वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
| ५० | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रत्यक्षविचारः |
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देखता हुआ भी 'मैं ही दसवाँ' यह ज्ञान किसी को भी नहीं हुआ था। 'प्रत्यक्ष-ज्ञान उत्पन्न करते समय इन्द्रियों को, शब्द का सहकारित्व रहता है' ऐसा किसी ने भी नहीं माना है। इसलिए 'तू दसवाँ' इस ज्ञान को 'शब्दसहकृत-इन्द्रियजन्यत्व होने से अपरोक्षत्व है' यह नहीं कह सकते और इन्द्रियजन्यत्व न होने से वह ज्ञान 'परोक्ष ही है' यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि उसे यदि परोक्ष कहें तो 'दसवाँ है' यह परोक्ष ज्ञान, 'दसवाँ नहीं' इस अपरोक्ष अध्यास की निवृत्ति नहीं कर पाता। इसलिए 'तू दसवाँ है' अथवा 'तू वह ब्रह्म है' इत्यादि अपरोक्ष-विषयक वाक्य से हुआ ज्ञान, अपरोक्ष ही है—यह मानना पड़ता है।$^१$
शंका—'अपरोक्ष-विषयक वाक्य से हुआ ज्ञान अपरोक्ष ही होता है' मानने पर 'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि अनुमिति-ज्ञान को भी प्रत्यक्ष कहना पड़ेगा, यह शंका कर अनुमिति ज्ञान में प्रत्यक्षत्व की प्राप्ति 'पर्वत' अंश में होगी या 'वह्नि' अंश में होगी ? पर्वतांश में यदि कहें तो वह हमें इष्ट ही है। इस आशय से ग्रंथकार समाधान करते हैं—
अत एव पर्वतो वह्निमानित्यादि ज्ञानमपि वह्न्यंशे परोक्षं पर्वतांशेऽपरोक्षम्, पर्वताद्यवच्छिन्न-चैतन्यस्य बहिर्निःसृतान्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्या$^२$भेदात् । वह्न्यंशे त्वन्तःकरणवृत्तिनिर्गम$^३$नासम्भवेन वह्न्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमाणचैतन्यस्य च परस्परं भेदात् । तथा चानुभवः 'पर्वतं पश्यामि, वह्निमनुमिनोमीति' ।
न्यायमते $^४$तु पर्वतमनुमिनोमीत्यनुव्यवसायापत्तिः ।
१. पं. द. तृप्तिदीप, श्लो० २३-२७ ।
२. 'न्यस्य च परस्परं भेदाभावात्'-इति पा. ।
३. 'माभावेन'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'मते पर्व०'-इति पाठान्तरम् ।
५. अयमभिप्रायः—विषयस्वरूपग्रहणसमकालमेव ज्ञानस्वरूपमपि गृह्यते । तत्र यादृशाकारो विषयः तादृशाकारमेव तं विषयं, ज्ञानं गृह्णाति । पर्वतांशे ज्ञानं यदि अनुमितिरूपं स्यात् तदा तदनुमितिरूपमेव गृह्णीयात् पर्वतमनुमिनोमीति, किन्तु तथा तन्नगृह्णाति । सर्वेषामपि ज्ञानग्रहणाकारः पर्वतं पश्यामीत्येव भवति । अयः पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं न लोकविरुद्धम् । किन्तु न्यायमते नैतत्सम्भवति, यतः न्यायमते व्यवसायानन्तरमनुव्यवसायो भवति । तत्र विषयज्ञानं व्यवसाय इत्युच्यते । ज्ञानस्य ज्ञानं तु अनुव्यवसाय इत्युच्यते । प्रत्यक्षे विषयज्ञानस्याकारो घटोऽयमिति । अनुमितौ पर्वतो वह्निमानिति । प्रत्यक्षे ज्ञानविषयक-ज्ञानस्याकारो घटं पश्यामीति । अर्थात् घट-विषयकज्ञानवानहमित्याकारः । अनुमितौ तु वह्निमनुमिनोमीति । अर्थात् वह्निविषयकानु-मितिज्ञानवानहमित्याकारः । तत्र पर्वतांशे ज्ञानं यदि अनुमितिरूपं स्यात्, तदा तदनुमिति-रूपं गृह्णीयात्, ज्ञानग्रहणाकारश्च पर्वतमनुमिनोमीति स्यात् । न च तथा नैयायिका-नामपि । अतः पर्वतांशे ज्ञानं प्रत्यक्षमेवाभ्युपगन्तव्यं, नाऽप्रत्यक्षम् ।
प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५१
अर्थ—इसलिये ( प्रमाणचैतन्य और योग्यवर्तमानविषयचैतन्य के अभेद को प्रत्यक्ष-प्रयोजकत्व है—हमारा यह अभ्युपगम होने से ही ) 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि ज्ञान भी 'वह्नि अंश' में परोक्ष और 'पर्वत अंश' में अपरोक्ष है, क्योंकि पर्वतादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य और इन्द्रिय के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरणवृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का अभेद है । परन्तु 'वह्नि अंश' में अन्तःकरण-वृत्ति का देह के बाहर निकलने का संभव न होने से वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमाणचैतन्य का परस्पर भेद है ( इस कारण 'पर्वतो वह्निमान्' यह अनुमिति-ज्ञान 'वह्नि अंश' में परोक्ष है ), तथा अनुभव भी 'मैं पर्वत को देखता हूँ और उस पर स्थित अग्नि का अनुमान करता हूँ' ऐसा ही है । परन्तु इसके विपरीत न्यायमत में 'मैं पर्वत का अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय होता है ।
विवरण—'प्रमाणचैतन्य और प्रमेयचैतन्य के अभेद' को हमने प्रत्यक्ष का प्रयोजक माना है । ( जिस ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट = अतिसमीप होता है, वह ज्ञान, इन्द्रिय-जन्य न होने पर भी अपरोक्ष माना जाता है ) इसलिये 'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि ज्ञान भी सन्निकृष्ट-स्थित 'पर्वत' अंश में अपरोक्ष है और चक्षु से सन्निकृष्ट न हुए 'वह्नि' अंश में परोक्ष है । 'पर्वत' अंश में अपरोक्ष कैसे होता है ? यदि पूछो, तो बताते हैं—पर्वतविशिष्ट चैतन्य और तदाकार-अन्तःकरणवृत्ति विशिष्ट चैतन्य का अभेद हुआ है । 'प्रमाणचैतन्य और विषयचैतन्य का अभेद ही प्रत्यक्ष का प्रयोजक ( कारण ) है' यह हमारा अभ्युपगम होने से 'पर्वत वह्निमान् है' यह ज्ञान, पर्वत रूप विषय-अंश में अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है । परन्तु उपर्युक्त वाक्य से जिस अग्नि का ज्ञान होता है उस अग्नि से अन्तःकरणवृत्ति का साक्षात् सम्बन्ध नहीं होता । इस कारण अग्निविशिष्ट चैतन्य और अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रमाणचैतन्य का परस्पर भेद है, अभेद नहीं । इसलिए वह्नि अंश में पूर्वोक्त ज्ञान को प्रत्यक्षत्व न होकर परोक्षत्व है ।
परन्तु भट्टापाद ने कहा है— 'सिद्धानुगममात्रं हि कर्तुंयुक्तं परीक्षकैः । न सर्वलोकसिद्धस्यलक्षणेन निवर्तनम् ॥' श्लो० वा० सू० ४-श्लो० १३३ ।
अर्थात् परीक्षकों को लोक-प्रसिद्धि का अनुसरण करना ही योग्य है । लोकप्रसिद्धि को छोड़कर केवल लक्षण से सर्वलोकप्रसिद्ध वस्तु का निवर्तन करना कभी भी उचित नहीं है । इसलिए 'पर्वत वह्निमान् है' इस प्रसिद्ध अनुमिति को केवल लक्षण के द्वारा हटाना योग्य नहीं है । इस शंका का समाधान ग्रंथकार 'तथा च' वाक्य से करते हैं । हमारे कहने के अनुसार ही लोकप्रसिद्धि भी ( लोगों का अनुभव भी ) है । सभी लोक 'मैं पर्वत को प्रत्यक्ष देखता हूँ' परन्तु उस पर स्थित अग्नि को प्रत्यक्ष नहीं देख रहा हूँ, किन्तु 'धूम' लिङ्ग से उसका अनुमान करता हूँ' यही कहते हैं । अर्थात् हम लोकप्रसिद्धि का अनुसरण कर ही—'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान 'पर्वत अंश' में अपरोक्ष है और 'वह्नि अंश' में परोक्ष है—कहते हैं; लोकप्रसिद्धि का अपलाप नहीं करते ।
