भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 482 में से

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५२वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

इस प्रकार हम वेदान्तपक्ष में लोकप्रसिद्धि का अनुसरण किस प्रकार होता है यह दिखाकर नैयायिक अपने पक्ष में लोकप्रसिद्धि का अतिक्रमण कैसे करते हैं, उसे दिखाने के लिये 'न्यायमते तु' इत्यादि ग्रंथ का प्रारम्भ करते हैं । न्यायमत में ही 'मैं पर्वत का अनुमान करता हूँ' यह अनुव्यवसाय होता है । क्योंकि नैयायिक पर्वत को और उस पर स्थित धूम को भी प्रत्यक्ष देखकर पश्चात् 'यह पर्वत वह्निमान् है' ऐसा अनुमान करता है । इस कारण 'यह घट' इस प्रकार पहले प्रत्यक्ष देखकर पश्चात् 'मैं घट को जानता हूँ' इस मानस-अनुव्यवसाय के समान उस अनुमितिज्ञान में भी अनुव्यवसायत्व है, व्यवसायत्व ( इन्द्रियजन्यपूर्वज्ञानत्व ) नहीं । मूलस्थ 'न्यायमते तु' यहाँ 'तु' शब्द वेदान्त से न्यायमत में वैलक्षण्य व्यक्त करने के लिए है । अब ग्रन्थकार किस अनुमिति में 'ज्ञान' सर्वांश में परोक्ष होता है—बताकर 'सुरभिचन्दनम्' ज्ञान में भी पूर्वोक्त न्याय ही लगता है—बताते हैं ।

'१असन्निकृष्टपक्षकानुमितौ तु सर्वांशेऽपि ज्ञानं परोक्षम् । सुरभि-चन्दनमित्यादिज्ञानमपि चन्दनखण्डांशे२ अपरोक्षं, सौरभांशे३ तु परोक्षं, सौरभस्य चक्षुरिन्द्रियायोग्यतया योग्यत्वघटितस्य निरुक्त-लक्षणस्याभावात्४ ॥

अर्थ—जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष, असन्निकृष्ट ( चक्षुरादि इन्द्रियों से असम्बद्ध इन्द्रियों का विषय न बननेवाला ) होता है । उसमें 'ज्ञान' सभी अंशों में परोक्ष ही होता है । क्योंकि 'योग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभेद' रूप प्रत्यक्षप्रयोजक का वहाँ अभाव है । 'यह चन्दन का मूठा सुगन्धी है' इत्यादि दूरस्थ मूठे को ( विषय को ) देख होनेवाला ज्ञान भी 'चन्दन का मूठा' इस अंश में अपरोक्ष और सुगन्ध अंश में परोक्ष है । क्योंकि 'सुगन्ध' चक्षुरिन्द्रिय के विषय होने योग्य नहीं है । ( सौरभ में चक्षुरिन्द्रिय का विषय बनने की योग्यता नहीं है ) और प्रत्यक्षप्रयोजकत्व के पूर्वोक्त लक्षण में 'योग्य' विशेषण दिया है । अतः योग्यत्वघटित निरुक्त ( पूर्वोक्त ) लक्षण का यहाँ अभाव है ।


१. 'पर्वतं पश्यामि, वह्निमनुमिनोमी'त्युपयुक्तप्रकारेण पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं वह्न्याद्यंशे च परोक्षत्वमिति अनुमितौ द्विरूपं ज्ञानं भवति चेत् 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः पृथिवीत्वात् घटवत्' इत्यादौ परमाण्वंशेऽपि प्रत्यक्षं स्यात्, इत्यत आह 'असन्निकृष्टे'ति । 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः' इत्यादौ अप्रत्यक्षपक्षकानुमितौ पक्षे साध्ये च ज्ञानं परोक्षमवगन्तव्यम् ।
२. चन्दनांशेऽपरोक्षमिति पाठान्तरम् ।
३. सौरभांशे परोक्षम्-इति पाठान्तरम् ।
४. वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याऽभिन्नयोग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्यत्वरूपस्य अभावत् । तत्र हेतुः इन्द्रियाऽसन्निकृष्टतयेति ।

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