वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७७
देवदत्तः, तत्त्वमसीत्यादि-वाक्यजन्य-^१ज्ञानम् ॥
**अर्थ—**और वह प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का है। एक सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक। उनमें विकल्प को विषय करनेवाले ज्ञान को 'सविकल्पक' ज्ञान कहते हैं। जैसे—'मैं घट को जानता हूँ' यह ज्ञान सविकल्प है। परन्तु संसर्ग को विषय न करनेवाला ज्ञान निर्विकल्प ज्ञान होता है। जैसे—'वह यह देवदत्त' 'वह (सत्) तू है' इत्यादि वाक्यों से उत्पन्न होने वाला ज्ञान।
**विवरण—**प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न करनेवाली वृत्ति का स्वरूप ऊपर बताया गया। अब प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रकारों को बताते हैं। 'विषयावच्छिन्न चैतन्यात्मक, जो वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य', वही प्रत्यक्ष-ज्ञान है। वह (प्रत्यक्ष) सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से दो प्रकार का है। मूल में 'सविकल्पक और निर्विकल्पक' ऐसा उद्देश्य किया है (प्रत्यक्ष के दो प्रकारों में से)—'सविकल्पक' का निर्देश प्रथम किया है। सविकल्पक ज्ञान सभी को सम्मत है और समस्त व्यवहार में उसके प्रयोजक होने से 'तत्र' ग्रन्थ से प्रथमतः सविकल्पक ज्ञान का लक्षण कहा जाता है। विकल्प का अर्थ, 'वैशिष्ट्य' है। जो ज्ञान विकल्प से युक्त रहता है, वह सविकल्पक कहलाता है (जिस ज्ञान का विषय 'वैशिष्ट्य' होता है, वह सविकल्पक ज्ञान है) ग्रन्थकार ने 'वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानं सविकल्पकम्' इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान का लक्षण करके 'मैं घट को जानता हूँ, यह उदाहरण दिया है। इसमें 'वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानम्' इतना लक्षण है और 'सविकल्पकम्' यह लक्ष्य है। केवल 'वैशिष्ट्यवगाहि' इतना ही लक्षण यदि किया जाता तो वह 'इच्छा आदि' में अतिव्याप्त होता, क्योंकि इच्छादिक भी वैशिष्ट्य-विषयक होती हैं। (इच्छा का विषय वैशिष्ट्य ही रहता है) अतः इस अतिव्याप्ति का निवारण करने के लिए लक्षण में 'ज्ञान' पद दिया है। यदि केवल
जन्यमपि सन्निकृष्ट देवदत्तविषयकत्वात् प्रत्यक्षञ्च तत्, सन्निकृष्टविषये शब्दादपि प्रत्यक्षज्ञानाभ्युपगमात्।
एवं 'तत्त्वमसि' इत्यत्र तच्छब्देन शक्त्या सर्वज्ञत्वादिविशिष्टस्य चैतन्यस्य युष्मच्छब्देन असर्वज्ञत्वादि विशिष्टस्य चैतन्यस्य, प्रथमया च विभक्त्या अभेदस्य उपस्थितिर्भवति, ततः विशिष्टयोर्द्वयोरभेदान्वयो जायते। ततो मुख्यार्थस्य विशिष्टाऽभेदस्य बाधज्ञानं सम्पद्यते, ततो विशिष्टवाचकाभ्यां पदाभ्यां विरुद्धांशस्य सर्वज्ञत्वादेः परित्यागेन चैतन्यस्वरूपलक्षणया चैतन्यस्वरूपमात्रविषयकं ज्ञानं जायते। तच्च ज्ञानं संसर्गाऽविषयकत्वात् सन्निकृष्टविषयकत्वाच्च निर्विकल्पकम्प्रत्यक्षम्।
तथा च विवरणकारा अष्टमवर्णके—"सोयमिति विशिष्टाऽभिधायिभ्याम्पदाभ्यां स्वार्थैकदेशपरित्यागेनै कदेशलक्षणया देवदत्तस्वरूपैक्यं प्रतिपादयति।"
१. जन्यं ज्ञानम्—इति पाठान्तरम् ।