| ५२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रत्यक्षविचारः |
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इस प्रकार हम वेदान्तपक्ष में लोकप्रसिद्धि का अनुसरण किस प्रकार होता है यह दिखाकर नैयायिक अपने पक्ष में लोकप्रसिद्धि का अतिक्रमण कैसे करते हैं, उसे दिखाने के लिये 'न्यायमते तु' इत्यादि ग्रंथ का प्रारम्भ करते हैं । न्यायमत में ही 'मैं पर्वत का अनुमान करता हूँ' यह अनुव्यवसाय होता है । क्योंकि नैयायिक पर्वत को और उस पर स्थित धूम को भी प्रत्यक्ष देखकर पश्चात् 'यह पर्वत वह्निमान् है' ऐसा अनुमान करता है । इस कारण 'यह घट' इस प्रकार पहले प्रत्यक्ष देखकर पश्चात् 'मैं घट को जानता हूँ' इस मानस-अनुव्यवसाय के समान उस अनुमितिज्ञान में भी अनुव्यवसायत्व है, व्यवसायत्व ( इन्द्रियजन्यपूर्वज्ञानत्व ) नहीं । मूलस्थ 'न्यायमते तु' यहाँ 'तु' शब्द वेदान्त से न्यायमत में वैलक्षण्य व्यक्त करने के लिए है । अब ग्रन्थकार किस अनुमिति में 'ज्ञान' सर्वांश में परोक्ष होता है—बताकर 'सुरभिचन्दनम्' ज्ञान में भी पूर्वोक्त न्याय ही लगता है—बताते हैं ।
'१असन्निकृष्टपक्षकानुमितौ तु सर्वांशेऽपि ज्ञानं परोक्षम् । सुरभि-चन्दनमित्यादिज्ञानमपि चन्दनखण्डांशे२ अपरोक्षं, सौरभांशे३ तु परोक्षं, सौरभस्य चक्षुरिन्द्रियायोग्यतया योग्यत्वघटितस्य निरुक्त-लक्षणस्याभावात्४ ॥
अर्थ—जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष, असन्निकृष्ट ( चक्षुरादि इन्द्रियों से असम्बद्ध इन्द्रियों का विषय न बननेवाला ) होता है । उसमें 'ज्ञान' सभी अंशों में परोक्ष ही होता है । क्योंकि 'योग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभेद' रूप प्रत्यक्षप्रयोजक का वहाँ अभाव है । 'यह चन्दन का मूठा सुगन्धी है' इत्यादि दूरस्थ मूठे को ( विषय को ) देख होनेवाला ज्ञान भी 'चन्दन का मूठा' इस अंश में अपरोक्ष और सुगन्ध अंश में परोक्ष है । क्योंकि 'सुगन्ध' चक्षुरिन्द्रिय के विषय होने योग्य नहीं है । ( सौरभ में चक्षुरिन्द्रिय का विषय बनने की योग्यता नहीं है ) और प्रत्यक्षप्रयोजकत्व के पूर्वोक्त लक्षण में 'योग्य' विशेषण दिया है । अतः योग्यत्वघटित निरुक्त ( पूर्वोक्त ) लक्षण का यहाँ अभाव है ।
१. 'पर्वतं पश्यामि, वह्निमनुमिनोमी'त्युपयुक्तप्रकारेण पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं वह्न्याद्यंशे च परोक्षत्वमिति अनुमितौ द्विरूपं ज्ञानं भवति चेत् 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः पृथिवीत्वात् घटवत्' इत्यादौ परमाण्वंशेऽपि प्रत्यक्षं स्यात्, इत्यत आह 'असन्निकृष्टे'ति । 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः' इत्यादौ अप्रत्यक्षपक्षकानुमितौ पक्षे साध्ये च ज्ञानं परोक्षमवगन्तव्यम् ।
२. चन्दनांशेऽपरोक्षमिति पाठान्तरम् ।
३. सौरभांशे परोक्षम्-इति पाठान्तरम् ।
४. वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याऽभिन्नयोग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्यत्वरूपस्य अभावत् । तत्र हेतुः इन्द्रियाऽसन्निकृष्टतयेति ।
प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५३
विवरण—परन्तु इसके विपरीत ( १ )—'पृथिवी के परमाणु गंधवान् हैं। ( २ )—क्योंकि उनमें पृथिवीत्व है। ( ३ )—घटादिकों के समान' । इस अनुमान¹ में पृथिवी के परमाणु-पक्ष हैं। परन्तु वे अप्रत्यक्ष ( असन्निकृष्ट ) हैं। क्योंकि उनमें प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है। इसी तरह जिस अनुमिति-ज्ञान में 'पक्ष' अप्रत्यक्ष होता है उस अनुमान में पक्ष और साध्य रूप दोनों अंशों में ज्ञान 'परोक्ष' होता है। और जिस अनुमिति में पक्ष, प्रत्यक्ष रहता है वहाँ पक्ष रूप अंश में ज्ञान प्रत्यक्ष रहता है और साध्य अप्रत्यक्ष ( परोक्ष ) रहता है। अतः जिस अनुमिति में पक्ष तथा साध्य भी अप्रत्यक्ष हो वहाँ पक्ष और साध्य रूप दोनों अंशों में ज्ञान परोक्ष ही रहता है—इस नियम के अनुसार ही 'सुरभिचन्दनम्' ज्ञान की विशेषता के सम्बन्ध में शंका करते हैं—
शंका—चन्दन का मूठा; देखनेवाले व्यक्ति से दूर है, और उस व्यक्ति को 'यह चन्दन का मूठा सुगन्धी है' इत्याकारक ज्ञान उस मूठे को देखकर ही हुआ है। ऐसी स्थिति में यह ज्ञान 'सौरभ' अंश में परोक्ष है या अपरोक्ष ? उस ज्ञान में परोक्ष की सामग्री न होने से उसे परोक्ष नहीं कह सकते। 'जहाँ जहाँ चन्दन का टुकड़ा होता है, वहाँ वहाँ सुरभित्व होता है' इत्यादि व्याप्तिज्ञानादि, 'परोक्ष ज्ञान' की सामग्री है, परन्तु वह ( सामग्री ) 'चन्दन सुरभि है' इस ज्ञान के पूर्व सम्भव नहीं होती। सिवाय उस ज्ञान का विषय जो 'सौरभ', वह प्रत्यक्ष-योग्य भी है। इसलिए उस विषय में भी अनुमान करना व्यर्थ है। अतः 'सुरभि चन्दनम्' यहाँ ज्ञान को 'सौरभ अंश' में परोक्ष नहीं कह सकते, और अपरोक्ष भी नहीं कह सकते। क्योंकि वहाँ सुगन्धाकार वृत्ति, उत्पन्न नहीं हुई है। और विषयाकार वृत्ति जब तक उत्पन्न नहीं होती तब तक अपरोक्ष ज्ञान का सम्भव नहीं।
समाधान—इस पर सिद्धान्ती कहता है—'चन्दन सुगन्धि है' यहाँ सौरभ अंश में ज्ञान को हम परोक्ष ही मानते हैं। ( मूल में 'इत्यादि ज्ञानम्' के आदि शब्द से 'मधुर आम्रफल' इत्यादि दूसरे ज्ञानों का भी ग्रहण करना चाहिये ) किसी व्यक्ति ने दूर से ही चन्दन का मूठा अथवा आम्रफल को चक्षु से देखा और उसे वह मूठा या फल देखकर ही 'चन्दन सुगन्धि है और आम्रफल मधुर है' ज्ञान हुआ। उस स्थिति में उसे गन्ध का या रस का जो ज्ञान हो रहा है, वह परोक्ष है या अपरोक्ष ? क्योंकि उसने चन्दन को स्वयं सूंघा नहीं या आम्रफल को चखा नहीं, किन्तु दूर से ही उन पदार्थों को चक्षु से केवल देखा है। अतः उस ज्ञान में संशय होता है।
तथापि ऐसे प्रसंग में गंध-रसादिकों का ज्ञान 'परोक्ष' और चन्दन का टुकड़ा तथा आम्रफल का ज्ञान 'अपरोक्ष' रहता है, यही मानना चाहिये। क्योंकि उस व्यक्ति ने पहले उसी चन्दन का यदि गन्ध लिया होता तो मूठे को केवल देखकर ही 'वह सुगन्धी है' यह उत्पन्न हुआ ज्ञान 'स्मृति' कहावेगा। और यदि उसने पहले बिना सूंघे ही 'वह
१. 'पृथिवीपरमाणवः गन्धवन्तः पृथिवीत्वात् घटवत्' इत्यनुमानम् ।
५४ | वेदान्तपरिभाषा | [ जातिखण्डनम्
सुगंधी है' यह ज्ञान उसे हो रहा हो तो 'चन्दन-खण्डत्व' रूप लिंग (हेतु) से होनेवाला सौरभज्ञान 'अनुमितिज्ञान' कहावेगा। आम्रफल के मधुर रस के विषय में भी इसी तरह समझना चाहिये। क्योंकि पूर्वोक्त 'पर्वत अग्निमान् है' इस अनुमितिज्ञान में पर्वत की तरह प्रस्तुत उदाहरण में सौरभ व माधुर्य का आश्रयभूत मूठा और आम्रफल प्रत्यक्ष दीखते हैं। इस कारण तत्तद् अंश में उनका ज्ञान अपरोक्ष ही है।
