वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४९
समय 'सुख', वर्तमान तथा प्रत्यक्ष के योग्य भी होता है। इस कारण उस सुखज्ञान में 'योग्य और वर्तमान विषय' से अवच्छिन्न चैतन्य के साथ अभिन्न-तत्त्ववच्छिन्न चैतन्य, होता है। परन्तु 'त्वं सुखी' वाक्य से होने वाला ज्ञान, पूर्वोक्तलक्षण का लक्ष्य ही नहीं बन सकता। क्योंकि वाक्यजन्य-ज्ञान, नियमेन 'परोक्ष' रहता है। इस कारण वाक्य-जन्य-ज्ञान में (अलक्ष्य में लक्षण का रहना रूप) अतिव्याप्ति होती है।
सिद्धान्ती—'वाक्यजन्य-सुखादि-ज्ञान का प्रत्यक्ष होना' हमें इष्ट ही है। इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है।
वादी—(१) 'तू सुखी है' इत्यादि वाक्य, स्वविषय सुखादि का अपरोक्ष ज्ञान करानेवाला नहीं होता। (२) क्योंकि यह वाक्य है। सभी वाक्य परोक्ष ज्ञान कराने वाले होते हैं—यह व्याप्ति है। (३) ज्योतिष्टोमादि वाक्यों के समान। अथवा (१) 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञान अपरोक्ष नहीं है। क्योंकि वह वाक्यजन्य है। (२) ज्योतिष्टोमादि वाक्यजन्य ज्ञान के तुल्य। इत्यादि अनुमान-प्रमाण¹ से वाक्यजन्य-ज्ञान को नियमेन परोक्षत्व होता है। ऐसी स्थिति में आप 'तू सुखी है' इस वाक्य से होनेवाले ज्ञान में अपरोक्षत्व हमें इष्ट ही है—कैसे कह सकते हैं ?
सिद्धान्ती—'तू दसवां है' इस वाक्य से 'मैं दसवां हूँ' इत्याकारक ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट = प्रत्यक्ष होने से उससे होने वाला ज्ञान भी 'प्रत्यक्ष' है। इस कारण 'वाक्य-जन्य ज्ञान में नियमेन परोक्षत्व ही रहता है'—आपके इस नियम का सन्निकृष्ट विषयक वाक्यार्थज्ञान में व्यभिचार होता है। उपर्युक्त दो अनुमानों में आपने क्रमशः 'वाक्य-त्वात्' और 'वाक्यजन्यत्वात्' दिये हुए दोनों हेतु, सोपाधिक हैं, उनमें 'सन्निकृष्ट-विषयत्व' उपाधि² है। सिवाय हेतुओं में सत्प्रतिपक्षत्व भी है। (१) 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यजन्य-ज्ञान, अपरोक्ष है। (२) क्योंकि उसका विषय अपरोक्ष है। (३) चाक्षुष प्रत्यक्ष के तुल्य। इस प्रत्यनुमान³ में हेतु के साध्य का (परोक्षत्व का) अभाव सिद्ध करनेवाला है। इस कारण आपके दोनों हेतु सत्प्रतिपक्षित⁴ हैं।
'तू दसवां है' इस वाक्य को सुनकर 'मैं ही दसवां हूँ' यह जो ज्ञान होता है, उसे इन्द्रियजन्य नहीं कह सकते। क्योंकि पूर्वोक्त वाक्य के श्रवण से पूर्व, इन्द्रियसन्निकर्ष के रहने पर भी (अन्य सब, दसवें मनुष्य को और स्वयं को दसवां स्वयं को प्रत्यक्ष
१. 'त्वं सुखी'त्यादिवाक्यं सुखविषयकाऽपरोक्षज्ञानाऽजनकं वाक्यत्वात्, ज्योतिष्टोमादिवाक्यवत् । यद् यद्वाक्यं तत्तत्परोक्षज्ञानजनकमितिव्याप्तिः ।
अथवा—'तत्त्वमसीत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं परोक्षं, वाक्यजन्यत्वात् ज्योतिष्टोमादिवाक्यजन्यज्ञानवत् ।'
२. उपाधिर्नाम—साध्यव्यापकत्वेसति साधनाऽव्यापकत्वम् ।
३. 'तत्त्वमसीत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानम् अपरोक्षम्, अपरोक्षविषयत्वात्, चाक्षुषप्रत्यक्षवत्
४. 'साध्याभावसाधकं हेत्वन्तरं यस्य स सत्प्रतिपक्षः ।'