात्कार के लिए उसकी आवश्यकता भी होती है इससे 'तत्त्वमसि' सुनने पर पैदा हुई वृत्ति के द्वारा ब्रह्म के व्याप्त होने में किसी प्रकार का दोष नहीं है । प्रत्युत, किसी पदार्थ के अज्ञान की निवृत्ति हुए बिना उसका भान (ज्ञान) नहीं होता और अज्ञान की निवृत्ति, अन्तःकरण की वृत्ति के द्वारा ही होती है । इसलिये ब्रह्मविषयक अज्ञान की निवृत्ति के लिए अन्तःकरण-वृत्ति को स्वीकार करना ही चाहिये, यह कारिका का आशय है ।
इस पर शंका—
ननु वाक्यजन्य-ज्ञानस्य पदार्थ-संसर्गावगाहितया कथं निर्विकल्पकत्वम् ?
अर्थ—वाक्यजन्यज्ञान को पदार्थसंसर्गविषयत्व होने से निर्विकल्पकत्व कैसे ?
१. 'सोऽयं देवदत्तः इत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं संसर्गावगाहि वाक्यजन्यज्ञानत्वात्, गामा-नयेति-वाक्यजन्यज्ञानवत् ।'
| ८२ | वेदान्तपरिभाषा | [ वेदान्तानामखण्डार्थत्वम् |
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विवरण—( १ ) 'वह^१ यह देवदत्त' आदि वाक्यजन्यज्ञान संसर्गावगाहि है—( संसर्ग को विषय करनेवाला है ), ( २ ) क्योंकि उसमें वाक्यजन्यज्ञानत्व है, ( ३ ) 'गो को लाओ' इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञान की तरह । अथवा^१—( १ ) 'वह यह देवदत्त' वाक्य से पैदा हुआ ज्ञान निर्विकल्पक नहीं है, ( २ ) क्योंकि उसमें संसर्गावगाहित्व है, ( ३ ) 'गो को लाओ' आदि वाक्यजन्य ज्ञान की तरह । इस आशय से यहाँ पर यह शङ्का की गई है । वाक्य से होने वाला ज्ञान उस वाक्यगत प्रत्येक पद के अर्थ के परस्पर सम्बन्ध को विषय करता है । जैसे—'गो को लाओ' इस वाक्य में 'तू' पद 'लाओ' क्रिया के साथ 'कर्तृत्व' रूप से सम्बन्धित होता है । और 'गो' पद, उस क्रिया के साथ 'कर्मत्व' रूप से सम्बन्धित होता है । और 'त्वत्कर्तृक-गोकर्मक-आनयन' इत्याकारक शाब्द बोध होता है । इसलिये यह संसृष्ट वाक्यार्थ है ।
वाक्यजन्य सभी ज्ञान, प्रत्येक पद के अर्थ में स्थित परस्पर कर्तृत्वादि संसर्ग को विषय करते हैं । ऐसी स्थिति में उसे निर्विकल्पकज्ञान कैसे कहा जा सकता है ? जो ज्ञान, विशिष्ट का ग्रहण करे वह 'सविकल्पक' होता है, जैसे—यह डित्थ है, यह ब्राह्मण है, यह श्याम है, यह पाचक है आदि ज्ञान । इस आकार का जो नहीं हो वह 'निर्विकल्पक' ज्ञान कहा जाता है । वाक्यजन्यज्ञान को संसर्गावगाहि होने से उसमें निर्विकल्पकत्व कैसे ?
उच्यते। वाक्यजन्य-ज्ञानविषयत्वे हि न पदार्थसंसर्गत्वं तन्त्रम्, अनभिमतसंसर्गस्यापि वाक्यजन्य ज्ञानविषयत्वापत्तेः, किन्तु तात्पर्यविषयत्वम् ॥
अर्थ—उपर्युक्त शङ्का का समाधान बताया जाता है—वाक्यजन्यज्ञान के विषयत्व में पदार्थों का संसर्गत्व, तन्त्र ( प्रयोजक-निमित्त ) नहीं है । कारण यह है कि वाक्यजन्य-ज्ञानविषयत्व में पदार्थसंसर्गत्व को ही प्रयोजक मानने से वक्ता के द्वारा अनभिप्सित संसर्ग को भी वाक्यजन्यज्ञानविषयत्व होने का प्रसंग आवेगा । अतः वक्ता के तात्पर्य का जो विषय हो वही वाक्यजन्यज्ञान का विषय है, अर्थात् तात्पर्यविषयत्व को वाक्यजन्यज्ञानविषय में प्रयोजकता है ।
विवरण—वाक्यजन्यज्ञान के विषय-निर्धारण में पदार्थसंसर्ग यदि निमित्त रहता तो वाक्यजन्यज्ञान को निर्विकल्पक नहीं कहा जाता । वस्तुतः पदार्थसंसर्ग में वाक्यजन्यज्ञान की विषयता है ही नहीं ( पदार्थसंसर्गविषयत्व, वाक्यजन्यज्ञान में प्रयोजक नहीं है ) क्योंकि पदार्थसंसर्ग को ही यदि वाक्यजन्यज्ञान में प्रयोजक मानें तो वक्ता को अनभिमत ऐसे अश्वादिसंसर्ग को भी वाक्यजन्यज्ञानविषयत्व प्राप्त होगा । भोजन
१. 'सोऽयं देवदत्तः इत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं, निर्विकल्पकं नास्ति, संसर्गावगाहित्वात्. गामानयेतिवाक्यजन्यज्ञानवत् ।'
वेदान्तानामखण्डार्थत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८३
के समय 'सैन्धवमानय' वाक्य में वक्ता को असंमत अश्वादि-पदार्थसंसर्ग भी वाक्यज्ञान का विषय है, मानना पड़ेगा। 'सैन्धव' का अर्थ है सेंधा नमक और सिंधु देश का 'घोड़ा। भोजन करते समय 'सैन्धव लाओ' कहने वाले वक्ता का तात्पर्य 'सेंधा नमक' रूप अर्थ में होता है, इसलिये उसके वाक्य का तात्पर्यविषय 'सेंधा नमक' है। उस समय 'सैन्धव ( अश्व ) लाओ' इस वाक्य में 'अश्वकर्मक आनयन क्रिया' रूप संसर्ग, वक्ता को अभिमत नहीं रहता। इस कारण वह संसर्ग वाक्यज्ञान के विषय-निर्धारण में प्रयोजक नहीं बन सकता। इसलिये केवल पदार्थसंसर्ग को वाक्यज्ञान का विषय नहीं माना जा सकता। तो फिर वाक्यजन्यज्ञान-विषयत्व में क्या निमित्त है ? उत्तर—वक्ता के तात्पर्य का जो विषय हो वही वाक्यजन्यज्ञान का विषय होता है। फिर वह तात्पर्य-विषय पदार्थों का संसर्ग हो या न हो, यह विचार आवश्यक नहीं है। अब प्रकृत के 'सोऽयं देवदत्तः' लौकिक वाक्य में वक्ता का तात्पर्य देवदत्त के देह में ( उसका देह, इस अर्थ में ) होने से तात्पर्य का विषय न बने हुए पदार्थसंसर्ग की वाक्यजन्यज्ञान-विषय में प्रयोजकता नहीं होती।
इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' वैदिक महावाक्य का तात्पर्य, अद्वितीय विशुद्ध ब्रह्म में है। यह निश्चय 'उपक्रमोपसंहारादि' तात्पर्य-लिंगों से होता है। इसलिए तात्पर्य-विषय न हुआ वाक्यगत पदार्थों का संसर्ग, तात्पर्य का अविषय है। क्योंकि ऐसे वाक्यों में पदार्थों का असंसर्ग ही तात्पर्य का विषय है, इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—
प्रकृते च 'सदेव सौम्येदमग्र आसीत्' छां०-६-२-१ इत्युपक्रम्य 'तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' छां० ६-८-७ इत्युपसंहारेण विशुद्धे ब्रह्मणि वेदान्तानां तात्पर्यमवसितमिति कथं ¹तात्पर्याविषय संसर्गमवबोधयेत् ।
अर्थ— प्रकृत 'तत्त्वमसि' उदाहरण में "हे सौम्य प्रियदर्शन पुत्र ! यह जगत् उत्पत्ति से पूर्व 'सत्' ही था"। यह उपक्रम ( प्रारम्भ ) कर "वह सत् ही सत्य है, वह आत्मा है, और वह सत् ही तू है" ऐसा उपसंहार किया होने से विशुद्ध ब्रह्म में वेदान्त का तात्पर्य निश्चित हुआ है। ऐसी स्थिति में यह वाक्य, तात्पर्य का विषय न बने हुए पदार्थसंसर्ग को कैसे बतावेगा ?
