भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108
५०वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

देखता हुआ भी 'मैं ही दसवाँ' यह ज्ञान किसी को भी नहीं हुआ था। 'प्रत्यक्ष-ज्ञान उत्पन्न करते समय इन्द्रियों को, शब्द का सहकारित्व रहता है' ऐसा किसी ने भी नहीं माना है। इसलिए 'तू दसवाँ' इस ज्ञान को 'शब्दसहकृत-इन्द्रियजन्यत्व होने से अपरोक्षत्व है' यह नहीं कह सकते और इन्द्रियजन्यत्व न होने से वह ज्ञान 'परोक्ष ही है' यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि उसे यदि परोक्ष कहें तो 'दसवाँ है' यह परोक्ष ज्ञान, 'दसवाँ नहीं' इस अपरोक्ष अध्यास की निवृत्ति नहीं कर पाता। इसलिए 'तू दसवाँ है' अथवा 'तू वह ब्रह्म है' इत्यादि अपरोक्ष-विषयक वाक्य से हुआ ज्ञान, अपरोक्ष ही है—यह मानना पड़ता है।$^१$

शंका—'अपरोक्ष-विषयक वाक्य से हुआ ज्ञान अपरोक्ष ही होता है' मानने पर 'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि अनुमिति-ज्ञान को भी प्रत्यक्ष कहना पड़ेगा, यह शंका कर अनुमिति ज्ञान में प्रत्यक्षत्व की प्राप्ति 'पर्वत' अंश में होगी या 'वह्नि' अंश में होगी ? पर्वतांश में यदि कहें तो वह हमें इष्ट ही है। इस आशय से ग्रंथकार समाधान करते हैं—

अत एव पर्वतो वह्निमानित्यादि ज्ञानमपि वह्न्यंशे परोक्षं पर्वतांशेऽपरोक्षम्, पर्वताद्यवच्छिन्न-चैतन्यस्य बहिर्निःसृतान्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्या$^२$भेदात् । वह्न्यंशे त्वन्तःकरणवृत्तिनिर्गम$^३$नासम्भवेन वह्न्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमाणचैतन्यस्य च परस्परं भेदात् । तथा चानुभवः 'पर्वतं पश्यामि, वह्निमनुमिनोमीति' ।

न्यायमते $^४$तु पर्वतमनुमिनोमीत्यनुव्यवसायापत्तिः ।


१. पं. द. तृप्तिदीप, श्लो० २३-२७ ।
२. 'न्यस्य च परस्परं भेदाभावात्'-इति पा. ।
३. 'माभावेन'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'मते पर्व०'-इति पाठान्तरम् ।
५. अयमभिप्रायः—विषयस्वरूपग्रहणसमकालमेव ज्ञानस्वरूपमपि गृह्यते । तत्र यादृशाकारो विषयः तादृशाकारमेव तं विषयं, ज्ञानं गृह्णाति । पर्वतांशे ज्ञानं यदि अनुमितिरूपं स्यात् तदा तदनुमितिरूपमेव गृह्णीयात् पर्वतमनुमिनोमीति, किन्तु तथा तन्नगृह्णाति । सर्वेषामपि ज्ञानग्रहणाकारः पर्वतं पश्यामीत्येव भवति । अयः पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं न लोकविरुद्धम् । किन्तु न्यायमते नैतत्सम्भवति, यतः न्यायमते व्यवसायानन्तरमनुव्यवसायो भवति । तत्र विषयज्ञानं व्यवसाय इत्युच्यते । ज्ञानस्य ज्ञानं तु अनुव्यवसाय इत्युच्यते । प्रत्यक्षे विषयज्ञानस्याकारो घटोऽयमिति । अनुमितौ पर्वतो वह्निमानिति । प्रत्यक्षे ज्ञानविषयक-ज्ञानस्याकारो घटं पश्यामीति । अर्थात् घट-विषयकज्ञानवानहमित्याकारः । अनुमितौ तु वह्निमनुमिनोमीति । अर्थात् वह्निविषयकानु-मितिज्ञानवानहमित्याकारः । तत्र पर्वतांशे ज्ञानं यदि अनुमितिरूपं स्यात्, तदा तदनुमिति-रूपं गृह्णीयात्, ज्ञानग्रहणाकारश्च पर्वतमनुमिनोमीति स्यात् । न च तथा नैयायिका-नामपि । अतः पर्वतांशे ज्ञानं प्रत्यक्षमेवाभ्युपगन्तव्यं, नाऽप्रत्यक्षम् ।

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 108, कुल 482 में से · BharatKosha