वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८ वेदान्तपरिभाषा [ समवायखण्डनम्
( नैया० ) तथापि 'यह घट रूपवान् है' मृत्तिका में अर्थात् मृत्तिका रूप अवयवों में घट अवयवी है। यहाँ रूप और घट अथवा मृत्तिका-घट में संयोग की प्रतीति तो होती नहीं, और सम्बन्ध तो उनमें ( रूप-घट, और मृत्तिका-घट में ) है ही, अतः परिशेषन्याय से युतसिद्ध-पदार्थों में प्रतीत होनेवाले संयोग से भिन्न, अयुतसिद्ध-पदार्थों के 'समवाय' सम्बन्ध की सिद्धि होती ।
(वेदा०) आपका यह कहना उचित नहीं है। कारण, 'रूपादि' गुण और 'वस्त्रादि' गुणी ( द्रव्य ) अथवा 'परमाणु' आदि अवयव और 'द्व्यणुक आदि' अवयवी इनमें भेद स्पष्ट है, तथा उनका सम्बन्ध जो समवाय है वह भी अत्यन्त ( बिलकुल ) भिन्न है, ऐसा स्वीकार करने पर 'दण्डः पुरुषः' में जैसे समानाधिकरण का प्रत्यय संभव नहीं होता वैसे ही 'शुक्ल-घट मृद्घट' इनमें भी समानाधिकरण का प्रत्यय नहीं हो पायेगा। कारण, 'दण्डः पुरुषः' दण्ड ही पुरुष है, यह कभी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनमें अत्यन्त भेद है। उसी तरह गुण-गुणी, अवयव-अवयवी, और द्रव्य तथा समवाय संबंध के भी अत्यन्त भिन्न होने से शुक्ल-घट, मृद्घट, द्रव्यसमवेत-गुण, आदि में समानाधिकरणप्रत्यय की संभावना भी नहीं की जा सकेगी। किन्तु 'शुक्लघट, मृत्तिका में घट' ऐसा समानाधिकरणप्रत्यय तो हुआ करता है। अतः इस समानाधिकरण्य की प्रतीति से 'शुक्ल-घट' आदि में अभेद ( तादात्म्य ) ही स्वीकार करना चाहिये । उपर्युक्त 'दण्डः पुरुषः' उदाहरण व्यतिरेकी है। अन्वयी नहीं है ।
शिवाय दो समवायी पदार्थों का समवाय, अपने समवायी पदार्थों से ( जिनका समवाय हो ) संबद्ध होकर विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है या उनसे असम्बद्ध रहकर ही वह विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है ? घट 'द्रव्य' है और रूप 'गुण' है । ये दोनों पदार्थ युतसिद्ध ( पृथक् सिद्ध ) नहीं हैं, किन्तु अयुतसिद्ध हैं। इस कारण उनमें संयोग-सम्बन्ध नहीं रहता, समवाय सम्बन्ध ही सम्भव होता है। इसलिये 'जिसमें समवाय हो वह समवायी', इस व्युत्पत्ति से घट और रूप ये दोनों पदार्थ समवायी हैं। 'समवाय' उन समवायी पदार्थों से सम्बद्ध होकर 'ये दो पदार्थ समवेत हैं' तथा 'घट रूपी हैं' ( रूपवान् = रूप से युक्त है ) इस विशिष्ट प्रत्यय का नियामक ( कारण ) होता है या वह ( समवाय ) समवायी पदार्थों से सम्बद्ध न होकर ही उक्त विशिष्ट प्रत्यय का नियामक होता है ? यह प्रश्न सिद्धान्ती ने 'समवाय संबंध' को पृथक् पदार्थ माननेवाले तार्किक से किया है। ऐसे उभयकोटिक प्रश्न को विकल्प कहते हैं । 'दण्डी पुरुषः' ( दण्डवान् पुरुष ) यह विशिष्ट प्रत्यय है। क्योंकि इसमें 'दण्ड' विशेषण और 'पुरुष' विशेषित ( विशेष्य ) है । 'यह पुरुष दण्डवान् है' इस प्रत्यय ( अनुभव ) का विषय 'विशेषित ( विशेषणयुक्त ) पुरुष' है। इसलिये यह विशिष्ट प्रत्यय है । उसी तरह 'रूपी ( रूपवान् ) घटः' इसमें भी 'रूप' विशेषण से युक्त ( विशेषित = समवेत ) घट, विषय है। इस कारण भी विशिष्ट-प्रत्यय है । ऐसे विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक कौन ? सम्बद्ध-समवाय या असम्बद्ध-समवाय ?