विवरण— 'पहले यह सब सत् ही था' इस उपक्रम और 'वह सत्य है, वही आत्मा है, वह तू है' इस उपसंहार से 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य अद्वितीय विशुद्ध ब्रह्म में है—निश्चय होता है। इसके वाक्यगत-पदार्थों के 'संसर्ग' में तात्पर्यविषयता न 'असंसर्ग' में ही तात्पर्य-विषयत्व है। इसलिये 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत्त्वमसि' ऐसे वाक्यों के तात्पर्य का विषय न होने वाले संसर्गविषयत्व का बाध होता है।
१. तात्पर्याविषयसंसर्गं० —इति पाठान्तरम् ।
| ८४ | वेदान्तपरिभाषा | [ वेदान्तानामखण्डार्थत्वम् |
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शंका—तत्त्वमस्यादि वाक्यों के प्रसिद्ध अखण्डार्थत्व का त्यागकर उनमें (वाक्यों में) संसर्ग के विषय न होने वाले ज्ञान का विषयत्व किस तरह माना जा सकता है ? संसर्ग का विषय न होने वाले ज्ञान का जनकत्व उन वाक्यों में है—यह कुछ नवीन सा लग रहा है।
'इदमेव तत्त्वम²स्यादि वाक्यानामखण्डार्थत्वम्, यत् संसर्गानवगाहियथार्थज्ञानजनकत्वमिति ॥ तदुक्तम्
संसर्गासङ्गि सम्यग् धी हेतुता या गिरामियम् ।
उक्ताऽखण्डार्थता यद्वा तत्प्रातिपदिकार्थता ॥ १ ॥
प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्वं ³वाऽखण्डार्थत्वमिति चतुर्थपादार्थः ॥
अर्थ—संसर्ग का विषय न होने वाले यथार्थ ज्ञान का जनकत्व (उत्पादकत्व) ही तत्त्वमस्यादि वाक्य का अखण्डार्थत्व है। इस विषय में चित्सुखाचार्य ने इस प्रकार कहा है 'गिराम्' तत्त्वमस्यादि वाक्यों को संसर्ग का विषय न होने वाले सम्यग्ज्ञान का हेतुत्व (उन वाक्यों से तादृश यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होना) ही उन वाक्यों का अखण्डार्थत्व है। अथवा उन वाक्यों का प्रातिपदिकार्थत्व है। परन्तु इस दूसरे 'प्रातिपदिकार्थत्व' लक्षण पर अतिव्याप्ति न हो इसलिए 'प्रातिपदिकार्थत्व' में 'मात्र' पद का निवेश करना चाहिए। अर्थात् 'प्रातिपदिकार्थत्व' से तात्पर्य 'प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्व' है, यही अखण्डार्थत्व है। यह उपर्युक्त कारिका के चौथे पाद का अर्थ है।
विवरण—मूल में 'इदमेव' के 'एव'कार का अर्थ 'अपि' समझना चाहिए। अर्थात् 'यही' अर्थ न कर 'यह भी' अर्थ करना चाहिये। क्योंकि 'यही' अर्थ करने पर दूसरे लक्षण का असंभव होगा। परन्तु चित्सुखाचार्य की कारिका के '(यद्वा) तत्प्रातिपदिकार्थता' इस चौथे पाद में अखण्डार्थत्व का दूसरा लक्षण बताया है, इसलिये तीन पादों के द्वारा कहे गये प्रथम लक्षण से द्वितीय लक्षण का समुच्चय करने के लिये 'इदमेव' के स्थान में 'इदमपि' समझना चाहिये। अब 'संसर्ग का विषय न होने वाले यथार्थ ज्ञान का जनकत्व' रूप लक्षण नवीन न होकर प्राचीन ही है, यह प्रदर्शित करने के लिये उसमें चित्सुखाचार्य की सम्मति दिखाते हैं। तत्त्वमस्यादि वाक्यों का जो संसर्गासंगि-सम्यग्ज्ञानहेतुत्व है वही उनका अखण्डार्थत्व है। महावाक्यों का सम्यग्ज्ञान
१. ननु तत्त्वमस्यादिवाक्यानां प्रसिद्धमखण्डार्थत्वं विहाय कथं संसर्गानवगाहिज्ञानजनकत्वमपूर्वमुक्तमित्याशङ्क्याह—'इदमेवेति' । एवकारः अप्यर्थे, तेन च प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्वमखण्डार्थत्वमित्यस्य समुच्चयः ।
२. तत्त्वमसीत्यादिवाक्य०—इति पाठान्तरम् ।
३. त्वमखण्डार्थत्वम्—इति पाठान्तरम् ।
प्रत्यक्षद्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८५
में निमित्त-कारण होना ही उनका अखण्डार्थत्व है। परन्तु वह सम्यग्ज्ञान संसर्ग से सम्बन्ध रखनेवाला नहीं होना चाहिए। अर्थात् 'गाय को लाओ' आदि वाक्य, जैसे संसर्ग को अपना विषय बनाकर वाक्यार्थज्ञान में कारण होता है। वैसे 'तत्त्वमसि' वाक्य 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों के संसर्ग को अपना विषय बनाकर संसर्गसम्बन्धी सम्यक् ज्ञान ( वाक्यार्थज्ञान ) में कारण नहीं होता। अपितु संसर्ग से सम्बद्ध न होने वाले सम्यग्ज्ञान में कारण होता है। वाक्य का संसर्गासंसिगसम्यग्ज्ञान में कारण होना ही उसका अखण्डार्थत्व है। यह अखण्डार्थत्व का एक लक्षण हुआ। उसी का 'यद्वा तत्प्रातिपदिकार्थता' दूसरा लक्षण है। 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की प्रातिपतिकार्थता ही अखण्डार्थत्व है। मूल में 'प्रातिपदिकार्थता' इतना ही लक्षण है। परन्तु वह लक्षण संसर्ग-परक वाक्यों में अतिव्याप्त होता है, कारण संसर्गपरक वाक्य में भी प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादकत्व रहता है, संसर्गपरक वाक्यगत पद भी प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादन करते ही हैं। इसलिए उसमें 'मात्र' पद का निवेश करना चाहिए जिससे ऐसे वाक्यों का 'प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्व' ही अखण्डार्थत्व है। इस लक्षण से उपर्युक्त अतिव्याप्ति का भी निवारण होगा।
क्योंकि संसर्ग-परक वाक्य, प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादन भले ही करते हों तथापि प्रातिपदिकार्थ मात्र का प्रतिपादन नहीं करते। इसलिए उनमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।
अब साक्षिचैतन्य की द्विविधता से पूर्वोक्त प्रत्यक्ष के द्विविधत्व को बताते हैं—
तच्च प्रत्यक्षं पुनर्द्विविधं—जीवसाक्षि ईश्वरसाक्षि चेति। तत्र जीवो नामान्तःकरणावच्छिन्नं¹ चैतन्यम्। तत्साक्षि तु अन्तःकरणोपहितं चैतन्यम्। अन्तःकरणस्य विशेषणत्वोपाधित्वाभ्यामनयोर्भेदः। विशेषणं च कार्यान्वयि व्यावर्तकम्²। उपाधिश्च कार्यानन्वयी व्यावर्तको वर्तमानश्च। ³रूपविशिष्टो घटोऽनित्य इत्यत्र रूपं विशेषणम्। कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रमित्यत्र कर्णशष्कुल्युपाधिः। अयमेवोपाधिर्नैयायिकैः परिचायक इत्युच्यते ॥
अर्थ—और वह सविकल्पक-निर्विकल्पक रूप प्रत्यक्ष पुनश्च दो प्रकार का है। एक जीवसाक्षि-प्रत्यक्ष और दूसरा ईश्वरसाक्षि-प्रत्यक्ष। इनमें अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य
१. च्छिन्नं चैत०—इति पाठान्तरम्।
२. व्यावर्तकं वर्तमानम्—इति पाठान्तरम्।
३. यथारूप०—इति पाठान्तरम्।
८६ वेदान्तपरिभाषा [प्रत्यक्षद्वैविध्यम्
'जीव' है। और अन्तःकरणोपहित चैतन्य 'जीवसाक्षि' है। अन्तःकरण के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण जीव और जीवसाक्षी का भेद है, अर्थात् अन्तःकरण-विशिष्ट-चैतन्य-जीव है, और अन्तःकरणोपहित-चैतन्य-जीवसाक्षि है। विशेषण उसे कहते हैं—जो कार्यान्वयि तथा व्यावर्तक और वर्तमान हो। और उपाधि उसे कहते हैं जो कार्य से अन्वय (सम्बन्ध) न रखते हुए व्यावर्तक और वर्तमान हो। 'रूप (इस) विशेषण से विशिष्ट हुआ घट अनित्य है' इस उदाहरण में 'रूप' यह विशेषण है। 'कर्ण-शष्कुलि से अवच्छिन्न (पृथक्) हुआ आकाश-श्रोत्र है।' इस उदाहरण में 'कर्ण-शष्कुलि' (यह) उपाधि है। नैयायिक इस उपाधि को ही 'परिचायक' कहते हैं।
**विवरण—**पहले सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से प्रत्यक्षज्ञान दो प्रकार का होता है, यह बताया। परन्तु संसर्ग का विषयत्व और अविषयत्व रूप दो निमित्तों से उसकी द्विविधता का सम्भव होने पर भी वह दोनों प्रकार का ज्ञान, चैतन्य रूप होने से एक ही है। चैतन्य रूप से उस एक ही ज्ञान के पुनः जीव-साक्षि-चैतन्य और ईश्वर-साक्षि-चैतन्य, अर्थात् 'शिखामणि' टीकाकार के कथनानुसार जीवसाक्षि-जन्य चैतन्य और ईश्वरसाक्षि-जन्य चैतन्य (ये) दो प्रकार हैं।
इस पर 'अर्थदीपिकाकार ने यह आक्षेप किया है कि शिखामणिकार ने जो 'साक्षि-जन्य' कहा है वह हमें मान्य नहीं है क्योंकि ज्ञान के चैतन्य रूप होने से उसमें (चैतन्य में) जन्यत्व का सम्भव नहीं।
