भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 482 में से

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प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५१

अर्थ—इसलिये ( प्रमाणचैतन्य और योग्यवर्तमानविषयचैतन्य के अभेद को प्रत्यक्ष-प्रयोजकत्व है—हमारा यह अभ्युपगम होने से ही ) 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि ज्ञान भी 'वह्नि अंश' में परोक्ष और 'पर्वत अंश' में अपरोक्ष है, क्योंकि पर्वतादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य और इन्द्रिय के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरणवृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का अभेद है । परन्तु 'वह्नि अंश' में अन्तःकरण-वृत्ति का देह के बाहर निकलने का संभव न होने से वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमाणचैतन्य का परस्पर भेद है ( इस कारण 'पर्वतो वह्निमान्' यह अनुमिति-ज्ञान 'वह्नि अंश' में परोक्ष है ), तथा अनुभव भी 'मैं पर्वत को देखता हूँ और उस पर स्थित अग्नि का अनुमान करता हूँ' ऐसा ही है । परन्तु इसके विपरीत न्यायमत में 'मैं पर्वत का अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय होता है ।

विवरण—'प्रमाणचैतन्य और प्रमेयचैतन्य के अभेद' को हमने प्रत्यक्ष का प्रयोजक माना है । ( जिस ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट = अतिसमीप होता है, वह ज्ञान, इन्द्रिय-जन्य न होने पर भी अपरोक्ष माना जाता है ) इसलिये 'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि ज्ञान भी सन्निकृष्ट-स्थित 'पर्वत' अंश में अपरोक्ष है और चक्षु से सन्निकृष्ट न हुए 'वह्नि' अंश में परोक्ष है । 'पर्वत' अंश में अपरोक्ष कैसे होता है ? यदि पूछो, तो बताते हैं—पर्वतविशिष्ट चैतन्य और तदाकार-अन्तःकरणवृत्ति विशिष्ट चैतन्य का अभेद हुआ है । 'प्रमाणचैतन्य और विषयचैतन्य का अभेद ही प्रत्यक्ष का प्रयोजक ( कारण ) है' यह हमारा अभ्युपगम होने से 'पर्वत वह्निमान् है' यह ज्ञान, पर्वत रूप विषय-अंश में अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है । परन्तु उपर्युक्त वाक्य से जिस अग्नि का ज्ञान होता है उस अग्नि से अन्तःकरणवृत्ति का साक्षात् सम्बन्ध नहीं होता । इस कारण अग्निविशिष्ट चैतन्य और अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रमाणचैतन्य का परस्पर भेद है, अभेद नहीं । इसलिए वह्नि अंश में पूर्वोक्त ज्ञान को प्रत्यक्षत्व न होकर परोक्षत्व है ।

परन्तु भट्टापाद ने कहा है— 'सिद्धानुगममात्रं हि कर्तुंयुक्तं परीक्षकैः । न सर्वलोकसिद्धस्यलक्षणेन निवर्तनम् ॥' श्लो० वा० सू० ४-श्लो० १३३ ।

अर्थात् परीक्षकों को लोक-प्रसिद्धि का अनुसरण करना ही योग्य है । लोकप्रसिद्धि को छोड़कर केवल लक्षण से सर्वलोकप्रसिद्ध वस्तु का निवर्तन करना कभी भी उचित नहीं है । इसलिए 'पर्वत वह्निमान् है' इस प्रसिद्ध अनुमिति को केवल लक्षण के द्वारा हटाना योग्य नहीं है । इस शंका का समाधान ग्रंथकार 'तथा च' वाक्य से करते हैं । हमारे कहने के अनुसार ही लोकप्रसिद्धि भी ( लोगों का अनुभव भी ) है । सभी लोक 'मैं पर्वत को प्रत्यक्ष देखता हूँ' परन्तु उस पर स्थित अग्नि को प्रत्यक्ष नहीं देख रहा हूँ, किन्तु 'धूम' लिङ्ग से उसका अनुमान करता हूँ' यही कहते हैं । अर्थात् हम लोकप्रसिद्धि का अनुसरण कर ही—'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान 'पर्वत अंश' में अपरोक्ष है और 'वह्नि अंश' में परोक्ष है—कहते हैं; लोकप्रसिद्धि का अपलाप नहीं करते ।