शंका—सौरभ में भी योग्यविषयता है। वह घ्राणेन्द्रिय का विषय बन सकता है। तब सौरभ अंश में भी ज्ञान अपरोक्ष क्यों नहीं ? अर्थात् सुगन्ध में इन्द्रिययोग्यविषयत्व होते हुए भी उसका ज्ञान क्यों न प्रत्यक्ष हो।
समाधान—सौरभ में चक्षुरिन्द्रिय-विषय होने की योग्यता नहीं है तथापि घ्राणेन्द्रिय के विषय होने की योग्यता है, क्योंकि सुगन्ध घ्राणेन्द्रिय का विषय है, वह चक्षुरिन्द्रिय का विषय नहीं। इस कारण हमने प्रत्यक्ष-प्रयोजक का जो पहले 'तत्तदिन्द्रिययोग्यत्वघटित' लक्षण¹ बताया है, उसका इस सौरभ में अभाव है। केवल चक्षु से देखकर सौरभ का अपरोक्ष ज्ञान होना शक्य नहीं। इसलिये उपर्युक्त शंका हो नहीं सकती।
जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष 'असन्निकृष्ट' (परोक्ष) रहता है उस अनुमिति में पक्ष की अपरोक्षता का असन्निकृष्टत्व (परोक्षत्व) जैसा बाधक बनता है उसी तरह जिस अनुमिति में पक्ष सन्निकृष्ट (अपरोक्ष) है ऐसे 'चन्दन सुरभि है' ज्ञान में 'पक्षांश' का ज्ञान अपरोक्ष तथा 'साध्यांश' का ज्ञान परोक्ष होता है। यह मानने पर प्रसिद्ध जातिबाधक 'सांकर्य' की प्राप्ति बाधक होती है। इस कारण 'ज्ञान, पक्ष के अंश में अपरोक्ष और साध्य के अंश में परोक्ष होता है' यह तुम्हारा पूर्वोक्त कथन अनुचित है। इस शंका का अनुवाद कर उसका निरसन किया जाता है :--
न चैवमेकत्र ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरभ्युपगमे तयोर्जातित्वं न स्यादिति वाच्यम्। इष्टत्वात्, जातित्वोपाधित्व-परिभाषायाः
१. 'तत्तदिन्द्रियवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याभिन्नयोग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभेद' रूपस्थलक्षणस्याभावः।
२. असन्निकृष्टपक्षकानुमितिस्थले पक्षस्य प्रत्यक्षत्वे यथा असन्निकृष्टत्वं बाधकं, तथा इदं चन्दनं सुरभि चन्दनखण्डत्वात् चन्दनखण्डान्तरवत्' इति—सन्निकृष्टपक्षकानुमितिस्थले चन्दनखण्डांशे अपरोक्षत्वं (प्रत्यक्षत्वं) सौरभांशे परोक्षत्व-(अप्रत्यक्षत्व-) मिति परोक्षत्वाऽपरोक्षत्वयोः अभ्युपगमे प्रसिद्धजातिबाधकसङ्कर्यप्रसङ्गो बाधको भवेत्। तथा चोक्तं किरणावल्याम्—'व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथानवस्थितिः। रूपहानि रसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः'॥ संकरश्च—'परस्परात्यन्ताभावसमानाधिकरणधर्मयोरेकत्रसमावेशः।' तथा च नेदं युक्तमित्याशंक्य निराकरोति ग्रन्थकारः 'न चे'ति। तत्र जातित्वाभावस्तु अभीष्ट एव जात्युपाध्युदासीनधर्ममात्रस्याभ्युपगमात्।
जातिखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५५
सकलप्रमाणागोचरतया अप्रामाणिकत्वात् । घटोऽयमित्यादि प्रत्यक्षं हि घटत्वादिसद्भावे मानं, न तु तस्य जातित्वेऽपि ।
जातित्वरूप-साध्याप्रसिद्धौ तत्सा¹धकानुमानस्याप्यनवकाशात् । समवायासिद्ध्या ब्रह्मभिन्न²निखिलप्रपञ्चस्यानित्यतया च नित्यत्व-समवेतत्व-घटित-जातित्वस्य घटत्वादावसिद्धेश्च । एवमेवोपाधित्व³मपि निरसनीयम् ॥
अर्थ—'पूर्वोक्त प्रकार से एक ज्ञान में आंशिक परोक्षत्व और आंशिक अपरोक्षत्व इन दो धर्मों का स्वीकार करने से उन दोनों को भी जातित्व नहीं है' यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व का जातित्व न होना हमें इष्ट ही है । क्योंकि जातित्व और उपाधित्व की परिभाषा (तर्कशास्त्र का संकेत) किसी प्रमाण का विषय न होने से अप्रामाणिक है (उस परिभाषा में कोई प्रमाण नहीं है) । 'यह घट है' इत्यादि प्रत्यक्ष-प्रमाण घटत्वादिकों के अस्तित्व में ही प्रमाण है, उनके जातित्व में प्रमाण नहीं हो सकता । इस प्रकार जातित्वरूप साध्य की अप्रसिद्धि (सर्वथा असिद्धि) होने से तत्साधक अनुमान की भी प्रवृत्ति हो नहीं सकती और समवाय की प्रमाण से सिद्धि न होने से तथा ब्रह्मभिन्न समस्त प्रपञ्च की अनित्यता होने से नित्यत्व और समवेतत्व से युक्त जातित्व की घटत्वादिकों में असिद्धि होती है । इस कारण 'यह घट है' इत्याकारक प्रत्यक्ष, घटत्वादिकों के जातित्व में प्रमाण नहीं हो सकता । इसी न्याय से नैयायिकों के पारिभाषिक उपाधित्व का भी निरसन कर देना चाहिये ।
**विवरण—**उपर्युक्त शंका का आशय इस प्रकार है—'पर्वत वह्निमान् है' इस एक ही ज्ञान में 'परोक्षत्व' भी है और 'अपरोक्षत्व' भी है—ऐसा आप कहते हैं । परन्तु 'पर्वत वह्निमान् है' यह वह्निप्रकारक-पर्वतविशेष्यक और संयोगसंसर्गक विशिष्ट ज्ञान एक ही है, किन्तु उसे पर्वतरूप विशेष्यांश में प्रत्यक्ष और अग्निरूप विशेषणांश में परोक्ष मानने पर प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व धर्मों में जातित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा । क्योंकि वह विशिष्ट ज्ञान, सांकर्य रूप जातिबाधक-कारण से युक्त है । 'परस्पर समानाधिकरण न होनेवाले दो धर्मों का एक स्थान में समावेश होना' (उनका एक अधिकरण में रहना) संकर कहलाता है । 'संकर', जाति का बाधक (बाध करनेवाला) दोष है । उपर्युक्त दो धर्मों का 'पर्वतो वह्निमान्' इस स्थल में संकर⁴ होता है । इस
१. 'साध्यका:'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'भिन्नाखिल:'--इति पाठान्तरम् ।
३. 'पाधित्वं निर०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः' इत्यनुमितौ अपरोक्षत्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणं
५६ वेदान्तपरिभाषा [ जातिखण्डनम्
कारण वह संकर, परोक्षत्व और अपरोक्षत्व के जातित्व का बाध करेगा ।
तार्किकों की इस शंका पर सिद्धान्ती कहता है--
'पर्वतो वह्निमान्' इस विशिष्ट ज्ञान में जाति और उपाधि से विलक्षण, परोक्षत्व और अपरोक्षत्व धर्म मानने पर उसमें (परोक्षत्व-अपरोक्षत्व को) नैयायिकों का इष्ट, जातित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा—यह भय आपका व्यर्थ है । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व में जातित्व का न होना हमें इष्ट ही है । क्योंकि 'प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व' जाति तथा उपाधि से भिन्न धर्म मात्र हैं, यही हमारा (वेदान्तियों का) मत है !
शंका--घटत्वादि अन्य जातियों की तरह परोक्षत्व और अपरोक्षत्व दो जातियां भी प्रमाणसिद्ध हैं । तब उनके प्रमाणसिद्ध जातित्व का स्वीकार न करने पर अतिप्रसंग होगा ।
समाधान--जातित्व और उपाधित्व (जाति और उपाधि) आपके संकेत हैं (आपकी रची परिभाषाएं हैं) उन्हें प्रामाणिकत्व नहीं है (जाति और उपाधि, प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होतीं) ।
शंका--नील-घटत्वादिकों में जैसा उपाधित्व प्रमाणसिद्ध है, उसी तरह घटत्वादिकों में जातित्व भी प्रमाणसिद्ध ही है । तब घटत्व-जाति में कोई प्रमाण नहीं, यह आप कैसे कहते हैं ?