परन्तु चैतन्य रूप ज्ञान, स्वरूपतः अजन्य (उत्पन्न न होनेवाला) होने पर भी वृत्तिरूपज्ञान अथवा वृत्तिविशिष्ट ज्ञान तो जन्य है ही, यह वेदान्त-सिद्धान्त है। इसलिए केवल जीवसाक्षि और ईश्वरसाक्षि चैतन्य का भेद मानने की अपेक्षा, जीवसाक्षिजन्य और ईश्वरसाक्षिजन्य चैतन्य का भेद मानना अधिक उचित प्रतीत होता है। अतः जीव का (जो) साक्षी, उससे उत्पन्न होनेवाला और ईश्वर का (जो) साक्षी, उससे उत्पन्न होनेवाला चैतन्य—ऐसा शिखामणिकार की व्याख्यानुसार ही व्याख्यान करना उचित है। इस प्रकार व्याख्यान करने से ही 'एवं साक्षिद्वैविध्येन प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यम्' इस तरह साक्षिद्वैविध्य से प्रत्यक्षज्ञान का द्विविधत्व है—इस उत्तर ग्रन्थ की सङ्गति लगती है। सिवाय 'साक्षि' शब्द का 'साक्षिजन्य' व्याख्यान न कर 'जीवसाक्षि ईश्वरसाक्षि च' वाक्य से केवल साक्षी के द्विविधत्व को यदि बताया जाय तो 'प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यं निरूपितम्' इस अग्रिम ग्रन्थ की असंगति स्पष्ट ही है। क्योंकि "वह प्रत्यक्ष पुनः दो प्रकार का है", ऐसा उपक्रम कर बीच में ही जीवेश्वर-साक्षी का निरूपण करना सर्वथा अयुक्त है। इस प्रकार साम्प्रदायिक विद्वान् कहते हैं।
इस (जीवसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष और ईश्वरसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष) प्रत्यक्ष चैतन्य के द्विविधत्व को दूसरे प्रकार से बताकर जीव का निरूपण किये बिना जीवसाक्षिजन्य
मायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८७
प्रत्यक्ष का निरूपण करना आवश्यक जानकर ग्रन्थकार प्रथमतः जीव के स्वरूप का निरूपण करके जीव-साक्षी के स्वरूप-लक्षण को कहते हैं।
'तत्र ०' ईश्वर और जीव में से जीव किसे कहते हैं—अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य—जीव है। और अन्तःकरणोपहित चैतन्य—उसका ( जीव का ) साक्षी है। अन्तःकरण जब चैतन्य का विशेषण रहता है तब ( चैतन्य ) 'जीव' कहलाता है और अन्तःकरण जब उसकी ( चैतन्य की ) उपाधि रहता है तब उसे जीव का साक्षित्व प्राप्त होता है। अर्थात् अन्तःकरण के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण 'जीव' और 'जीवसाक्षी' ऐसा भेद होता है।
विशेषण और उपाधि में क्या अन्तर है?—विशेषण और उपाधि दोनों व्यावर्तक और वर्तमान होते हैं, अर्थात् वर्तमानत्व और व्यावर्तकत्व ( ये ) दोनों धर्म, विशेषण, और उपाधि में समानतया रहते हैं, परन्तु विशेषण कार्यान्वयी होता है और उपाधि, कार्यान्वयी नहीं होता । जैसे—'रूपविशिष्ट ( रूप विशेषण से युक्त ) घट अनित्य है' इसमें रूप विशेषण है क्योंकि 'घट' उससे युक्त है । परन्तु 'कर्णशष्कुलि से अवच्छिन्न ( महाकाश से पृथक् हुआ ) आकाश—श्रोत्र है यहाँ 'कर्णशष्कुलि' उपाधि है। 'रूप' घट से सम्बन्ध रहने के कारण विशेषण है, परन्तु आकाश कर्णशष्कुलि से सम्बद्ध नहीं है, क्योंकि निरवयव आकाश और सावयव कर्णशष्कुलि दोनों के सम्बन्ध का सम्भव नहीं है। इसलिए 'कर्णशष्कुलि' उपाधि है, विशेषण नहीं। घट जैसा रूप से विशिष्ट रहता है वैसे कर्णछिद्र कान से विशिष्ट नहीं है। मूल में 'कार्यान्वयी' और 'कार्यानन्वयी' शब्द हैं। इसमें से 'कार्य' पद का अर्थ अवच्छेद्य ( अन्वय योग्य ) है। अवच्छेद्य से सम्बन्ध होने योग्य-घटादि पदार्थ । 'रूपविशिष्ट घट' यहाँ 'रूप' को 'घट' पदार्थ से अन्वयित्व, व्यावर्तकत्व और वर्तमानत्व होने से विशेषणत्व है। और 'कर्णशष्कुल्यवच्छिन्न आकाश' यहाँ कर्णशष्कुलि पद को कार्य से अनन्वयित्व, व्यावर्तकत्व और वर्तमानत्व होने से उपाधित्व है। वेदान्ती के इस उपाधि को ही नैयायिक परिचायक कहते हैं। यह कह कर उपाधि पदार्थ, अन्यान्य शास्त्रों में भी प्रसिद्ध है यह सूचित किया है। अब जीव-साक्षी के प्रसंग में अन्तःकरण में उपाधित्व कैसे बनता है, उसे कहते हैं—
प्रकृते¹ चान्तःकरणस्य जडतया विषयभासकत्वायोगेन विषय-
१. जीवपक्षे अन्तःकरणं विशेषणम्, साक्षिपक्षे तु उपाधिः, अत्र किं कारणम् ? शुद्धचैतन्यं निर्विकारं भवति, चेतनानधिष्ठितं केवलमन्तःकरणं जडं भवति, तस्मात् कर्तृत्वलक्षणजीवत्वान्वयासम्भवेऽपि अन्योन्य-तादात्म्यापन्नयोस्तयोः जीवत्वान्वये बाधकाभावात् अन्तःकरणस्य स्वान्वितचैतन्यांशे विधेयेन जीवत्वेन अन्वयाद् वर्तमानत्वाद् व्यावर्तकत्वाच्च विशेषणत्वं युक्तम् । किन्तु साक्षिपक्षे अन्तःकरणस्य विशेषणत्वं नैव युक्तम् । विषयभा-
८८ | वेदान्तपरिभाषा | [ मायाया एकत्वम्
भासक-चैतन्योपाधित्वम् । अयं च जीवसाक्षी प्रत्यात्मं नाना । एकत्वे मैत्रावगते चैत्रस्याप्यनुसन्धानप्रसंगः ।
**अर्थ—**प्रकृत प्रसंग में अन्तःकरण के जड़ होने से उसमें विषयावभासकत्व नहीं बन पाता, इसलिए उसे ( अन्तःकरण में ) विषयावभासक-चैतन्य का उपाधित्व है । यह जीवसाक्षिचैतन्य, प्रत्येक आत्मा में भिन्न-भिन्न है । प्रत्येक प्रमाता का साक्षि-चैतन्य यदि भिन्न-भिन्न न माना जाय ( समस्त जीवों में साक्षिचैतन्य एक ही है ) तो मैत्र को अवगत हुए अर्थ का चैत्र को भी अनुसन्धान होने लगेगा ।
**विवरण—शंका—**कर्णशष्कुली को उपाधि कहना तो उचित है परन्तु अन्तःकरण को जीवसाक्षिचैतन्योपाधित्व कहना प्रयोजनशून्य ( व्यर्थ ) है । कारण यह है कि प्रमाता ने ( अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य = जीव ने ) विषय प्रकाशनार्थ अपने साक्षी की यदि अपेक्षा की होती तो उसे साक्षिचैतन्य का उपाधि मानना योग्य हुआ होता । परन्तु प्रमाता विषय-प्रकाशनार्थ स्वसाक्षी की अपेक्षा ही नहीं रखता । वह साक्षी की सहायता के बिना चक्षुरादि इन्द्रियजन्य-वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य से ही विषय को प्रकाशित कर लेगा ।
**समाधान—**ऐसी शंका करना उचित नहीं । क्योंकि 'अन्तःकरण' अविद्या का कार्य होने से जड़ है । इसलिए वह विषय को प्रकाशित करने में असमर्थ है । क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली वृत्तियों के अनेक होने के कारण, उन वृत्तियों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य भी अनेक हैं । उस कारण अनेकसंख्यक हुई वृत्तियों को समस्त विषयों का अनुसन्धातृत्व सम्भव नहीं । ( क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाली वृत्तियाँ सम्पूर्ण विषयों का अनुसंधान करने में समर्थ नहीं हैं ।) प्रमाता, अन्तःकरण से अवच्छिन्न हुआ होने से उसे भूत, भविष्यत्, वर्तमान विषयों का अनुसंधान करने के लिये दूसरे के साहाय्य की अपेक्षा है । बिना सहायता लिए उसे त्रैकालिक विषयों का अनुसंधान करना शक्य नहीं है । इसलिए प्रमाता से सम्बद्ध और ब्रह्माभिन्न ऐसे साक्षी की अत्यन्त आवश्यकता है । इसलिये अन्तःकरण में साक्षी का उपाधित्व अवश्य स्वीकार करना चाहिये ।
**शंका—**जीवसाक्षी का ब्रह्म के साथ अभेद होने से उसमें स्वयं प्रकाशत्व है । इसलिए साक्षी में सर्वविषयानुसंधातृत्व है यह मानने पर उसमें एकत्व प्राप्त होता है । क्योंकि ब्रह्म एक है इसलिये ब्रह्माभिन्न साक्षी में भी एकत्व ही है और सब जीवों का
भासकत्वं हि साक्षित्वम् । न चान्तःकरणस्य तद्युज्यते, जडत्वाद् विकारित्वाच्च तस्य । तथा च विवरणकाराः—"सर्वं वस्तु ज्ञाततया अज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यस्य विषय एव । तस्मात् स्वान्वित-चैतन्यांशे विधेयेन साक्षित्वेन अन्तःकरणस्य अन्वयाभावात् तस्योपाधित्वं युक्तम् ।
मायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८९
साक्षी एक है ऐसा मानने पर एक जीव से अनुभूयमान विषय का अनुसंधान दूसरे को भी होने लगेगा। इस शंका का निरसन करने के लिये ग्रंथकार कहते हैं—प्रत्येक जीवात्मा का यह साक्षिचैतन्य भिन्न-भिन्न है, क्योंकि उसे एक मानने पर, मैत्र को ज्ञात हुए विषय का अनुसंधान (स्मरण) चैत्रादि अन्य व्यक्तियों को भी होने लगेगा। परन्तु ऐसी अनवस्था न हो इसलिये हमने अन्तःकरण रूप उपाधि के भेद के कारण जीवसाक्षी में नानात्व स्वीकार किया है। अतः उपर्युक्त दोष नहीं आता। इस तरह जीवसाक्षी का निरूपण कर अब ईश्वरसाक्षी का निरूपण करते हैं—
ईश्वरसाक्षी तु ¹मायोपहितं चैतन्यम्। तच्चैकम्। तदुपाधिभूत ²मायाया एकत्वात्। 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' इत्यादिश्रुतौ मायाभिरिति बहुवचनस्य मायागत-शक्तिविशेषाभिप्राय³तया मायागतसत्त्वरजस्तमो⁴रूपगुणाभिप्राय⁵तया वोप⁶पत्तेः॥
**अर्थ—**परन्तु इसके विपरीत मायोपहितचैतन्य ही ईश्वरसाक्षिचैतन्य है। और वह एक है। क्योंकि उस चैतन्य की उपाधिभूत माया एक है। 'इन्द्र (परमेश्वर) माया के कारण बहुरूपत्व को प्राप्त होता है।' आदि श्रुति में 'मायाभिः' इस बहुवचन का आशय 'माया के शक्ति-विशेष से' है। अर्थात् 'मायाभिः'—मायाओं से—इस प्रयुक्त बहुवचन का अभिप्राय एक महामाया की असंख्य विचित्र अवान्तरण शक्तियाँ—होने से मुख्य माया के एकत्व के साथ विरोध नहीं है। अथवा मायागत सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणों के अभिप्राय से वह बहुवचन है—इस प्रकार उस बहुवचन की उपपत्ति लगानी चाहिये।
**विवरण—**पहले जीवसाक्षी का निरूपण करते समय अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्य 'जीव' और अन्तःकरणोपहित-चैतन्य 'जीवसाक्षी' बताया गया है। अब ईश्वर और ईश्वरसाक्षिचैतन्य को बताने के लिए 'मायोपहित-चैतन्य' ही ईश्वरसाक्षिचैतन्य है (माया-
१. मायोपहितमविद्योपहितम्। मायाऽविद्ययोरभेद इति विवरणसिद्धान्तः। माया-विद्ययोर्भेदपक्षे तु मायोपहितमिति विशुद्धसत्त्वप्रधानोपहितमित्यर्थः। विशुद्धसत्त्वप्रधाना माया, मलिनसत्त्वप्रधानात्वविद्येति तयोर्भेदः। तथा च पञ्चदशीकाराः—"तमोरजः-सत्त्वगुणा प्रकृतिर्द्विविधा च सा। सत्त्वशुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाऽविद्ये च ते मते।"
२. ताया-इति पाठान्तरम्।
३. यक-इति पाठान्तरम्।
४. मोगुणा-इति पाठान्तरम्।
५. यक-इति पाठान्तरम्।
६. चोप-इति पाठान्तरम्।
| ९० | वेदान्तपरिभाषा | [ मायाया एकत्वम् |
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वच्छिन्न चैतन्य ही ईश्वरचैतन्य है ) यहाँ बताया है । इस बात को स्वयं ग्रंथकार आगे कहेंगे ही । परन्तु जीवसाक्षिचैतन्य की तरह ईश्वरसाक्षिचैतन्य भी क्या अनेक है ? उत्तर—नहीं । यह ईश्वरसाक्षिचैतन्य एक है, क्योंकि उस साक्षिचैतन्य की उपाधिरूप माया एक है । माया के एक होने से मायोपहित चैतन्य भी एक है और प्रत्येक जीव-चैतन्य का अन्तःकरण भिन्न होने से अन्तःकरणोपहित चैतन्य भी भिन्न ( अनेक ) है । इस प्रकार इन दो साक्षिचैतन्यों में विशेष ( अन्तर ) है, उसी को सूचित करने के लिये मूल में 'ईश्वरसाक्षि तु' वाक्य में 'तु' शब्द का उपयोग किया है । अनादि, अनिर्वाच्य, विपर्यय की उपादान और विक्षेपप्रधान ईश्वरशक्ति ही माया है--इस प्रकार माया का लक्षण किया गया है ।
शंका—माया को एक कहने पर बृहदारण्यक के--'परमेश्वर, मायाओं के योग से अनेक रूप को प्राप्त हुआ है'—श्रुतिवचन से विरोध होता है । इस पर ग्रंथकार धर्म-राजाध्वरीन्द्र कहते हैं—'निष्प्रतिबन्ध ऐश्वर्य से युक्त हुआ परमात्मा मायाओं के योग से अनेकाकार प्रतीत होता है ।' इस वाक्य में 'मायाभिः' ( यह ) बहुवचन का प्रयोग, मायागत शक्तिविशेषों के अभिप्राय से किया गया है । मुख्य माया में जो असंख्य विचित्र शक्तियाँ हैं वे ही शक्तिविशेष हैं । अग्नि प्रभृति पदार्थों में दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि कार्यों को देखकर तत्तद् शक्तियां तत्तत् पदार्थों में जैसी कल्पित की जाती हैं, उसी तरह जगद्रूप विचित्र कार्यों के देखने से तत्तत् असंख्य कार्यों की शक्तियाँ माया में कल्पित करनी पड़ती हैं । उन्हीं को शक्तिविशेष अथवा अवान्तर शक्ति कहते हैं । इन असंख्य शक्तिविशेषों के अभिप्राय से 'मायाभिः' ( ऐसा ) श्रुति में कहा है । मूल माया के अभिप्राय से नहीं । अथवा सत्त्व, रज, और तम—इन तीन गुणों की साम्यावस्था को माया ( प्रकृति ) कहते हैं । उन तीन गुणों के अभिप्राय से श्रुति में 'मायाभिः' बहुवचन का उपयोग किया है । भाव यह है कि ईश्वरसाक्षि की उपाधिभूत माया एक है । वह जीवसाक्षी के उपाधिभूत अन्तःकरण की तरह नाना नहीं है ।
शंका—'मायाभिः' यह बहुवचनान्त प्रयोग श्रुति के करते हुए 'माया का बहुत्व' इस मुख्यार्थ को छोड़कर अमुख्य अर्थ का ग्रहण क्यों किया जाता है । ( अवान्तर विशेषों की अथवा गुणों के बहुत्व की कल्पना करके 'मायाभिः' इस बहुवचन की व्यवस्था क्यों लगाई जा रही है ) 'मायां तु०' आदि ग्रंथ से समाधान किया जाता है—
'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।' श्वे० ४।१०।
"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजास्सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥' श्वे० ४।५।
१. अत्र 'तरत्यविद्या'मिति क्वचित् पाठः ।
मायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९१
"तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगी मायामभेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥ १ ॥' इत्यादिश्रुति-स्मृतिषु एकवचन-बलेन लाघवानुगृहीतेन मायाया एकत्वं निश्चीयते । ततश्च तदुपहितं चैतन्यम् ईश्वरसाक्षि । तच्चानादिः, तदुपाधेर्मायाया अनादित्वात् ॥
अर्थ—'तु' चिद्रूप महेश्वर से विलक्षण जड़भूत 'मायां' ईश्वर शक्ति (माया) 'प्रकृतिम्' प्रकृति है और 'तु' उस माया से विलक्षण (चिद्रूप) 'मायावी' माया शक्ति-मान् चिद्रूप आत्मा-महेश्वर है 'विद्यात्' समझना चाहिये । ( श्वे० उ० ४।१० ) ।
अजा—उत्पन्न न होनेवाली, एक, लोहित, शुक्ल, कृष्ण रूप (तेज, अप्, अन्नात्मक) 'सरूपाः बह्वीः प्रजाः सृजमानां' अपने आकार की विविध प्रजा को पैदा करनेवाली, अजा (अविद्यात्मक प्रकृति) का, 'एकः अजः हि जुषमाणः अनुशेते' एक, अज (अनादि), अविद्यात्मक वासनाओं से बद्ध हुआ जीवात्मा सेवन करता रहता है, और दूसरा अज (ईश्वर) भुक्त भोगा (जिसका भोग लिया गया है) प्रकृति को छोड़ता है । अविद्यावान् जीवात्मा की तरह विद्यावान् ईश्वर उसके तादात्म्य को प्राप्त नहीं होता । (श्वे. उ. ४।५) । 'यस्मिन् परात्मनि हृदि निवेशिते सति' जिस परमात्मा की हृदय में स्थिर स्थापना करने पर (वृत्त्यारूढ = वृत्तिविषय करने पर 'योगी विततां अविद्यां तरति' योगी कार्यरूप से विस्तार को प्राप्त हुई अविद्या (माया) को तर जाता है । 'तस्मै अमेयाय विद्यात्मने नमः' उस अप्रमेय (प्रमाणों के विषय न होने-वाले) विद्यात्मा को प्रणाम । इत्यादि श्रुति-स्मृतिगत लाघव से उपकृत हुए एकवचन के बल से माया के एकत्व का निश्चय किया जाता है । इस कारण मायोपहितचैतन्य 'ईश्वरसाक्षि' है और वह अनादि है । क्योंकि उसकी उपाधिरूप माया का अनादित्व है ।
