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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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४६वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

अर्थ—ऐसा मानने पर भी जिस समय अपने वर्तमान धर्माधर्म, शब्दादिप्रमाणों के द्वारा जाने जाते हैं, तब उस तरह के शाब्द ज्ञान में अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि वहाँ पर धर्मादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य और तदाकार-वृत्त्यवच्छिन्न हुए चैतन्य दोनों का एकत्व रहता है।

विवरण—'विषय' में 'वर्तमान' विशेषण को लगाने पर भी धर्माधर्मविषयकशाब्द-ज्ञान में उस लक्षण की अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि धर्माधर्म में वर्तमानत्व है। धर्म और अधर्म, मन के धर्म होने पर भी वे स्वभाववैचित्र्य के कारण परोक्ष ही हैं। तथापि 'आप धार्मिक हैं,' 'तू अधार्मिक है' इत्यादि वाक्यरूप शब्द सुनकर 'मैं धार्मिक हूँ' इत्यादि ज्ञान होता है। वह ज्ञान शब्दजन्य होने से शाब्द है। इस शाब्द-ज्ञान में धर्मा-धर्म रूप विषय और तदाकार-वृत्ति (अन्तःकरणपरिणाम) ये दोनों उपाधियाँ एकदेश में स्थित होने से दोनों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का भी अभेद है। इस कारण विषया-वच्छिन्न से वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य के अभेदरूप प्रत्यक्ष का प्रयोजकत्व, धर्माधर्मादिकों के शाब्द ज्ञान में है। क्योंकि सुखादि आन्तर पदार्थों का अन्तःकरण के साथ बिना बाहर गये ही परिणाम होता है, यह अनुभवसिद्ध है। यही प्रकार धर्माधर्मादिकों में भी है। मूलस्थ 'शब्दादिना' के आदि पद से 'मैं सुकृतादृष्ट से (पुण्य से) युक्त हूँ, क्योंकि मैं सुखी हूँ। मैं दुष्कृतादृष्ट से युक्त हूँ, क्योंकि मैं दुःखी हूँ' इत्याकारक अनुमानादिकों का ग्रहण करना चाहिये। शाब्द ज्ञानादिकों में उन धर्मादिकों के जो शब्दादि प्रमाण हैं, उनसे अवच्छिन्न-चैतन्य का और वर्तमान धर्मादिविषयावच्छिन्न-चैतन्य का अभेद है। इस कारण ऐसे धर्माधर्मादिकों के शब्द-ज्ञान में पुनः प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक के लक्षण की अतिव्याप्ति हुई। मूल में 'स्वकीयधर्माधर्मों' कहा गया है। यहाँ 'स्वकीय' शब्द से प्रमाण और विषय का एकदेशस्थत्व सूचित किया है।

अब सिद्धान्ती 'इति चेत्' पद से पूर्वोक्त शंका का अनुवाद करके 'न' इत्यादि अग्रिम ग्रन्थ से उसका निरसन करता है—

इति चेत् ? न। योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात्। अन्तःकरण-धर्मत्वाविशेषेऽपि किञ्चिदयोग्यं किञ्चिद्योग्यमित्यत्र फलबलकल्प्यः स्वभाव एव शरणम्। अन्यथा न्यायमतेऽप्यात्मधर्मत्वाविशेषात्¹ सुखादिवद्धर्मादेरपि² प्रत्यक्षत्वापत्तिर्दुर्वारा ॥

अर्थ—('विषय' में 'वर्तमान' विशेषण के देने पर भी वर्तमान धर्माधर्म के शाब्दजन्य ज्ञान में लक्षण की अतिव्याप्ति होती है) ऐसा यदि कहें तो ठीक नहीं है।


१. 'षेऽपि' - इति पाठान्तरम् ।
२. 'देः प्रत्य०'-इति पाठान्तरम् ।