समाधान--आपकी पारिभाषिक 'जाति' के विषय में जैसे प्रमाण नहीं, वैसे ही 'उपाधि' के विषय में भी प्रमाण नहीं है, यह हमारा कथन है । इसी कारण मूल ग्रन्थ में जातित्व के साथ उपाधित्व का भी ग्रहण किया है । अर्थात् 'घटत्वादिकों में जातित्व रहता है' और 'नील-घटत्व में उपाधित्व रहता है' ये आपकी दोनों परिभाषाएं, प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण का विषय न होने से अप्रामाणिक हैं¹ ।
'परोक्षत्वं' वर्तते, 'घटोऽय'मिति प्रत्यक्षज्ञाने परोक्षत्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणं प्रत्यक्षत्वं वर्तते, तयोः परस्परविरुद्धधर्मयोः परोक्षत्वाऽपरोक्षत्वयोः एकत्र 'पर्वतो वह्निमान् इत्यत्र समावेशः, इति तयोः जातित्वं न भवितुमर्हतीत्याशयः । अतः 'पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वे साङ्कर्यं' बाधकं, सर्वांशे ज्ञानस्य परोक्षत्वे तु न साङ्कर्यं, न वा प्रत्यक्षत्वस्य जातित्वोच्छेदः स्यादिति शंकाकर्तुराशयः ।
१. 'नित्यत्वे सति अनेक समवेतत्वम्'—जातिः ।
(क) 'भेदकधर्मवत्त्वम्,—उपाधिः ।
(ख) 'आधुनिकसंकेतः'—परिभाषा ।
एवञ्च घटत्वादीनां नैयायिकी परिभाषा 'जाति'रिति । 'अतद्व्यावृत्ति'रिति बौद्धानां परिभाषा । नीलघटत्वादीनामुपाधिरिति । तथा च--जातित्वमुपाधित्वञ्च तत्तत्सम्प्रदायानां परिभाषामात्रम् । न हि परिभाषामात्रेण कस्यचिदर्थस्य सिद्धिर्भवति ।
जातिखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५७
शंका—'जिस वस्तु का जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया जाता है, उसी इन्द्रिय से तन्निष्ठ जाति और उस वस्तु के अभाव का भी ग्रहण होता है' इस न्याय से 'यह घट' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान से घटत्वजाति का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है' तब 'जाति और उपाधि के विषय में कोई प्रमाण नहीं है' यह आप कैसे कह रहे हैं ? इस शंका का समाधान 'घटोऽयम्०' इत्यादि ग्रन्थ से ग्रन्थकार ने किया है, जिसका आशय इस प्रकार है—
'यह घट' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान घटत्वादिकों के अस्तित्व में ही प्रमाण है। उसके जातित्व में प्रमाण नहीं है। क्योंकि घटत्व के अस्तित्व का ज्ञान कराकर ही वह उपक्षीण (कृतकार्य) हो जाता है। घटत्वादिकों का अस्तित्व सिद्ध करने के लिए ही उस प्रत्यक्ष के प्रवृत्त होने से उसका अस्तित्व सिद्ध करते ही वह कृतार्थ हो जाता है और उसके जातित्व की सिद्धि के लिए अप्रवृत्त होने से वह जातित्व की सिद्धि में उदासीन रहता है।
शंका—घटत्वजाति मे प्रत्यक्षप्रमाण के न होने पर भी अनुमान¹ प्रमाण है— "घटत्व जाति है, क्योंकि (उसे—घटत्व को) उपाधिभिन्न सामान्यधर्मत्व होने से अथवा नित्य और अनेकसमवेत होने से, सत्ता की तरह इस अनुमान से 'घटत्व-जाति' की सिद्धि की जा सकती है। तब ग्रन्थकार 'जातित्वरूप' इत्यादि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान करते हैं—
इस अनुमान में नित्य और अनेकसमवेत रूप लक्षण से युक्त जातित्व रूप साध्य की अप्रसिद्धि होने से उसके अधीन रहनेवाले व्याप्तिज्ञानादि का भी अभाव होता है। अतः इस जातिसाधक-अनुमान को अवसर ही नहीं मिल पाता।
शंका—ऐसे जातित्व की अप्रसिद्धि होने पर भी उस जातित्व के घटक (अवयव-भूत) नित्यत्व, एकत्व और अनेकसमवेतत्व, इनकी क्रम से आत्मा, आकाश और घटादिकों में प्रसिद्धि है। क्योंकि—'नित्यमेकमनेकसमवेतं सामान्यम्' यह 'सामान्याख्य' जाति का लक्षण किया है। उसमें से नित्यत्व 'आत्मा' में, एकत्व 'आकाश' में, और अनेक-समवेतत्व 'घटादिकों' में प्रसिद्ध है। इस प्रकार प्रसिद्ध नित्यत्वादिकों का ग्रहण करके उनसे युक्त हुए जातित्व की घटत्वादिकों में सिद्धि होगी।
ग्रन्थकार ने 'समवायासिद्धा' इत्यादि मूल ग्रन्थ से इस शंका का निरसन किया है, जिसका आशय इस प्रकार है—'समवाय' नाम का कोई पदार्थ ही सिद्ध नहीं है।
१. अनुमान प्रयोगः—'घटत्वादिकं जातिः, उपाधिभिन्नत्वे सति सामान्यधर्मवत्त्वात्' । अथवा 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वात्, सत्तावत्' तत्कथं घटत्वादेः जातित्वे न प्रमाणम्? अनुगतप्रतीतेः अनुमानत्वेऽपि अनुमानस्य मानत्वात्, इति चेन्न । अत्रानुमाने साध्याऽप्रसिद्ध्या हेतुर्दुष्टः । तथा चास्मिन् प्रयोगे जातित्वं साध्यम् । तच्च नित्यानेकसमवेतत्वरूपम् । न च तत् क्वचित् प्रसिद्धम्, सिद्धान्ते क्वापि नित्यानेकसमवेतत्वरूपस्य जातित्वस्य अनभ्युपगमात्, नित्यत्वाभावात्, समावायाऽभावाच्च । तस्मात् साध्यस्य जातित्वस्य अप्रसिद्ध्या हेतौ साध्य-व्याप्तिग्रहाभावेन तस्य च व्याप्यत्वासिद्धत्वेन तत्साध्यकानुमितिर्न भवति ।
५८ वेदान्तपरिभाषा [ समवायखण्डनम्
( नैया० ) तथापि 'यह घट रूपवान् है' मृत्तिका में अर्थात् मृत्तिका रूप अवयवों में घट अवयवी है। यहाँ रूप और घट अथवा मृत्तिका-घट में संयोग की प्रतीति तो होती नहीं, और सम्बन्ध तो उनमें ( रूप-घट, और मृत्तिका-घट में ) है ही, अतः परिशेषन्याय से युतसिद्ध-पदार्थों में प्रतीत होनेवाले संयोग से भिन्न, अयुतसिद्ध-पदार्थों के 'समवाय' सम्बन्ध की सिद्धि होती ।
(वेदा०) आपका यह कहना उचित नहीं है। कारण, 'रूपादि' गुण और 'वस्त्रादि' गुणी ( द्रव्य ) अथवा 'परमाणु' आदि अवयव और 'द्व्यणुक आदि' अवयवी इनमें भेद स्पष्ट है, तथा उनका सम्बन्ध जो समवाय है वह भी अत्यन्त ( बिलकुल ) भिन्न है, ऐसा स्वीकार करने पर 'दण्डः पुरुषः' में जैसे समानाधिकरण का प्रत्यय संभव नहीं होता वैसे ही 'शुक्ल-घट मृद्घट' इनमें भी समानाधिकरण का प्रत्यय नहीं हो पायेगा। कारण, 'दण्डः पुरुषः' दण्ड ही पुरुष है, यह कभी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनमें अत्यन्त भेद है। उसी तरह गुण-गुणी, अवयव-अवयवी, और द्रव्य तथा समवाय संबंध के भी अत्यन्त भिन्न होने से शुक्ल-घट, मृद्घट, द्रव्यसमवेत-गुण, आदि में समानाधिकरणप्रत्यय की संभावना भी नहीं की जा सकेगी। किन्तु 'शुक्लघट, मृत्तिका में घट' ऐसा समानाधिकरणप्रत्यय तो हुआ करता है। अतः इस समानाधिकरण्य की प्रतीति से 'शुक्ल-घट' आदि में अभेद ( तादात्म्य ) ही स्वीकार करना चाहिये । उपर्युक्त 'दण्डः पुरुषः' उदाहरण व्यतिरेकी है। अन्वयी नहीं है ।
शिवाय दो समवायी पदार्थों का समवाय, अपने समवायी पदार्थों से ( जिनका समवाय हो ) संबद्ध होकर विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है या उनसे असम्बद्ध रहकर ही वह विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है ? घट 'द्रव्य' है और रूप 'गुण' है । ये दोनों पदार्थ युतसिद्ध ( पृथक् सिद्ध ) नहीं हैं, किन्तु अयुतसिद्ध हैं। इस कारण उनमें संयोग-सम्बन्ध नहीं रहता, समवाय सम्बन्ध ही सम्भव होता है। इसलिये 'जिसमें समवाय हो वह समवायी', इस व्युत्पत्ति से घट और रूप ये दोनों पदार्थ समवायी हैं। 'समवाय' उन समवायी पदार्थों से सम्बद्ध होकर 'ये दो पदार्थ समवेत हैं' तथा 'घट रूपी हैं' ( रूपवान् = रूप से युक्त है ) इस विशिष्ट प्रत्यय का नियामक ( कारण ) होता है या वह ( समवाय ) समवायी पदार्थों से सम्बद्ध न होकर ही उक्त विशिष्ट प्रत्यय का नियामक होता है ? यह प्रश्न सिद्धान्ती ने 'समवाय संबंध' को पृथक् पदार्थ माननेवाले तार्किक से किया है। ऐसे उभयकोटिक प्रश्न को विकल्प कहते हैं । 'दण्डी पुरुषः' ( दण्डवान् पुरुष ) यह विशिष्ट प्रत्यय है। क्योंकि इसमें 'दण्ड' विशेषण और 'पुरुष' विशेषित ( विशेष्य ) है । 'यह पुरुष दण्डवान् है' इस प्रत्यय ( अनुभव ) का विषय 'विशेषित ( विशेषणयुक्त ) पुरुष' है। इसलिये यह विशिष्ट प्रत्यय है । उसी तरह 'रूपी ( रूपवान् ) घटः' इसमें भी 'रूप' विशेषण से युक्त ( विशेषित = समवेत ) घट, विषय है। इस कारण भी विशिष्ट-प्रत्यय है । ऐसे विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक कौन ? सम्बद्ध-समवाय या असम्बद्ध-समवाय ?
समवायखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५९
सिद्धान्ती—'समवाय, समवायी पदार्थों से सम्बद्ध होकर विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है' इस प्रथम पक्ष को मानने पर अनवस्था दोष होगा। जैसे--नैयायिक का कहना है कि—'रूपी घटः' इस प्रत्यय में 'रूप और घट' दोनों पदार्थ बिलकुल भिन्न हैं, तथापि परस्पर संबद्ध हैं। इन दो अयुतसिद्ध पदार्थों में संयोग सम्बन्ध की सम्भावना तो बन ही नहीं सकती। अतः नित्यसम्बद्ध समवाय की सिद्धि हो जाती है।
तब वेदान्ती कहता है कि 'समवाय' भी तो सम्बन्ध ही है। इसी कारण वह रूप और घट इन दो पदार्थों के मध्य में रहता है। यह रूपात्मक या घटात्मक न होकर रूप और घट से बिलकुल भिन्न है। तब उनको सम्बद्ध कराने के लिए एक और सम्बन्ध की आवश्यकता होगी। अन्यथा असम्बद्ध और अतद्रूप समवाय उन दो पदार्थों में किसी प्रकार के अतिशय को पैदा नहीं कर सकता। इस कारण रूप और समवाय का कल्पित सम्बन्ध भी परस्पर सम्बद्ध होकर ही सम्बन्धी पदार्थों में अतिशय को पैदा कर सकेगा। अतः समवाय और समवायी का सम्बन्ध होने के लिये दूसरा समवाय, उसके सम्बन्ध के लिये तीसरा, उसके सम्बन्ध के लिए चौथा, इस प्रकार अविच्छिन्न समवायपरम्परा प्राप्त होगी। इसी को अनवस्था दोष कहते हैं। रूप और घट से समवाय की स्वरूप से ही स्थिति मानने पर 'घट और पट' के संयोग की भी स्वरूप से ही स्थिति माननी होगी। अर्थात् घट पटादि पदार्थों पर संयोग की समवाय से स्थिति की कल्पना करना व्यर्थ है। इसलिये रूप और घट का तादात्म्य मानना ही सर्वथा सयुक्तिक है।
यदि ऐसा कहें कि समवाय, समवायी पदार्थों से नित्यसम्बद्ध हुआ ही प्रतीत होता है, जिससे पूर्वोक्त अनवस्था दोष नहीं हो सकेगा। तो संयोग भी संयोगी पदार्थों से नित्य-सम्बद्ध हुआ ही प्रतीत होता है तब संयोग को सम्बन्धित होने के लिए एक दूसरे समवाय सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए। इस पर यदि ऐसा कहें कि दो द्रव्यों का संयोग होने से 'संयोग' पृथक् पदार्थ है, उसे 'गुण' कहते हैं, अतः अपने स्वरूप (गुण) से भिन्न स्वरूप वाले द्रव्य से सम्बन्धित होते समय उसे 'समवाय' की अपेक्षा नहीं रहती। तो समवाय भी अर्थान्तर (पृथक् पदार्थ) है अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म पदार्थों से वह भिन्न पदार्थ है। तब वह द्रव्य, गुण और कर्म से सम्बन्धित होते समय दूसरे 'समवाय' की अपेक्षा कैसे नहीं करेगा ? अवश्य ही करेगा। इस पर यदि ऐसा कहें कि 'संयोग' यह गुण पदार्थ होने से द्रव्यों से सम्बन्धित होते समय 'समवाय' की अपेक्षा करता है। 'संयोग' की तरह 'समवाय' स्वयं गुण नहीं है, अपितु सात पदार्थों में से छठा पदार्थ है। इसलिए उसे दूसरे 'समवाय' की अपेक्षा नहीं होती कहें, तो 'संयोग' को गुणत्व आपकी परिभाषा में है, शास्त्रीय नहीं। सिवाय अपेक्षा में निमित्त 'पदार्थान्तरत्व' का होना दोनों में समान है। 'संयोग' जैसे संयोगी से पृथक् पदार्थ है, वैसे 'समवाय' भी 'समवायी' से पृथक् पदार्थ है। अतः जैसे संयोग, संयोगी के साथ सम्बद्ध होने के लिए समवाय की अपेक्षा रखता है वैसे ही समवाय को समवायी से सम्बद्ध होने के लिए दूसरे समवाय
६० • वेदान्तपरिभाषा [ समवायखण्डनम्
की अपेक्षा ( आवश्यकता ) होनी ही चाहिए। बिना उसके वह समवायी से कैसे सम्बन्धित हो सकेगा ?
अनवस्था दोष के निवारणार्थ यदि हम पूर्वोक्त विकल्पों में से दूसरे पक्ष का ( समवायी से बिना सम्बन्धित हुए ही समवाय विशिष्ट प्रत्यय का नियामक होता है ) ग्रहण करें तो ‘अतिप्रसंग’ दोष होगा। क्योंकि फिर तो कोई भी असम्बद्ध पदार्थ, विशिष्ट प्रत्यय का नियामक हो सकेगा। असम्बद्ध पट से भी ‘रूपी घटः’ प्रत्यय होने का प्रसंग प्राप्त होगा। सिवाय हम अद्वैतसिद्धांती आप तार्किकों से यह पूछते हैं कि समवाय अनेक हैं या एक ? आप उसे अनेक नहीं बता सकते, कारण यह है कि ‘समवायस्तु एक एव’, ‘विशेष’ पदार्थ के अनन्त होने पर भी ‘समवाय’ एक ही है—यह आप की परिभाषा है। इसलिए समवाय के अनेक मानने पर ‘अपसिद्धांत’ और ‘गौरव’ दोष प्राप्त होंगे। यदि ‘समवाय’ को एक बतावें तो रूप, ज्ञान आदि का समवाय वायु, घट आदि पर स्थित समवाय से पृथक् ( भिन्न ) न होने से ‘वायु रूपवान् है और घट विलक्षण गतिमान् है,’ प्रतीति होने का प्रसंग प्राप्त होगा। इस पर यदि आप ऐसा कहें कि वायु में रूप का, और घट में विलक्षण गति का अभाव होने से उपर्युक्त प्रतीति का प्रसंग कैसे प्राप्त होगा ? उत्तर—वायु में रूप की स्थिति के प्रयोजक ( कारण ) रूपसमवाय के रहने पर भी रूप का अभाव ( रूपं नास्ति ) बताने लगें तो ‘व्याघात’ दोष प्राप्त होगा।
इस प्रकार समवाय के सिद्ध न होने पर प्रत्यक्षगम्य कार्यत्व और ब्रह्मभिन्नत्व लिंगक अनुमान से तथा “हे सौम्य, यह समस्त कार्यरूप जगत्, उत्पत्ति से पूर्व सत् ही था,” इस श्रुति से सिद्ध ‘ब्रह्म से भिन्न सकल प्रपंच अनित्य है’ इस न्याय से नित्यत्व व समवेतत्व विशेषणों से युक्त जातित्व की घटत्वादि में असिद्धि है। ( समवाय की ही सिद्धि न होने से प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा घटत्वादिकों में जाति की सिद्धि नहीं होती। जाति में कार्यत्व होने से और वह ब्रह्मभिन्न होने से उसकी अनित्यता का अनुमान हो जाता है। एवं च अनुमान से भी जाति सिद्ध नहीं हो पाती। श्रुति से भी ‘समस्त प्रपंच अनित्य’ सिद्ध होने से नित्य व अनेकसमवेत जाति घटत्वादिकों में सिद्ध नहीं हो पाती ) ।
नैयायिकों से स्वीकृत जाति की इस प्रकार अप्रामाणिकता सिद्ध होने से ही ‘परोक्षत्व और अपरोक्षत्व’ को हम जातिरूप नहीं मानते। इसी प्रकार घटत्वादिकों के जातिरूप होने में भी कोई प्रमाण नहीं है। जाति की अप्रामाणिकता में तीन हेतु हैं— १—प्रत्यक्ष तो घटत्व की सत्ता में प्रमाण है, जातित्वरूपसाध्य की अप्रसिद्धि होने से अनुमान प्रमाण का अवसर ही नहीं प्राप्त होता। ३—जातिलक्षण घटित नित्यत्व, समवेतत्व, आदि की असिद्धि होने से भी जाति की सिद्धि नहीं हो पाती। इस पर तार्किक पूछता है कि आपने तो जाति की तरह उपाधि को भी अप्रामाणिक
ज्ञानप्रत्यक्षस्यनिष्कर्षलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६१
बताया था परन्तु तीन हेतुओं से मात्र जाति की परिभाषा अप्रामाणिक ठहरती है, उपाधि की नहीं। इस शंका का निरसन ग्रन्थकार 'एवमेव' ग्रन्थ से करते हैं। जातित्व की परिभाषा में अप्रामाणिकता दिखाने के लिये जो तीन हेतु दिये हैं, उन्हीं से उपाधित्व का भी निरसन हो जाता है। जैसे--'नीलघटत्व' आदि में उपाधित्व बतानेवाली आपकी नीलघटत्व की परिभाषा प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि १—'यह नीलघट है' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण नीलघटत्व के अस्तित्व में प्रमाण है, न कि नीलघटत्व के उपाधि होने में। २—उपाधित्व रूप साध्य के अप्रसिद्ध होने से तत्साधक अनुमान भी नहीं हो सकता। ( उपाधित्व रूप साध्य का साधक अनुमान¹—१—नील घटत्वादि उपाधि है, २—क्योंकि उस नील घटत्वादि पर जातिभिन्नसामान्य धर्मत्व है अर्थात् नीलघटत्व', 'घटत्व' जाति से भिन्न सामान्य धर्म है, ३--आकाशत्वादि के समान। परन्तु इस अनुमान में उपाधित्व रूप साध्य ही अप्रसिद्ध है।) ३—समवाय आदि की सिद्धि न होने से उपाधित्व की भी सिद्धि नहीं होती।
शंका—यद्यपि जाति और उपाधि दोनों अप्रमाणिक हैं तथापि एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का रहना कहाँ तक उचित है? इस प्रश्न का उत्तर—
पर्वतो वह्निमानित्यादौ च पर्वतांशे वह्न्यंशे चान्तःकरणवृत्तिभेदाङ्गीकारेण तत्त²द्वृत्त्यवच्छेदकभेदेन परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरेकत्र चैतन्ये वृत्तौ न³ विरोधः। तथा च तत्तदिन्द्रिययोग्य-वर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं तत्तदाकारवृत्त्यवच्छिन्नज्ञानस्य तत्तदंशे प्रत्यक्षत्वम् ।।