**विवरण—**प्रथम श्रुतिवचन में 'मायां' ऐसा एकवचन जाति के अभिप्राय से है ऐसा कोई कदाचित् कह दे, इसलिये प्रत्यक्ष 'एकाम्' इस एकत्वबोधक शब्दावली की एक दूसरी 'अजामेकाम्' इत्यादि श्रुति का निर्देश किया है । इसके देखने से 'मायां' एक-वचन जाति के अभिप्राय से उपयुक्त किया है यह कहने का अवकाश नहीं मिलता । तथापि माया का एकत्व श्रुतितात्पर्य से सिद्ध है—आपने कैसे जाना ? क्योंकि श्रुति का तात्पर्य अमुक अर्थ में ही है—ऐसा निश्चय करना बहुत कठिन है । ऐसा कदाचित् कोई कह दे इसलिये स्मृतिकार के वचन का अनुसरण कर हम श्रुतितात्पर्य का निश्चय करते हैं । इस आशय से 'तरत्यविद्याम्' आदि पराशरस्मृति का उल्लेख किया है । 'योगी जिस परमात्मा को वृत्त्यारूढ करके (वृत्ति का विषय करके) अविद्याख्य माया का
१. अत्र 'अजामेका'मिति क्वचित् पाठः ।
२. 'तिष्वेकव०' इति पाठान्तरम् ।
| ९२ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
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उल्लंघन करता है उस ज्ञानस्वरूप अमेय (वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य का विषय न होनेवाले) परमात्मा को प्रणाम हो। उसी अविद्यामें 'वितताम्' (प्रपंच के आकार में परिणत होने से सर्वत्र व्याप्त हुई) विशेषण दिया है।
**शंका—**परमेश्वर की हृदय में स्थापना करने से अविद्या की निवृति होने पर भी अनर्थ की निवृत्ति नहीं होगी। क्योंकि सर्वानर्थभूत माया तो अवशिष्ट ही रहती है। अतः अविद्या की निवृत्ति से माया की निवृत्ति नहीं हो सकती।
**उत्तर—**परमेश्वर की शक्तिरूप माया और अविद्या एक ही है। इसी आशय से मूल में 'अविद्यां माया' कहा है। अविद्या अपने आश्रय (जीव) को मोहित करती है किन्तु माया अपने आश्रय (ईश्वर) को मोहित नहीं करती, इस प्रकार उनमें भेद होने पर भी वस्तुतः उसमें भेद नहीं है। अर्थात् अविद्या और माया पृथक् पदार्थ नहीं है।
**शंका—**स्मृति में भी जाति के अर्थ में एकवचन और 'अजामेकाम्' यहां 'एक' शब्द अमुख्य अर्थ में कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में श्रुतिस्मृति से एकत्व का निश्चय कैसे किया जा सकता है ?
**उत्तर—**श्रुतिस्मृति में एकवचन, लाघव से अनुगृहीत है। 'मयाभिः' इस बहुवचन से परमेश्वर की अनेक मायाओं की कल्पना करने की अपेक्षा एक ही माया-शक्ति की कल्पना करने में लाघव है, इस लाघव से अनुगृहीत श्रुतिस्मृति के एक वचन से माया का एकत्व निश्चित होता है। मूलस्थ 'इत्यादि, पदसे 'अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः' (का. १, २, ५) 'मम माया दुरत्यया' (गी. ७, १४) आदि श्रुति-स्मृति वचनों को समझना चाहिये। जैसे उपाधिभूत माया के एक होने से ईश्वरसाक्षिचैतन्य एक है, वैसे ही उसके अनादि होने से वह अनादि भी है। अब ईश्वरसाक्षिज्ञान को ईश्वर के स्वरूपज्ञान की अपेक्षा होने से उसका स्वरूप बताते हैं—
मायावच्छिन्नं चैतन्यं परमेश्वरः, मायाया विशेषणत्वे ईश्वरत्वम्, उपाधित्वे साक्षित्वमिति ईश्वरत्व-साक्षित्वयोर्भेदः, न तु धर्मिणोरीश्वर¹-तत्साक्षिणोः²।
स च परमेश्वर एकोपि ³स्वोपाधिभूत-माया-निष्ठ-सत्त्व-रजस्त
१. 'रसाक्षि०' इति पाठान्तरम् ।
२. गोर्भेदः-इति पाठान्तरम् ।
३. 'स्वोपाधिभूत-माया-निष्ठ-सत्त्वरजस्तमोगुणाभेदेन'—परमेश्वरचैतन्योपाधिभूता या माया, तद्घटका ये सत्त्वरजस्तमोगुणाः तेषां भेदेन। एवञ्च एकमेवेश्वरचैतन्यं यदा सत्त्वप्रधानमायावच्छिन्नं भवति, तदा विष्णुनाम्ना, यदा च रजः प्रधानमायावच्छिन्नं, तदा तदेव ब्रह्मनाम्ना, यदा च तमःप्रधानमायावच्छिन्नं, तदा तदेव महेश्वरनाम्ना
मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९३
अर्थ—मायावच्छिन्न चैतन्य ही परमेश्वर है। माया जब चैतन्य में विशेषण हो तब उस चैतन्य में ईश्वरत्व होता है और माया जब उसमें उपाधि हो तब उस चैतन्य में साक्षित्व होता है। अर्थात् मायाविशिष्ट-चैतन्य को ईश्वरत्व और मायोपहित चैतन्य को ईश्वरसाक्षित्व, इस प्रकार ईश्वरत्व और ईश्वरसाक्षित्व में भेद है। परन्तु ईश्वर और उसके साक्षी इन धर्मियों में भेद नहीं। और उस ईश्वर के वस्तुतः एक होने पर भी उसकी उपाधिभूत माया में रहनेवाले सत्त्व, रज और तम इन गुणों के भेद से ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि शब्दों की वाच्यता ( अर्थ ) को वह ( ईश्वर ) पाता है।
विवरण—अन्तःकरणविशिष्ट चैतन्य—जीव, और अन्तःकरणोपहित चैतन्य—जीवसाक्षी इस पूर्वोक्त भेद के समान ही यहाँ भी माया के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण ईश्वरत्व और ईश्वरसाक्षित्व का भेद है। जैसे जो पाचक ( स्वयं पाक करनेवाला ) हो, वही पाठक ( पाठ करनेवाला ) जब रहता है, तब पाचक व्यक्ति से पाठक व्यक्ति भिन्न नहीं होता, परन्तु उस व्यक्ति में रहनेवाले 'पाचकत्व और पाठकत्व' ( ये ) धर्म भिन्न होते हैं यह प्रसिद्ध ही है। उसी तरह ईश्वर और उसका साक्षी इन धर्मियों का भेद नहीं, अपितु ईश्वरसाक्षित्व इन धर्मों का भेद है।
शंका—माया के एकत्व के कारण ईश्वरसाक्षी में जैसे एकत्व है, उसी तरह मायावच्छिन्न ( मायाविशिष्ट ) चैतन्य ( ईश्वर ) में भी एकत्व अवश्य होना ही चाहिये। ऐसा होते हुए उसका ब्रह्मादि रूप से भेद कैसे स्वीकार किया गया है ? उसी तरह वह ब्रह्मादिभेद, विशेषण-भेद मूलक होने से और उस विशेषणभेद की उपाधि माया के होने से तदुपहित चैतन्य में भी एकत्व होना उचित है। ऐसी स्थिति में उसे अनेकत्व कैसे ? इस शंका का उत्तर 'स च' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है, जिसका तात्पर्य इस प्रकार है—जिस प्रकार 'माया' रूप उपाधि ( विशेषण ) के सत्त्वादि गुणों के अभिप्राय से अनेकत्व का व्यपदेश होता है, उसी तरह उसके गुणों के अवच्छेद से ईश्वर का भेद होता है, वास्तव में नहीं। ऐसा होने से मायावच्छिन्न ईश्वरचैतन्य ही उद्भूत सत्त्व-गुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर पालन करनेवाला नारायण, विष्णु
व्यवह्रियते। गुणत्रयकार्यविशेषनिबन्धनोऽयमीश्वरस्य रूपभेदः, न स्वरूपभेदनिबन्धनः। तथा च मैत्रेयोपनिषदि—"अथ यो ही खलु वाऽस्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं ब्रह्मा। अथ यो ह खलु वाऽस्य तामसोंऽशो स योऽयं रुद्रः। अथ यो ह खलु वाऽस्य सात्विकोंऽशोऽसौ स योऽयं विष्णुरिति" तथा विष्णुपुराणेऽपि—"सर्गस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिकाम्। स संज्ञा याति भगवानेक एव जनार्दनः॥" इति।
१. रादि-इति पाठान्तरम्।
२. भजते-इति पाठान्तरम्।
९४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम्
इत्यादि शब्दों का वाच्य (अर्थ) होता है। वह ही मायाविशिष्ट चैतन्य, उद्भूत रजोगुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर स्रष्टा, ब्रह्मा, विधाता आदि शब्दों का वाच्य होता है। और वह ही ईश्वरचैतन्य उद्भूत-तमोगुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर संहर्ता, महेश्वर, रुद्र आदि संज्ञाओं को पाता है। मैत्रेयोपनिषद् में ऐसा वर्णन मिलता है—"अथ यो ह खलु वास्य राजसोंऽशः असौ स योऽयं ब्रह्मा, अथ यो ह खलु वास्य तामसोंऽशः असौ स योऽयं रुद्रः, अथ यो ह खलु वास्य सात्त्विकोंऽशः असौ स योऽयं विष्णु" ईश्वर के राजस अंश का नाम ब्रह्मा, तामस अंश का नाम रुद्र, और सात्त्विक अंश का नाम विष्णु है। त्रिगुणमायावच्छिन्न चैतन्य ही विष्णु, महेश, गणेश, दिनेश, दुर्गा रूपों से उपास्य होता है, क्योंकि उन उपास्यों का निरंकुश (निष्प्रतिबन्ध) ऐश्वर्य कहीं श्रुत नहीं।
ईश्वर के सादित्व में शंका—
नन्वीश्वर-साक्षिणोऽनादित्वे तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय, छा० ६।२।१ इत्यादिना सृष्टिपूर्वसमये परमेश्वरस्यागन्तुकमीक्षणमुच्यमानं कथमुपपद्यते ?
