वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रत्यक्षविचारः
को बिना शरण किये बता नहीं सकते। इसलिए एक ही वस्तु के अनेक धर्मों में प्रत्यक्ष योग्यता है और कुछ में नहीं, इसमें स्वभावविशेष ही नियामक है।
इस प्रकार प्रत्यक्षत्वप्रयोजक-लक्षण की धर्माधर्म के शब्द ज्ञान में शंकित अतिव्याप्ति का असंभव दिखाकर पुनश्च आगामी शंका को बताते हुए उसका समाधान करते हैं—
न चैवमपि सुखस्य वर्तमानतादशायां त्वं सुखीत्यादिवाक्यजन्यज्ञानस्य प्रत्यक्षता स्यादिति वाच्यम्। इष्टत्वात्, 'दशमस्त्वमसि' इत्यादौ सन्निकृष्टविषये शब्दादप्यपरोक्षज्ञानाभ्युपगमात्¹।
अर्थ— "'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने पर भी सुख की वर्तमान अवस्था में 'तू सुखी है' इस वाक्य से पैदा होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्षता प्राप्त होगी (वह वाक्यजन्य ज्ञान, प्रत्यक्ष है)। अर्थात् वह 'योग्य' पदघटित लक्षण भी वाक्यजन्य ज्ञान में अतिव्याप्त होगा।" यह कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि उस वाक्यजन्य ज्ञान को हम 'अपरोक्ष' ही मानते हैं और यही हमें इष्ट है (उसका अपरोक्षत्व ही हमें सम्मत है)। इस कारण पूर्वोक्त लक्षण पर अतिव्याप्ति नहीं होने पाती। कारण 'तू दसवाँ है' इत्यादि जिस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय संनिकृष्ट होता है, ऐसे शब्द से होनेवाला ज्ञान भी अपरोक्ष ही होता है, यह हमारा अभ्युपगम (सिद्धान्त) है। अतः पूर्वोक्त दोष नहीं है।
विवरण— प्रत्यक्षत्वप्रयोजक-लक्षण के 'विषय' पद में 'वर्तमानत्व' और 'योग्यत्व' इन दो विशेषणों के लगाने पर भी सुख की वर्तमानतावस्था में (जब कि व्यक्ति, सुख का साक्षात् अनुभव ले रहा हो तब) किसी व्यक्ति से 'तुम सुखी हो' कहने पर 'मैं सुखी हूँ' इत्याकारक ज्ञान को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होगा। (तुम सुखी हो' इस वाक्य से होने वाले 'मैं सुखी हूँ' इत्याकारक ज्ञान को अपरोक्ष = प्रत्यक्ष कहना होगा) क्योंकि सुखा-
१. शब्दो हि परोक्षज्ञानजननस्वभावः कथमिव अपरोक्षज्ञानं स जनयेत्? इति जिज्ञासायां 'दशमस्त्वमसी'ति आप्तवाक्याज्जायमानं 'दशमत्व'-ज्ञानमपरोक्षमेव, न परोक्षम्। अन्यथा अपरोक्षस्य भ्रमस्याऽनिवृत्तेः। अपरोक्षज्ञानमेव भ्रमनिवर्तकं भवति तथा च पञ्चदशीकाराः—
"न मृतो दशमोऽस्तीति श्रुत्वाप्तवचनं तदा।
परोक्षत्वेन दशमं वेत्ति स्वर्गादिलोकवत्॥
त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शितः।
अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति॥"
न च आप्तवाक्यस्य अपरोक्षज्ञानजनकत्वे शाब्दबोधोच्छेद एव स्यादिति शङ्कनीयम्। प्रमातृभिन्नाथंकस्य शब्दस्यैव अपरोक्षज्ञानजनकत्वमिति नियमः, नान्यस्य। अत एव 'सन्निकृष्टविषये प्रमातृभिन्नाथंविषय इत्यर्थः, न तु इन्द्रिय सन्निकृष्टे विषये' इत्यवगन्तव्यम्, तथैव प्रमाणान्तरस्यापि प्रमातृभिन्नाथंविषये अपरोक्षज्ञानजनकत्वमस्ति।