अर्थ—'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि अनुमितिज्ञान में हम 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में अन्तःकरणवृत्ति का भेद मानते हैं। 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में भिन्न-भिन्न अन्तःकरणवृत्तियाँ हैं, यह हमारा सिद्धान्त होने से उन भिन्न वृत्तियों का अवच्छेदक भी (भेदक भी) भिन्न है। इसलिए एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्वरूप परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है। अर्थात् वे दोनों धर्म, एक ही चैतन्य में रह सकते हैं। तस्मात् उन इन्द्रियों के योग्य, वर्तमान
१. 'नीलघटत्वादिकमुपाधिः जातिभिन्नसामान्यधर्मत्वात् 'आकाशत्वादिवत्' इत्यनुमानस्य अनवकाशात् समवायाद्यसिद्ध्या उपाधित्वासिद्धेश्च इत्येवं निरसनीयम्।
२. 'तत्तवच्छेदकः' इति पाठान्तरम्।
३. 'न कश्चिद् विरोधः'—इति पाठान्तरम्।
| ६२ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षलक्षणम् |
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विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य के साथ, तत्तद्विषयाकार हुई इन्द्रियवृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का अभेद होना ही उस अंश में ज्ञान का प्रत्यक्षत्व (प्रत्यक्ष) है ।
**विवरण—**पीछे कह चुके हैं कि घटावच्छिन्न आकाश, मठावच्छिन्न आकाश से भिन्न नहीं है, क्योंकि 'घट' और 'मठ' दोनों विभाजक पदार्थ एक ही देश में स्थित रहते हैं । उसी तरह अन्तःकरण-वृत्ति और घट को एकदेशस्थ होने से उन्हें उपधेय-भेदकत्व नहीं है । वैसे ही 'पर्वत वह्निमान् है' इस ज्ञान में 'पर्वत' और 'वह्नि' इन दो उपाधियों को भी एक-देशस्थत्व है इसलिये उन्हें उपधेयभेदकत्व नहीं है । तब एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व कैसे सम्भव है ? इस आक्षेप का समाधान ग्रन्थकार करते हैं—'यह घट' इस प्रत्यक्ष ज्ञान में घटावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरण-वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य एक ही है । परन्तु 'पर्वत वह्निमान् है' इस अनुमितिज्ञान में, चक्षुरिन्द्रिय का बाह्य पर्वत से सन्निकर्ष होकर पर्वताकार वृत्ति होती है, उस वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य, पर्वत के देश में रहता है अर्थात् उस वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य का देश, बाह्य पर्वत है । परन्तु वह्न्याकारवृत्ति, व्याप्तिज्ञान से पैदा होती हुई हृदयस्थ चैतन्य की अवच्छेदिका है । इस कारण जिस अनुमितिज्ञान में 'पक्ष' का प्रत्यक्ष रहता है, उस 'पक्ष' के अंश में अपरोक्षत्व और परोक्षवह्नि के अंश में परोक्षत्व के होने में कोई विरोध नहीं है । ऐसा होने से प्रत्येक विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का प्रत्येक इन्द्रिययोग्य, वर्तमान और अबाधित विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से अभेद होना ही ज्ञानांश में प्रत्यक्षत्व कार्य प्रयोजक है, यही पूर्वोक्त ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का—'प्रमाण चैतन्य का विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभेद' प्रयोजक शब्द से विवक्षित अर्थ है । इस प्रकार ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताकर अब विषयगतप्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताते हैं (विकल्प के प्रथम पक्ष का उत्तर देकर अब द्वितीय पक्ष का दे रहे हैं) ।
घटादेर्विषयस्य प्रत्यक्ष¹त्वं तु प्रमात्रभिन्नत्वम् ।²
अर्थ—(द्वितीय पक्ष में) प्रमाता से घटादि विषय का अभिन्नत्व ही विषयगत प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है ।
विवरण—'यह घट यह ज्ञान भी प्रत्यक्ष है और उस ज्ञान का विषय जो 'घट' वह भी प्रत्यक्ष है । इसी का दो प्रकार से—'घट का ज्ञान प्रत्यक्ष है' और 'घट प्रत्यक्ष है'—निर्देश किया जाता है । उनमें से ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक यहाँ तक बताया गया । अब इसके आगे सिद्धान्ती विषयगत प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को
१. 'प्रत्यक्षं तु'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्याभिन्नत्वम्' इत्यर्थः ।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६३
बताता है। घटादि विषय का प्रमातृ-अभिन्नत्व (प्रमाता से अभिन्न होना) ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है, मूल में जो 'तु' शब्द है, वह नैयायिकों के विषय प्रत्यक्षत्व का निरसन करने के लिये है। नैयायिक—'इन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्वं विषयप्रत्यक्षत्वम्' इन्द्रियों से उत्पन्न हुए-ज्ञान का विषय होना ही विषय का प्रत्यक्षत्व है'- लक्षण करते हैं। परन्तु वह (विषयप्रत्यक्ष का लक्षण) मनोरूप इन्द्रिय से होनेवाले अनुमितिज्ञान में अतिव्याप्त होता है। इसलिए नैयायिक के बताये हुए 'विषयप्रत्यक्षत्व' का निरसन कर 'घटादि विषय से प्रमाता का अभेद' इस विषयप्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को यहाँ बताया है। इस पर शंका करते हैं—
ननु कथं घटादेरन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्याभेदः ? अहमिमं पश्यामि इति भेदानुभावविरोधादिति चेत् ,
अर्थ—घटादि-विषयों का अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्य से अभेद कैसे सम्भव है ? क्योंकि विषय का प्रमाता से अभेद यदि मान लिया जाय तो मैं इस घट को देखता हूँ' इस भेदानुभव से विरोध होगा।
विवरण—'प्रमेय का प्रमाता से अभिन्नत्व (ऐक्य होना) ही घटादि प्रमेय का प्रत्यक्षत्व है' ऐसा आप कह रहे हैं। परन्तु 'प्रमात्राभिन्नत्व' से क्या तात्पर्य है ? घटादि विषयों का 'अभेद' या 'घटादिविषयावच्छिन्न चैतन्य का प्रमाता से अभेद' ।
इन दोनों विकल्पों में प्रथम विकल्प उचित नहीं, क्योंकि विषय स्वयं जड होने से उसका चेतन-प्रमाता से अभेद हो नहीं सकता। दूसरा विकल्प भी उचित नहीं, क्योंकि 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसी प्रतीति के समान 'मैं घट हूँ' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए। परन्तु 'मैं घट हूँ' इसी प्रतीति किसी को भी न होकर 'मैं इस घट को देखता हूँ' इस प्रकार तद्विरुद्ध भेदप्रतीति होती है। ऐसी स्थिति में 'प्रमात्राभिन्नत्व' का सम्भव कैसे हो सकता है? 'सिद्धान्ती' 'इति चेत्' ग्रन्थ से उपयुक्त शंका का अनुवाद कर 'उच्यते' से उसके निवारण की प्रतिज्ञा करता है—
३. 'अहमिमं घटं पश्यामि' इत्यनुभवे अस्मदर्थस्य प्रमातुः कर्तृतया प्रकाशः, इदमर्थस्य विषयस्य घटादेः कर्मतया प्रकाशः। कर्तृ-कर्मणोश्च भेदः सर्वानुभवसिद्धः। तथा च अस्मिन् अनुभवे प्रमातृ-विषययोर्भेदानुभवात् तदभेदो न युक्त इत्याशयः।
तत्रेदं समाधानम्—'प्रमात्राभेदः' इत्यनेन घटावच्छिन्नस्य अन्तःकरणावच्छिन्नस्य च ऐक्यं न विवक्ष्यते, येन विरोधो भवेत्, अपितु प्रमातृ-सत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावो विवक्षितः। 'प्रमातृसत्ता' इत्यस्य प्रमातृत्वलक्षणसत्ता बोध्या, न तु तन्निष्ठसत्ता-जातिः, प्रमातृ-प्रमेयनिष्ठसत्ताजातेरेकतया तन्निष्ठसत्तातिरिक्तसत्ताया असिद्धेः।
| ६४ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
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उच्यते। प्रमात्रभेदो नाम न ^१तदैक्यम्, किन्तु प्रमातृसत्ताऽतिरिक्तसत्ताकत्वाभावः। तथा च^२ घटादेः स्वावच्छिन्नचैतन्ये^३ऽध्यस्ततया विषयचैतन्यसत्तैव घटादिसत्ता, अधिष्ठानसत्ताऽतिरिक्ताया आरोपितसत्ताया अनङ्गीकारात्। विषयचैतन्यञ्च पूर्वोक्तप्रकारेण प्रमातृचैतन्यमेवेति प्रमातृचैतन्यस्यैव घटाद्यधिष्ठानतया प्रमातृसत्तैव घटादिसत्ता नान्येति सिद्धं घटादेरपरोक्षत्वम् ॥
अर्थ—'विषय का प्रमात्रभेद कैसे' यदि पूछो तो कहते हैं—'प्रमात्रभेद' (प्रमातृ + अभेद) का अर्थ प्रमात्रैक्य (प्रमातृ + ऐक्य) नहीं। किन्तु 'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य रूप प्रमाता की सत्ता से भिन्न, घटादिविषय की सत्ता का अभाव' ही यहाँ 'प्रमात्रभेद' शब्द से विवक्षित है। अतः घटादिविषयों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य में घटादि विषयों का अध्यारोप (अध्यास) हुआ होने से विषयचैतन्य-सत्ता ही घटादिविषयों की सत्ता है। क्योंकि हम (वेदान्ती) अधिष्ठान की सत्ता से, आरोपित की सत्ता को भिन्न नहीं मानते। पूर्वोक्त प्रकार से प्रमातृचैतन्य ही विषयचैतन्य है। प्रमातृचैतन्य में घटादिविषयों की अधिष्ठानता होने से प्रमातृसत्ता ही घटादिसत्ता है, उससे भिन्न नहीं। इससे घटादिकों का अपरोक्षत्व (प्रत्यक्षत्व) सिद्ध हुआ।