अर्थ— ईश्वरसाक्षिचैतन्य यदि अनादि होता तो उसने 'मैं बहुत होऊँ, प्रजा के रूप में उत्पन्न होऊँ' (छां. उ. ६, २, ३) आदि वाक्य से सृष्टि के पूर्व परमेश्वर का आगन्तुक ईक्षण बताया है, वह कैसे उपपन्न होगा ?
विवरण— ईश्वरसाक्षी-ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालीनत्व है, ऐसा कहा हुआ होने से उसे (ईश्वरसाक्षीचैतन्य को) अनादि नहीं मान सकते। क्योंकि 'कालिक अवधि से रहित रहना' ही अनादित्व है। जिसमें काल की अवधि रहती है वह अनादि नहीं होता। ईक्षण में सृष्टि का पूर्वकाल रूप अवधि है। इसलिये उसमें अनादित्व नहीं है। किन्तु ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालिकत्व होने से सादित्व है। यह सिद्ध होनेपर तद्विशिष्ट ईश्वर में भी सादित्व मानना पड़ता है ('तदैक्षत०' इत्यादि श्रुति, ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालीनत्व का प्रतिपादन करती है) अतः ईश्वर साक्षी के ईक्षण में अनादित्व बाधित होता है, और उनके बाधित होनेपर तद्विशिष्ट ईश्वर में भी अनादित्व बाधित होता है।
इस शंका का समाधान 'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थ से करते हैं—
उच्यते। यथा विषयेन्द्रिय-सन्निकर्षादि-¹कारणवशेन जीवो-
१. 'सन्निकर्षादि०' अत्रादिशब्देन व्याप्तिज्ञानादिपरिग्रहः । जीवोपाध्यन्तःकरणस्य जीवचैतन्ये विशेषणीभूतस्य अन्तःकरणस्य । अन्तःकरणस्य उपाधित्वदशायामन्तःकरणवृत्त्यभावः ।
मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९५
पाद्यन्तःकरणस्य वृत्तिभेदा जायन्ते, तथा सृज्यमान-प्राणिकर्मवशेन परमेश्वरोपाधिभूत-मायाया वृत्तिविशेषा 'इदमिदानीं स्रष्टव्यमिदमिदानीं पालयितव्यमिदमिदानीं संहर्तव्य'मित्याद्याकारा जायन्ते। तासां च वृत्तीनां सादित्वात्तत्प्रतिबिम्बितं चैतन्यमपि सादीत्युच्यते। एवं साक्षिद्वैविध्येन प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यम्। प्रत्यक्षत्वं च ज्ञेयगतं ज्ञप्तिगतं ^१चेति निरूपितम् ॥
अर्थ—उपर्युक्त शंका का समाधान बताया जाता है—जैसे-विषयेन्द्रियसन्निकर्षादि कारणों से जीव के उपाधिरूप अन्तःकरण के वृत्तिविशेष (अनेक विषयाकार वृत्तियां) माने जाते हैं, वैसे ही जिन्हें उत्पन्न करना है उन प्राणियों के कर्मवशात् परमेश्वरोपाधिभूत माया के वृत्तिविशेष (यह अब स्रष्टव्य = उत्पाद्य अर्थात् उत्पन्न करने योग्य है, यह अब पालन करने योग्य है, यह अब संहार करने योग्य है—इत्यादि आकारों के वृत्तिविशेष) उत्पन्न होते हैं। उन वृत्तियों में सादित्व (वे वृत्तियां उत्पन्न होती हैं इस कारण) होने से, उनमें (वृत्तियों में) प्रतिबिम्बित हुआ चैतन्य भी सादि (उत्पन्न) कहा जाता है। इस प्रकार साक्षी की द्विविधता से प्रत्यक्ष ज्ञान की भी द्विविधता है। इस कारण प्रत्यक्षत्व के (प्रत्यक्ष के) ज्ञेयगत और ज्ञप्तिगत भेद से दो प्रकार बताये गये हैं।
विवरण—जैसे चैतन्य को अभिव्यक्त करनेवाली अन्तःकरण वृत्ति के सादि^२ होनेसे उसमें प्रतिबिम्बित हुए जीवसाक्षिरूप ज्ञान में भी सादित्व है, वैसे ही ईक्षणादिकों को अभिव्यक्त करनेवाली मायावृत्ति में भी सादित्व होने से उसमें प्रतिबिम्बित हुए ईश्वर-साक्षीचैतन्य (ईक्षणादि ज्ञानस्वरूप) में भी सादित्व है। तथापि उनमें स्वरूपतः अनादित्व ही है (साक्षीचैतन्य में उपाधि के कारण पैदा होनेवाला सादित्व स्वाभाविक न होकर औपाधिक है) वृत्तिरूप उपाधि के कारण वह सादि-सा (उत्पन्न-सा) भासता है। उस औपाधिक सादित्व से चैतन्य का स्वाभाविक अनादित्व बाधित नहीं हो सकता।
इस प्रकार साक्षी की द्विविधता का प्रतिपादन किया। इस कारण तत्तद्वृत्तियों
परमेश्वरोपाधिभूतमायायाः = परमेश्वरचैतन्ये विशेषणीभूतमायाया उपाधिभूतमायायाश्चेति।
१. च निरू० इति पाठान्तरम्।
२. विशिष्टस्य विशेष्य-विशेषणोभयानतिरिक्तत्वात् विशेषणीभूताया मायावृत्तः सादित्वात् विशिष्टस्य तद्वृत्यभिव्यक्त-चैतन्यस्यापि सादित्वम्।
९६ | वेदान्तपरिभाषा | [ ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षलक्षणम्
में अनुवृत्त हुए साक्षी का ज्ञानत्व होने से प्रत्यक्ष ज्ञान की भी द्विविधता है, एक ईश्वर-साक्षिजन्य और दूसरा जीवसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष । परन्तु दीपिकाकार कहते हैं—'जीव-साक्षिजन्य और ईश्वरसाक्षिजन्य कहना उचित नहीं है, क्योंकि 'ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष चित्त्व ही है' इस उत्तर ग्रन्थ से विरोध होगा ।
अब उसी में कुछ विशेष कहने के लिए 'एवं साक्षिद्वैविध्येन०' ग्रन्थ से ज्ञेयगत और ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व के निरूपण का अनुवाद किया गया है ।
अब उस विशेष को बताते हैं--
तत्र ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्वस्य सामान्यलक्षणं चित्त्वमेव । पर्वतो वह्निमानित्यादावपि वह्न्याद्याकार-वृत्त्युपहित-चैतन्यस्य स्वात्मांशे स्वप्रकाशतया प्रत्यक्षत्वात् । तत्तद्विषयांश¹प्रत्यक्षत्वं तु पूर्वोक्तमेव । तस्य च भ्रान्तिरूप-प्रत्यक्षे नातिव्याप्तिः, भ्रमःप्रमासाधारण-प्रत्यक्ष²त्वसामान्य-निर्वचनेन तस्यापि लक्ष्यत्वात् ।
अर्थ—उनमें से ज्ञप्तिगत—प्रत्यक्षत्व का सामान्य लक्षण 'चित्त्व' ही है । 'पर्वत वह्निमान् है' आदि अनुमिति-ज्ञानों में भी वह्न्याद्याकारवृत्ति से उपहित ( युक्त ) चैतन्य को 'चित्' अंश में प्रत्यक्षत्व है, क्योंकि उसमें स्वप्रकाशत्व है और स्वप्रकाशत्व के कारण विषयाकारवृत्त्युपहित-चैतन्य को स्वांश में प्रत्यक्षत्व है, इसलिये 'चित्त्व' रूप प्रत्यक्षत्व लक्षण की अनुमित्यादि ज्ञानों में अतिव्याप्ति बताना उचित नहीं है । क्योंकि अनुमित्यादि ज्ञान भी यहाँ लक्ष्य हैं, अलक्ष्य नहीं । तत्तद् विषय के अंश का 'प्रत्यक्षत्व तो पहले ही कह दिया है ( ज्ञेयगत प्रत्यक्षत्व का लक्षण पहले सविस्तर कह ही चुके हैं ) उस लक्षण की भ्रान्तिरूप प्रत्यक्ष में अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि भ्रम ( मिथ्याज्ञान ) और प्रमा ( सम्यक् ज्ञान ) इन दोनों ज्ञानों के लिये साधारण ऐसे प्रत्यक्षत्व सामान्य के निर्वचन से भ्रमज्ञान भी लक्षण कोटि में आ जाता है, अतः अलक्ष्य में लक्षणगमनरूप अतिव्याप्ति नहीं होती ।
