वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४७
क्योंकि योग्यत्व को भी विषयविशेषणत्व है । ( प्रत्यक्षत्वप्रयोजक के लक्षण में 'विषय' शब्द के साथ 'वर्तमान' विशेषण की तरह 'योग्य' विशेषण भी जोड़ना चाहिये । तब धर्मा-धर्मादिकों के शाब्द-ज्ञान में प्रत्यक्षत्वप्रयोजक लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि सुखादिकों की तरह धर्मादिकों में अन्तःकरणधर्मत्व होने पर भी उनमें से कुछ प्रत्यक्षयोग्य और कुछ प्रत्यक्ष के अयोग्य हुआ करते हैं, इस विषय में फलबल से कल्पनीय स्वभाव ही शरण ( आधार ) है । ऐसा न मानने पर न्यायमत पर भी यही दोष आता है । न्यायमत में भी सुखादिकों की तरह धर्मादिकों में भी आत्मधर्मत्व समान होने से प्रत्यक्षत्व की प्राप्ति होना दुर्वार ( अपरिहार्य ) है । अर्थात् नैयायिक सुख-दुःख के समान धर्म अधर्म को भी आत्मा के धर्म जानते हैं । इस कारण फलबलकल्प्य स्वभाव का शरण न मानने पर उन्हें भी सुखादि की तरह धर्माधर्म का प्रत्यक्ष होना स्वीकार करना होगा ।
विवरण--'प्रमाणचैतन्य और वर्तमानविषयावच्छिन्न-चैतन्य का अभेद' प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है । यहाँ पर 'विषय' को 'वर्तमान' विशेषण की तरह 'योग्यत्व' विशेषण भी देना चाहिये । योग्यत्व का अर्थ है—प्रत्यक्षयोग्यत्व । इस विशेषण के जोड़ने पर 'वर्तमान और प्रत्यक्ष ज्ञान के योग्य होना—विषयावच्छिन्न चैतन्य का वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य के साथ अभेद रहना—प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है—' यह लक्षण सिद्ध होता है । धर्म और अधर्म प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं किन्तु परोक्ष हैं, और प्रस्तुत लक्षण में 'विषय' को 'प्रत्यक्षयोग्य' विशेषण दिया है । इस कारण उक्त लक्षण की धर्माधर्म में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
शंका—सुखादि और धर्मादि दोनों यदि अन्तःकरण के ही धर्म हैं अर्थात् दोनों में अन्तःकरणधर्मत्व यदि समान है तो उनमें से कुछ धर्मों में प्रत्यक्ष योग्यता है और कुछ में नहीं—यह मानने में क्या नियामक है ?
समाधान—सुखादि और धर्मादि दोनों यद्यपि एक अन्तःकरण के ही धर्म हैं तथापि तद्वृत्ति-सुखादि, प्रत्यक्ष ज्ञान के योग्य हैं और धर्मादि, प्रत्यक्ष योग्य नहीं हैं—ऐसा मानने में कारण उनका भिन्न-स्वभाव ही है । अनुद्भूतत्व, धर्मादिकों का स्वभाव है । इस कारण धर्मादिक, प्रत्यक्ष के योग्य नहीं हैं और उद्भूतत्व, सुखादिकों का स्वभाव है, इस कारण सुखादिक, प्रत्यक्ष के योग्य हैं । अर्थात् अन्तःकरण के धर्मों में से कुछ प्रत्यक्ष के योग्य हैं और कुछ नहीं । इस विषय में फलबल से कल्पनीय ( फल रूप कार्य से अनुमान किया जाने वाला ) पूर्वोक्त उद्भूतत्व और अनुद्भूतत्वरूप स्वभाव ही अगत्त्या स्वीकार करना पड़ता है । इसके सिवाय अन्य उपाय नहीं । नैयायिकों को भी इस फलबलकल्प्य स्वभाव का सहारा लेना है । अन्यथा उनके मत में भी धर्मादिकों का प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि वे सुखादिकों को तो प्रत्यक्ष योग्य मानते हैं और धर्मादिकों को प्रत्यक्ष के अयोग्य मानते हैं । परन्तु इसकी उपपत्ति को वे भी फलबलकल्प्य-स्वभाव