विवरण—प्रमात्रभेद का अर्थ यदि यहाँ ऐसा होता कि "घटादि विषय और घटाद्यवच्छिन्न या अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य का ऐक्य" तो विरोध हुआ होता' परन्तु यहाँ 'विषय और चैतन्य का (घटादि विषयों का प्रमाता से ऐक्य) ऐक्य' रूप अर्थ विवक्षित नहीं। अर्थात् 'अभेद' का अर्थ 'ऐक्य' न होकर 'प्रमातृलक्षण जो सत्ता, वही प्रमेय सत्ता है, अर्थात् प्रमातृसत्ता से विषय की सत्ता का पृथक् न रहना' यही प्रमातृभेद शब्द का अर्थ है। यहाँ 'सत्ता' शब्द का अर्थ 'प्रमाता में रहनेवाली सत्तारूप जाति' नहीं है। कारण प्रमाता, और प्रमेय, (विषय) में रहनेवाली जो 'सत्ता' जाति उसके एक (अभिन्न) ही होने से प्रमातृनिष्ठ सत्ता से अतिरिक्त प्रमातृत्व व प्रमेयत्व (स्वरूप) सत्ता असिद्ध है। इस प्रकार सत्तैक्यरूप प्रमात्रभेद के होने से तात्पर्य यह निकलता है कि घटादि-विषय, घटाद्यवच्छिन्न-चैतन्य में आरोपित है। अतः विषय-चैतन्य की जो सत्ता है, वही घटादि-विषयों की सत्ता है। अर्थात् आरोपित घटादि-विषयों की सत्ता, अधिष्ठानरूप विषयावच्छिन्न-चैतन्य की सत्ता से पृथक् नहीं है। क्योंकि हम
१. 'तावदै०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'हि'-इति पाठान्तरम्।
३. 'चैतन्याध्यस्त०' इति पाठान्तरम्।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६५
'अधिष्ठान की सत्ता से आरोपित की सत्ता को पृथक् नहीं मानते' । शुक्ति रूप अधिष्ठान की सत्ता से आरोपित रजत की सत्ता पृथक् नहीं है । शुक्ति की सत्ता से ही शुक्तिरजत 'सत्तावत्' हुए की तरह प्रतीत होता है ।
पूर्वोक्त तडागोदकन्याय के अनुसार (जैसे तडागोदक ही केदारोदक होता है) प्रमातृचैतन्य ही विषयचैतन्य ( प्रमेयचैतन्य ) है । उस कारण प्रमातृचैतन्य ही घटादिविषयों का अधिष्ठान है । आरोपित घटादिकों का अधिष्ठान प्रमातृचैतन्य होने से प्रमातृचैतन्य की सत्ता ही घटादिकों की सत्ता है । प्रमातृचैतन्य की सत्ता से घटादि विषयों की सत्ता पृथक् नहीं है । इसलिये प्रमातृ-( प्रमाता ) की सत्ता से घटादिविषयों की सत्ता का अतिरिक्त (भिन्न) न होना ही घटादिकों को अपरोक्षत्व (प्रत्यक्ष) है । चैतन्य के नित्य होने से उसकी सत्ता भी नित्य है । परन्तु प्रमातृचैतन्य, प्रमाणचैतन्य और विषयचैतन्य ( प्रमेयचैतन्य ) इस ( चैतन्य ) भेद के औपाधिक होने से उनकी सत्ता अनित्य है । घट, पट आदि विषयों को देखते समय उस उस विषय से सम्बद्ध वह वह त्रिपुटीरूप चैतन्य (घटप्रमातृ-चैतन्य, घटाकारवृत्तिचैतन्य और घटविषयचैतन्य) भी नवीन उत्पन्न हो रहा है ऐसा प्रतीत होता है । इसीलिये ऊपर प्रमातृसत्ता का अर्थ प्रमातृलक्षणसत्ता बता चुके हैं, तन्निष्ठ सत्ताजाति नहीं । उस उस विषय के प्रमाता की जो सत्ता, वही उस उस प्रमेय की सत्ता है, यह तात्पर्य है । इस प्रकार घटादि-विषय का 'प्रमात्रभेद' का अर्थ प्रमातृचैतन्याभेद नहीं है, और अभेद का अर्थ ऐक्य भी नहीं, किन्तु प्रमाता की सत्ता ही घट की सत्ता है । अब मूल में 'प्रमातृचैतन्य' न कहकर 'प्रमातृ' ही क्यों कहा गया ? उसे कहते हैं—
अनुमित्यादिस्थले¹ त्वन्तःकरणस्य वह्न्यादिदेशनिर्गमनाभावेन-
वह्न्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्यानात्मकतया वह्न्यादिसत्ता
प्रमातृसत्तातो भिन्नेति नातिव्याप्तिः ।
**अर्थ—**परन्तु अनुमिति आदि ज्ञानों में अन्तःकरण, वृत्ति के द्वारा अनुमेय वह्नि आदि के देश में नहीं जाता । उस कारण वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य को प्रमातृचैतन्यरूपता नहीं है । इसी से वह्नि आदि की सत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न है । इस कारण पूर्वोक्त घटादिविषय के प्रत्यक्ष-लक्षण की अनुमेय वह्नि आदि परोक्ष-विषयों में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
**विवरण—**घटादि-विषयों के प्रत्यक्ष में प्रयोजक 'प्रमात्रभिन्नत्व' को यदि बतावें तो अनुमेय विषयों में ( अनुमिति के विषयों में ) अतिव्याप्ति होगी । क्योंकि 'प्रमात्रभिन्नत्व' का अर्थ 'प्रमातृचैतन्याभिन्नत्व' करने से अनुमेय वह्नि आदि की सत्ता, चैतन्य
१. 'लेऽन्तः'–इति पाठान्तरम् ।
| ६६ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
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की सत्ता से पृथक् ( भिन्न ) नहीं है । ऐसी शंका हो सकती है । परन्तु अनुमेय विषय की सत्ता, चैतन्य की सत्ता से पृथक् न होने पर भी अनुमेय विषय प्रमातृरूप नहीं होता, इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है । घटादि के प्रत्यक्ष-ज्ञानों में अन्तःकरण-वृत्ति, घटादि-विषयों के प्रदेश में जाकर विषय के आकार को धारण करती है । इसलिये वहाँ घटादि विषयों का प्रमाता के साथ अभेद ( प्रमात्रभेद ) सम्भव होता है । परन्तु अनुमिति आदि ज्ञानों में अन्तःकरण-वृत्ति, विषय के प्रदेश में नहीं जाती । इसलिये वहाँ वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य इन दोनों का अभेद नहीं होता । अतः अनुमिति विषय की सत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न है । इसी कारण विषयगत-प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक-लक्षण की अनुमेय विषय में अतिव्याप्ति नहीं होती । लक्षण में इसीलिये 'चैतन्य' पद न रखकर 'प्रमात्रभेद' शब्द रखा गया है ।
इस पर पुनः वादी दूसरे प्रकार से अतिव्याप्ति की शंका करता है और सिद्धान्ती उसका थोड़े में ही निरसन करता है ।
नन्वेवमपि धर्माधर्मादिगोचरानुमित्यादिस्थले धर्माधर्मयोः प्रत्यक्षत्वापत्तिः, ^१'धर्माद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभिन्नतया धर्मादिसत्तायाः प्रमातृसत्तानतिरेकादिति चेत् । न । योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात् ।
अर्थ—'प्रमात्रभेद' का अर्थ 'प्रमातृसत्ता से विषयसत्ता का भिन्न न रहना' मानने पर भी धर्माधर्म आदि परोक्ष पदार्थों को विषय करने वाले अनुमिति आदि स्थलों में धर्माधर्म के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होगा । क्योंकि प्रमातृचैतन्य से धर्माधर्मादि-विषयावच्छिन्न-चैतन्य का यहाँ पर अभेद है ही । ( विषयचैतन्य और प्रमातृचैतन्य का अभेद है ) उस कारण धर्मादिसत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न नहीं है । इसलिए विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक जो प्रमात्रभेद, उसकी परोक्ष धर्मादि-विषय में अतिव्याप्ति बताना उचित नहीं है, क्योंकि 'योग्यत्व' को भी विषयविशेषणत्व है, अर्थात् विषय में 'योग्य' इस विशेषण के लगाने से अतिव्याप्ति का निवारण होता है । क्योंकि धर्माधर्मादिकों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है ( प्रत्यक्ष के योग्य विषय 'धर्माधर्मादि' नहीं है ) ।
विवरण—'प्रमाता की प्रमातृलक्षणसत्ता से प्रमेय की सत्ता का पृथक् न होना' इस लक्षण की पूर्वोक्त प्रकार से अतिव्याप्ति, अनुमेय वह्नि आदि विषयों में अन्तःकरण के न जाने से न होने पर भी धर्म आदि परोक्षविषयक अनुमितिज्ञान में अतिव्याप्ति होती है अर्थात् धर्मादिकों का प्रत्यक्ष होता है कहना पड़ेगा । क्योंकि धर्मादि विषयों से अवच्छिन्न अन्तःकरणस्थ-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य का अभेद होने से धर्मादि की
१. 'धर्माधर्माद्यव०'-इति पाठान्तरम् ।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६७
सत्ता प्रमातृचैतन्य से भिन्न नहीं है । इस अतिव्याप्ति के वारण के लिए लक्षणगत 'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने से धर्मादिकों के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त नहीं होगा। यह समाधान दिया गया है।