विवरण—'तत्रेति' ज्ञेयगत और ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व में से ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का सामान्य-लक्षण 'चित्त्व' ही है, यह सुनकर वादी कहता है—ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व का 'चित्त्व' रूप लक्षण अनुमिति, उपमिति, आदि ( प्रत्यक्ष प्रमा से भिन्न ) प्रमाओं में अतिव्याप्त होता है । क्योंकि प्रत्यक्षप्रमा के समान उनमें भी चित्त्व है, परन्तु अनुमिति आदि प्रमाएं इसका लक्ष्य तो नहीं हैं केवल प्रत्यक्ष हैं, इस कारण चित्त्वरूप-प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण अलक्ष्यभूत ( जो लक्ष्य नहीं है ) अनुमिति आदि प्रमाओं में भी रहने से
१. यांशे—इति पाठान्तरम् ।
२. क्षताः-इति पाठान्तरम् ।
ज्ञाप्तिगत-प्रत्यक्ष-लक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९७
अतिव्याप्त होता है । इस आशंका समाधान 'पर्वतो वह्निमान्' आदि ग्रन्थ से करते हैं । सभी ज्ञानों में अर्थात् 'पर्वतो वह्निमान्' आदि अनुमित्यादि सभी प्रमाओं में तत्तद्-विषयाकार वृत्ति से उपहित चैतन्य को चैतन्यांश में प्रत्यक्षत्व है, क्योंकि 'यत्साक्षात् अपरोक्षात् ( अपरोक्षं ) ब्रह्म' इस श्रुति ने चित्त्व का ही प्रत्यक्षत्व (अपरोक्षत्व) बताया है, और चिद्रूप ज्ञान, स्वप्रकाश है । इसलिए सभी ज्ञानों को ज्ञान अंश में प्रत्यक्षत्व ही है । इससे ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का 'चित्त्व' रूप लक्षण अतिव्याप्त नहीं हो पाता, क्योंकि चैतन्य सर्वदा प्रत्यक्ष ही रहता है ।
शंका—चैतन्य, स्वप्रकाशत्व के कारण यदि प्रत्यक्ष है और उसके प्रत्यक्ष होने से समस्त ज्ञानों को यदि प्रत्यक्षत्व है तो अनुमिति उपमिति, आदि प्रमाओं में प्रत्यक्षत्व का व्यवहार क्यों नहीं होता ? ( अनुमिति, उपमिति, शाब्द आदि ज्ञानों को 'प्रत्यक्ष' क्यों नहीं कहा जाता ) ।
इस शंका का समाधान 'तत्तद्विषयांश०' आदि ग्रन्थ से किया गया है । अनुमिति आदि ज्ञानों में विषयांशनिरूपित प्रत्यक्षत्व का पूर्वोक्त प्रयोजक नहीं है । इसलिए उन्हें प्रत्यक्षशब्द से नहीं कहा जाता । हमने पहले बताया है कि विषयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक 'प्रत्यक्ष योग्य विषय के आकार की जो जो अन्तःकरण वृत्ति, उससे उपहित जो प्रमातृचैतन्य की सत्ता, उससे विषय की सत्ता का पृथक् न रहना' ( विषयाकार वृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता का पृथक् न रहना ) ही विषयगत ( प्रमेयगत ) प्रत्यक्षत्व है । अर्थात् अनुमिति प्रभृति ज्ञानों में इसके प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक के ) न होने से अनुमित्यादि प्रमाओं को 'प्रत्यक्षप्रमा' शब्द से नहीं कहा जाता । 'चित्त्व' ( स्वप्रकाशत्व ) रूप ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का लक्षण प्रत्यक्षादि सब प्रमाओं में है । परन्तु ज्ञेयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक प्रत्यक्षादि सब प्रमाओं में भिन्न-भिन्न है । इसलिए प्रत्यक्ष से भिन्न प्रमाओं में प्रत्यक्ष शब्द का व्यवहार नहीं होता । अर्थात् विषय के भेद से प्रत्यक्षादि प्रमाओं में भेद होता है ।
शंका—शुक्तिरूप्यादि प्रत्यक्ष ज्ञान में योग्य विषयाकार वृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता से भ्रामक शुक्तिरूप्यादि विषयों की सत्ता भिन्न नहीं होती, इसलिए शुक्तिरूप्यादि-भ्रान्त ज्ञान में 'चित्व'-रूप ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व के लक्षण की अतिव्याप्ति होती है ।
समाधान—'तस्य च' ग्रन्थ से समाधान किया गया है । 'चित्त्व' ( स्वप्रकाशत्व ) रूप लक्षण की भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि भ्रमज्ञान की भी स्वांश ( ज्ञान ) में प्रत्यक्षता सिद्ध है, अतः भ्रमज्ञान में भी ज्ञप्तिगत सामान्य लक्षण की लक्ष्यता रहने से अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । अलक्ष्य में लक्षण का घटित होना अतिव्याप्ति कहलाती है । भ्रमज्ञान तो ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व लक्षण ( चित्त्व ) का अलक्ष्य न होकर लक्ष्य , इसलिए 'चित्त्व' लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । भ्रमज्ञान ( अप्रमा-ज्ञान ) और प्रमाज्ञान ( सम्यग्ज्ञान ) इन द्विविधज्ञानों का साधारण लक्षण ( ज्ञप्तिगत
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प्रत्यक्षत्व का बित्त्वरूप सामान्य लक्षण ) बताया है । उस सामान्य लक्षण का लक्ष्य भ्रमज्ञान भी है । ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व के विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति का निरसन आगे किया जायगा ।
शंका—प्रत्यक्ष-प्रमाण का निरूपण करते समय ( प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रकरण में ) भ्रमज्ञान और प्रमाज्ञान ( सम्यग्ज्ञान ) दोनों के लिए साधारण ( प्रत्यक्षत्व के ) लक्षण का कहना ( सामान्य लक्षण का निरूपण करना ) योग्य नहीं है ।
इस शंका का निरसन 'यदा तु०' ग्रन्थ से करते हैं—
यदा तु प्रत्यक्षप्रमाया एव लक्षणं वक्तव्यं, तदा पूर्वोक्तलक्षणे-ऽबाधितत्वं विषयविशेषणं देयम्¹ । शुक्तिरूप्यादिभ्रमस्य संसार-कालीनबाधविषय-प्रातिभासिक-रजतादि-विषयकत्वेनोक्तलक्षणाभावान्ना-तिव्याप्तिः ॥
अर्थ—अब आप यदि "प्रत्यक्ष प्रमा का ही लक्षण बताने के लिये कहें" तो पूर्वोक्त लक्षणगत 'विषय' में 'अबाधितत्व' विशेषण जोड़ दीजिये । जिससे प्रमा के लक्षण की भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि शुक्तिरूप्यादि भ्रम में, संसारकालीन-बाध-विषय-प्रातिभासिकरजतादिविषयकत्व के होने से उसमें उक्त लक्षण का अभाव है । अतः अतिव्याप्ति नहीं होने पाती ।
विवरण—जब कि प्रत्यक्षप्रमाण का निरूपण चल रहा है तो ज्ञेयगत यथार्थ प्रत्यक्ष का ही 'विशेष लक्षण' बताना योग्य है । भ्रमज्ञान और प्रमाज्ञान दोनों के लिये साधारण ( ऐसा ) प्रत्यक्षत्व-सामान्य का लक्षण बताना योग्य नहीं । यह आक्षेप यदि हो तो पूर्वोक्त ज्ञान-साधारण-लक्षणगत 'विषय' शब्द के साथ 'अबाधित' विशेषण जोड़ देना चाहिये, जिससे भ्रमज्ञान का विषय बाधित होने से उसकी निवृत्ति हो जायगी । "योग्य और अबाधित विषय की सत्ता का, विषयाकार वृत्ति से उपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता से पृथक् न होना" ( ऐसा ) लक्षण करने से बाधित होनेवाले शुक्तिरजतादि-विषयों की व्यावृत्ति होती है । जिससे यह लक्षण ज्ञेयगत यथार्थप्रत्यक्षत्व का हो सकता है ।
