वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ वेदान्तपरिभाषा [ जातिखण्डनम्
कारण वह संकर, परोक्षत्व और अपरोक्षत्व के जातित्व का बाध करेगा ।
तार्किकों की इस शंका पर सिद्धान्ती कहता है--
'पर्वतो वह्निमान्' इस विशिष्ट ज्ञान में जाति और उपाधि से विलक्षण, परोक्षत्व और अपरोक्षत्व धर्म मानने पर उसमें (परोक्षत्व-अपरोक्षत्व को) नैयायिकों का इष्ट, जातित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा—यह भय आपका व्यर्थ है । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व में जातित्व का न होना हमें इष्ट ही है । क्योंकि 'प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व' जाति तथा उपाधि से भिन्न धर्म मात्र हैं, यही हमारा (वेदान्तियों का) मत है !
शंका--घटत्वादि अन्य जातियों की तरह परोक्षत्व और अपरोक्षत्व दो जातियां भी प्रमाणसिद्ध हैं । तब उनके प्रमाणसिद्ध जातित्व का स्वीकार न करने पर अतिप्रसंग होगा ।
समाधान--जातित्व और उपाधित्व (जाति और उपाधि) आपके संकेत हैं (आपकी रची परिभाषाएं हैं) उन्हें प्रामाणिकत्व नहीं है (जाति और उपाधि, प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होतीं) ।
शंका--नील-घटत्वादिकों में जैसा उपाधित्व प्रमाणसिद्ध है, उसी तरह घटत्वादिकों में जातित्व भी प्रमाणसिद्ध ही है । तब घटत्व-जाति में कोई प्रमाण नहीं, यह आप कैसे कहते हैं ?
समाधान--आपकी पारिभाषिक 'जाति' के विषय में जैसे प्रमाण नहीं, वैसे ही 'उपाधि' के विषय में भी प्रमाण नहीं है, यह हमारा कथन है । इसी कारण मूल ग्रन्थ में जातित्व के साथ उपाधित्व का भी ग्रहण किया है । अर्थात् 'घटत्वादिकों में जातित्व रहता है' और 'नील-घटत्व में उपाधित्व रहता है' ये आपकी दोनों परिभाषाएं, प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण का विषय न होने से अप्रामाणिक हैं¹ ।
'परोक्षत्वं' वर्तते, 'घटोऽय'मिति प्रत्यक्षज्ञाने परोक्षत्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणं प्रत्यक्षत्वं वर्तते, तयोः परस्परविरुद्धधर्मयोः परोक्षत्वाऽपरोक्षत्वयोः एकत्र 'पर्वतो वह्निमान् इत्यत्र समावेशः, इति तयोः जातित्वं न भवितुमर्हतीत्याशयः । अतः 'पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वे साङ्कर्यं' बाधकं, सर्वांशे ज्ञानस्य परोक्षत्वे तु न साङ्कर्यं, न वा प्रत्यक्षत्वस्य जातित्वोच्छेदः स्यादिति शंकाकर्तुराशयः ।
१. 'नित्यत्वे सति अनेक समवेतत्वम्'—जातिः ।
(क) 'भेदकधर्मवत्त्वम्,—उपाधिः ।
(ख) 'आधुनिकसंकेतः'—परिभाषा ।
एवञ्च घटत्वादीनां नैयायिकी परिभाषा 'जाति'रिति । 'अतद्व्यावृत्ति'रिति बौद्धानां परिभाषा । नीलघटत्वादीनामुपाधिरिति । तथा च--जातित्वमुपाधित्वञ्च तत्तत्सम्प्रदायानां परिभाषामात्रम् । न हि परिभाषामात्रेण कस्यचिदर्थस्य सिद्धिर्भवति ।