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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 482 में से

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जातिखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५७

शंका—'जिस वस्तु का जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया जाता है, उसी इन्द्रिय से तन्निष्ठ जाति और उस वस्तु के अभाव का भी ग्रहण होता है' इस न्याय से 'यह घट' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान से घटत्वजाति का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है' तब 'जाति और उपाधि के विषय में कोई प्रमाण नहीं है' यह आप कैसे कह रहे हैं ? इस शंका का समाधान 'घटोऽयम्०' इत्यादि ग्रन्थ से ग्रन्थकार ने किया है, जिसका आशय इस प्रकार है—

'यह घट' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान घटत्वादिकों के अस्तित्व में ही प्रमाण है। उसके जातित्व में प्रमाण नहीं है। क्योंकि घटत्व के अस्तित्व का ज्ञान कराकर ही वह उपक्षीण (कृतकार्य) हो जाता है। घटत्वादिकों का अस्तित्व सिद्ध करने के लिए ही उस प्रत्यक्ष के प्रवृत्त होने से उसका अस्तित्व सिद्ध करते ही वह कृतार्थ हो जाता है और उसके जातित्व की सिद्धि के लिए अप्रवृत्त होने से वह जातित्व की सिद्धि में उदासीन रहता है।

शंका—घटत्वजाति मे प्रत्यक्षप्रमाण के न होने पर भी अनुमान¹ प्रमाण है— "घटत्व जाति है, क्योंकि (उसे—घटत्व को) उपाधिभिन्न सामान्यधर्मत्व होने से अथवा नित्य और अनेकसमवेत होने से, सत्ता की तरह इस अनुमान से 'घटत्व-जाति' की सिद्धि की जा सकती है। तब ग्रन्थकार 'जातित्वरूप' इत्यादि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान करते हैं—

इस अनुमान में नित्य और अनेकसमवेत रूप लक्षण से युक्त जातित्व रूप साध्य की अप्रसिद्धि होने से उसके अधीन रहनेवाले व्याप्तिज्ञानादि का भी अभाव होता है। अतः इस जातिसाधक-अनुमान को अवसर ही नहीं मिल पाता।

शंका—ऐसे जातित्व की अप्रसिद्धि होने पर भी उस जातित्व के घटक (अवयव-भूत) नित्यत्व, एकत्व और अनेकसमवेतत्व, इनकी क्रम से आत्मा, आकाश और घटादिकों में प्रसिद्धि है। क्योंकि—'नित्यमेकमनेकसमवेतं सामान्यम्' यह 'सामान्याख्य' जाति का लक्षण किया है। उसमें से नित्यत्व 'आत्मा' में, एकत्व 'आकाश' में, और अनेक-समवेतत्व 'घटादिकों' में प्रसिद्ध है। इस प्रकार प्रसिद्ध नित्यत्वादिकों का ग्रहण करके उनसे युक्त हुए जातित्व की घटत्वादिकों में सिद्धि होगी।

ग्रन्थकार ने 'समवायासिद्धा' इत्यादि मूल ग्रन्थ से इस शंका का निरसन किया है, जिसका आशय इस प्रकार है—'समवाय' नाम का कोई पदार्थ ही सिद्ध नहीं है।


१. अनुमान प्रयोगः—'घटत्वादिकं जातिः, उपाधिभिन्नत्वे सति सामान्यधर्मवत्त्वात्' । अथवा 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वात्, सत्तावत्' तत्कथं घटत्वादेः जातित्वे न प्रमाणम्? अनुगतप्रतीतेः अनुमानत्वेऽपि अनुमानस्य मानत्वात्, इति चेन्न । अत्रानुमाने साध्याऽप्रसिद्ध्या हेतुर्दुष्टः । तथा चास्मिन् प्रयोगे जातित्वं साध्यम् । तच्च नित्यानेकसमवेतत्वरूपम् । न च तत् क्वचित् प्रसिद्धम्, सिद्धान्ते क्वापि नित्यानेकसमवेतत्वरूपस्य जातित्वस्य अनभ्युपगमात्, नित्यत्वाभावात्, समावायाऽभावाच्च । तस्मात् साध्यस्य जातित्वस्य अप्रसिद्ध्या हेतौ साध्य-व्याप्तिग्रहाभावेन तस्य च व्याप्यत्वासिद्धत्वेन तत्साध्यकानुमितिर्न भवति ।