शंका—'अबाधितत्व' का अर्थ 'पारमार्थिकत्व' है या केवल 'सत्त्व' । 'पारमार्थिक-त्व' यदि कहें तो 'घटज्ञान' में अव्याप्ति होगी । क्योंकि वेदान्तमत में घटादि विषयों में बाधितत्व है । वेदान्त के मत में ब्रह्म से भिन्न यञ्च यावत् सब मिथ्या ( बाधित )
१. 'पूर्वोक्तलक्षणे'—विषयगत-प्रत्यक्षलक्षणे । तथा च—स्वविषयवृत्त्युपहित प्रमातृ-चैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताशून्यत्वे सति अबाधितत्वे सति योग्यत्वं विषयगतप्रत्यक्षत्व-प्रयोजकम् इति विशेषलक्षणम् । अत्र अबाधितपदेन व्यवहारकालाऽबाध्यत्वं विवक्ष्यते ।
अन्यथाख्यातिः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९९
है। किन्तु यह लक्षण, बाधित-घट में रहता नहीं। 'लक्षणका लक्ष्य के एक देश मे न रहना' ही अव्याप्ति है। अब यदि 'सत्त्वमात्र' ही अबाधितत्व का अर्थ बतायें तो शुक्तिरूप्यादिभ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति वैसे ही स्थिर रहती है। वह नहीं हटेगी। क्योंकि 'केवल सत्त्व' भ्रमज्ञान में भी है। परन्तु वह ज्ञान, लक्ष्य नहीं है।
इस शङ्का का निरसन 'शुक्तिरूप्यादिभ्रमस्य० ग्रन्थ से किया है। शुक्ति-रूप्यादि-भ्रमज्ञान का विषय प्रातिभासिक रजत है। वह (शुक्ति में भासित होने वाला वह रजत) संसारकालीन बाध का विषय होता है (व्यवहार काल में शुक्ति का ज्ञान होने पर उसका बाध होता है)। इसलिये 'विषय' में 'अबाधित' विशेषण के देने से शुक्तिरूप्यादिभ्रमज्ञान में लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।
'अबाधित' विशेषण का 'संसार दशा में व्यावहारिक सत्ता में अबाधित' (यह) अर्थ विवक्षित है। घटादि व्यावहारिक विषय व्यवहार काल में (व्यावहारिक सत्ता में) बाधित नहीं होते। वे तो पारमार्थिक सत्ता में (ब्रह्म ज्ञान होने पर) बाधित होते हैं। इसलिये घटादि ज्ञानों में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। इसलिये मूल में "व्यवहार काल में बाधित होनेवाला- बाध का विषय बनने वाला, (जो) प्रातिभासिक रजतादि (वह) भ्रमज्ञान का विषय होता है" कहा है। इससे पूर्वोक्त ज्ञेय-गत प्रत्यक्षत्व का लक्षण, भ्रान्ति ज्ञान के विषय में अतिव्याप्त नहीं होता। प्रतिभासिक का अर्थ है केवल प्रतीति काल में ही रहने वाला अनिर्वचनीय अर्थात् शुक्तिरजतज्ञान के समय अनिर्वचनीय रजतादि उत्पन्न होता है और वह शुक्तिज्ञान के होने पर बाधित होता है। इसलिए संसारकालीन-शुक्तिरजतादिज्ञान में बाधितविषयकत्व है। इसलिये वह पूर्वोक्त लक्षण का लक्ष्य नहीं बन सकता।
परन्तु इस समाधान से सन्तुष्ट न होनेवाला अन्यथा-ख्यातिवादी शंका करता है।
ननु विसंवादिप्रवृत्त्या १ भ्रान्तिज्ञानसिद्धावपि तस्य प्रातिभासिक-तत्कालोत्पन्न रजतादि विषय २ त्वे न प्रमाणम्, देशान्तरीय रजतस्य कॢप्तस्यैव तद्विषयत्वसंभवात् ।
१. नैयायिकः शङ्कते—भ्रमप्रत्यक्षं न तत्कालोत्पन्नरजतादिविषयकं, किन्तु देशान्तरीय सत्यरजतादिविषयकम् । 'विसंवादिप्रवृत्त्या'—तदर्थिनः तदप्राप्तिफलकप्रवृत्त्या अर्थात् निष्फलप्रवृत्त्या । नैयायिकानां मते—ज्ञानं यदा अनुव्यवसायेन गृह्यते, तदा तेन अनुव्यवसायेन तद्गतं भ्रमत्वं प्रमात्वं वा नैव गृह्यते, तयोः परतोग्राह्यत्वात् । किन्तु तज्ज्ञानजन्या प्रवृत्त्या तदनुमीयते । तथा च प्रयोगः—'शुक्तिरजतादिविषयकं ज्ञानं भ्रमः विसंवादिप्रवृत्तिजनकत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा प्रमा।' इत्थं विसंवादिप्रवृत्त्या ज्ञानस्य भ्रमत्वनिश्चयः । २. विषयकत्वे—इति पाठान्तरम् ।
१०० | वेदान्तपरिभाषा | [ ज्ञानलक्षणासन्निकर्षखण्डनम्
**अर्थ—**शुक्ति के कारण होनेवाले रजतज्ञान में की जाने वाली प्रवृत्ति, विसंवादि (मिथ्या) सिद्ध होती है। अर्थात् 'यह चाँदी है' (ऐसा) समझ उसे लेने के लिये प्रवृत्त होने पर हाथ में सीप आती है, इस कारण 'यह चाँदी है' इत्याकारक सीप में 'रजतज्ञान' भ्रम है, प्रमा (यथार्थ ज्ञान) नहीं है। यद्यपि यह सच है तथापि उस ज्ञान का विषय प्रातिभासिक (अनिर्वचनीय, प्रतीति काल में ही उत्पन्न होने वाला) रजतादि है—इस विषय में कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि अन्य स्थान में स्थित पूर्वसिद्ध रजत को ही तद्विषयत्व है (ऐसा) कह सकते हैं। सराफे में दूकान पर पूर्व से ही विद्यमान सत्य रजत उस शुक्तिरजतज्ञान का विषय हो सकता है।
विवरण—'यह चाँदी है' ज्ञान होने पर उसे लेने के लिए स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। उस हाथ में लेते ही सत्य रजत यदि हाथ लगा तो प्रवृत्ति संवादी है—कहा जाता है। उसे हाथ में लेकर देखने से यदि ज्ञात हुआ कि यह रजत न होकर सीप या अन्य कोई पदार्थ है तो प्रवृत्ति को विसंवादी प्रवृत्ति कहते हैं। शुक्ति-रजत ज्ञान से हुई प्रवृत्ति विसंवादी सिद्ध होती है। क्योंकि समीप पहुँचने पर दिखाई देता है कि यह रजत नहीं किन्तु 'शुक्ति' है। अतः इस विसंवादी प्रवृत्ति से शुक्तिरजतज्ञान का भ्रान्ति-ज्ञान होना सिद्ध होता है। परन्तु किसी प्रमाण के न होने से उस (भ्रम) ज्ञान का विषय, अनिर्वचनीय (उसी समय उत्पन्न हुआ =) प्रातिभासिक रजत नहीं है। (भ्रान्तिकाल में वह रजत उत्पन्न होता है इस विषय में प्रत्यक्षादि कोई प्रमाण नहीं है) यदि ऐसा कहें कि—'दूसरे विषय की अनुपपत्ति (असम्भव) ही अनिर्वचनीयरजत के विषय होने में प्रमाण है' तो यह अनुचित है, क्योंकि—अन्य प्रदेश (स्थान) में पहले से ही विद्यमान रजत, उस भ्रान्तिज्ञान का विषय हो सकता है।
'इति चेत्' ग्रन्थ से शंका का अनुवाद कर 'न०' आदि ग्रन्थ में उसका निरसन करते हैं—
इति चेत् न। तस्यासन्निकृष्टतया प्रत्यक्ष-विषयत्वायोगात्। 'न च ज्ञानं तत्र प्रत्यासत्तिः, ज्ञानस्य प्रत्यासत्तित्वे तत एव वह्नयादेः प्रत्यक्षत्वापत्तावनुमानाद्युच्छेदापत्तेः।
अर्थ—-'शुक्तिरजत' आदि भ्रान्तिज्ञान का विषय, 'तत्कालोत्पन्न अनिर्वचनीय रजत न होकर अन्यत्र स्थित सत्यरजत है' यदि कहें तो ठीक नहीं। क्योंकि अन्य प्रदेश में स्थित सत्य रजत, असन्निकृष्ट (दूर) रहता है। सन्निकृष्ट (समीप) न होने से ही 'यह रजत' इत्याकारक प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। (दूर स्थित सत्य रजत,
१. 'न च ज्ञानं तत्र प्रत्यासत्तिः-ज्ञानं ज्ञानलक्षणा तत्र देशान्तरीयरजतादौ, प्रत्यासत्तिः सन्निकर्षः।