किसी भी वादी के मत में 'धर्माधर्म पदार्थ' प्रत्यक्ष के योग्य नहीं है। सभी दार्शनिक धर्माधर्म को परोक्ष ही मानते हैं। इससे ( 'योग्य विषयावच्छिन्न चैतन्य' और प्रमाता के अभेद को विषयगत प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक मानने से ) धर्माधर्मादि-परोक्ष-विषय में अतिव्याप्ति नहीं होने पाती ।
तथापि वादी पुनः दूसरे प्रकार से अतिव्याप्ति की शंका करता है—
नन्वेवमपि रूपी घट इति प्रत्यक्षस्थले घटगतपरिमाणादेः प्रत्यक्षत्वापत्तिः रूपावच्छिन्न-चैतन्यस्य परिमाणाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य चैकतया रूपावच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभेदे परिमाणाद्यवच्छिन्न-चैतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया परिमाणादिसत्तायाः प्रमातृसत्ताऽतिरिक्तत्वाभावादिति चेत् ।
**अर्थ—**पूर्वोक्त प्रकार से ( 'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने पर भी ) धर्मादि-परोक्ष-विषयों में विषयगतप्रत्यक्षत्व-प्रयोजक-लक्षण की अतिव्याप्ति न होने पर भी 'यह घट रूपवान् हैं' इस प्रत्यक्षप्रमा में घटगत-परिमाणादिकों का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि रूपावच्छिन्नचैतन्य और परिमाणावच्छिन्न-चैतन्य, दोनों का अभेद है । इस अभेद के कारण रूपावच्छिन्न चैतन्य का प्रमातृचैतन्य से अभेद सिद्ध होने के कारण परिमाणावच्छिन्न-चैतन्य का भी प्रमातृभिन्नत्व सिद्ध होता है । जिससे परिमाणादि सत्ता प्रमातृसत्ता से पृथक् प्रतीत नहीं होती ।
अर्थात् प्रमातृसत्ता ही परिमाणसत्तारूप होने से घटरूप के प्रत्यक्ष ज्ञान में घटगत-परिमाणादिकों का भी ज्ञान होने लगेगा । जिससे पूर्वोक्त प्रत्यक्षलक्षण की अलक्ष्य-भूत घटगत-परिमाणादि में अतिव्याप्ति होती है ।
**विवरण—**जिस समय घट के रूप का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है उसी समय घटगत परिमाण का भी प्रत्यक्ष होता है अतः उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति होती है। रूप-प्रत्यक्ष होने के समय घट-परिमाण का भी प्रत्यक्ष होता है यह मानना होगा । क्योंकि रूपावच्छिन्न चैतन्य ही परिमाणावच्छिन्न चैतन्य है इसलिए परिमाणादिकों की सत्ता प्रमातृसत्ता से भिन्न नहीं है, कारण यह है कि परिमाणादि कल्पित होने से उनके अधिष्ठानभूत चैतन्य की सत्ता ही परिमाणादिकों की सत्ता है । और स्वाधिष्ठानभूत चैतन्य के प्रमातृरूप होने से पूर्वोक्त लक्षण की परिमाण आदि में अतिव्याप्ति होती है ।
६८ वेदान्तपरिभाषा [ विषयप्रत्यक्षविचारः
इस प्रकार वादी के शंका करने पर सिद्धान्ती 'न' से निरसन की प्रतिज्ञा करके 'तत्तदाकार०' आदि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का निरसन करता है—
न। तत्तदाकारवृत्त्युपहितत्वस्यापि प्रमातृविशेषणत्वात् । रूपा- कारवृत्तिदशायां परिमाणाद्याकार-वृत्त्यभावेन परिमाणाद्याकार-वृत्त्यु- पहित-प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्वाभावेनाऽतिव्याप्त्यभावात् ॥
अर्थ—( 'रूपी घटः' यह रूपवान् घट है, इस रूपप्रत्यक्षस्थल में घटगत-परिमाण आदि का भी प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होने का भय करना व्यर्थ है ) पूर्व-प्रदर्शित अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । क्योंकि 'प्रमात्रभेद' इस लक्षण के 'प्रमातृ' पद का विशेषण है 'तत्तदाकारवृत्त्युपहितत्व' । इसलिए भिन्न-भिन्न विषयाकार वृत्तिरूप उपाधि से उपहित ( युक्त ) हुए प्रमाता की सत्ता से उन उन विषयों की पृथक् सत्ता का न होना ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है । तात्पर्य यह हुआ कि अन्तःकरणवृत्ति जब रूपाकार होती है तब वह घटगत-परिमाणादि के आकार की नहीं रहती । अर्थात् रूपाकार-वृत्ति के समय परिमाणाकार-वृत्ति का अभाव रहता है । इसलिए परिमाणा-कारवृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्य से परिमाणादि विषय की सत्ता अभिन्न नहीं होती । ( उन विषयों में प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्व नहीं होता ) इसलिए 'रूपी घटः' इस प्रत्यक्ष के समय परिमाणादि विषयों का प्रत्यक्ष प्राप्त नहीं होता । अर्थात् विषयगत प्रत्यक्ष के प्रयोजक का लक्षण अतिव्याप्त नहीं है ।
विवरण— घटगत-परिमाण की सत्ता प्रमातृसत्ता, से पृथक् न होने पर भी ( उन दोनों का सत्ताकाल एक होने पर भी ) जिस समय घट का प्रमाता विद्यमान है उसी समय घट में घटगत-रूप से भिन्न गुणों के रहने पर भी तत्तदाकार (परिमाणाद्याकार) वृत्ति से युक्त प्रमातृचैतन्य की सत्ता से परिमाणादि विषयों की सत्ता भिन्न होने से पूर्वोक्त लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं ।
इस प्रकार विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण 'प्रमात्रभेद' बताकर लक्षणगत 'अभेद' का अर्थ 'ऐक्य' नहीं, किन्तु प्रमातृसत्ता से प्रमेयसत्ता का अभिन्न ( भिन्न न ) होना अर्थात् प्रमाता की जो सत्ता, वही विषय ( प्रमेय ) की सत्ता है, ( इस प्रकार 'अभेद' का अर्थ ) बताकर, इस लक्षण की अनुमिति आदि में अतिव्याप्ति का न होना बताया । धर्माधर्मादि परोक्ष स्थलों में अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'विषय' में 'प्रत्यक्ष-योग्य' विशेषण लगाने के लिए कहा । 'रूपी घटः' प्रत्यक्ष के समय घटगत परिमाणादि गुणों में अतिव्याप्ति नहीं होती, यह भी दिखाया । अब इसके आगे वादी 'विषयगत-प्रत्यक्षत्व' प्रयोजक के लक्षण में अव्याप्ति को दिखाता है ।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६९
नन्वेवं वृत्तावव्याप्तिः, अनवस्थाभिया वृत्तिगोचर-वृत्त्यनङ्गीकारेण तत्र स्वाकारवृत्त्युपहितत्वघटितोक्तलक्षणाभावात् ।
अर्थ— घटगत-परिमाण में अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'तत्तदाकारवृत्त्युपहित' विशेषण से प्रमाता को विशेषित करने पर भी 'वृत्ति' में पूर्वोक्त लक्षण की अव्याप्ति होती है। क्योंकि अनवस्था के भय से 'वृत्ति' को विषय करने वाली 'दूसरी वृत्ति' के स्वीकार न करने के कारण वृत्ति में 'वृत्त्याकारवृत्त्युपहितप्रमात्रभेद' लक्षण घटित नहीं हो पाया।
विवरण— सभी जड पदार्थ अज्ञान से आवृत होने से स्वतः प्रकाशमान नहीं होते। किन्तु उस पदार्थविषयक-वृत्ति के द्वारा आवरण का भङ्ग होने पर प्रकाशित होते हैं। घटादि जैसे जड़ है उसी तरह अन्तःकरणवृत्ति भी जड़ (अचेतन) है। अतः घटादिविषय जैसे वृत्ति से ही प्रकाशित होते हैं वैसे ही वृत्ति भी दूसरी अन्तःकरणवृत्ति से ही प्रकाशित होने के योग्य है। क्योंकि वृत्ति के जड़ होने से घट की तरह उसका स्वयं भान होना सम्भव नहीं। इसलिए उस वृत्ति के आवरणभंग के हेतु, वृत्ति-विषयक दूसरी वृत्ति की आवश्यकता है। क्योंकि जड़-पदार्थ के आवरण को भंग करनेवाली वृत्ति ही है। परन्तु एक वृत्ति के आवरणभंगार्थ दूसरी वृत्ति के मानने पर उसके आवरण भङ्ग के लिए तीसरी, उसके आवरण भंग के लिए चौथी इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होती है। और यदि वृत्ति को ही न माना जाय, तो बिना उसके जड़ वस्तु का भान होना सम्भव नहीं। ऐसी 'उभयतःपाशा रज्जु' सिद्धान्ती के गले पतित होती है।
अनवस्था के भय से वृत्तिविषयक-वृत्ति न मान सकने के कारण विषयाकारवृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता ही विषयावच्छिन्न-चैतन्य की और घटादिविषय की सत्ता है, अर्थात् उसकी सत्ता से इनकी सत्ता का पृथक् न होना, यह पूर्वोक्त विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण, वृत्ति में नहीं है। परन्तु वृत्ति का प्रत्यक्ष होता है। इस कारण 'लक्ष्य के एक देश में लक्षण का न रहना' यही अव्याप्ति है।
इस प्रकार वादी की शंका का 'इति चेत्' से अनुवाद कर 'न' से उसके निरसन की प्रतिज्ञा करके पूर्वोक्त लक्षण में दी हुई अव्याप्ति को दूर करते हैं—
इति चेत् । न । अनवस्थाभिया वृत्तेर्वृत्त्यन्तराविषयत्वेऽपि स्व-
१. वृत्त्याकारा वृत्तिर्यदि स्यात् तदा प्रथमा वृत्तिः द्वितीयवृत्तेर्विषयः। एवं द्वितीयवृत्तेः प्रत्यक्षाय तदाकारा अन्या वृत्तिः यदि भवेत्, तदा सा द्वितीयवृत्तिः तृतीयवृत्तेः विषयो भवेत्। एवं सति वृत्तिविषयक-वृत्त्यन्तराभ्युपगमे अनवस्था भविष्यति। अतः वृत्त्याकारा वृत्तिः न स्वीकार्या।