वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसमवायखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५९
सिद्धान्ती—'समवाय, समवायी पदार्थों से सम्बद्ध होकर विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है' इस प्रथम पक्ष को मानने पर अनवस्था दोष होगा। जैसे--नैयायिक का कहना है कि—'रूपी घटः' इस प्रत्यय में 'रूप और घट' दोनों पदार्थ बिलकुल भिन्न हैं, तथापि परस्पर संबद्ध हैं। इन दो अयुतसिद्ध पदार्थों में संयोग सम्बन्ध की सम्भावना तो बन ही नहीं सकती। अतः नित्यसम्बद्ध समवाय की सिद्धि हो जाती है।
तब वेदान्ती कहता है कि 'समवाय' भी तो सम्बन्ध ही है। इसी कारण वह रूप और घट इन दो पदार्थों के मध्य में रहता है। यह रूपात्मक या घटात्मक न होकर रूप और घट से बिलकुल भिन्न है। तब उनको सम्बद्ध कराने के लिए एक और सम्बन्ध की आवश्यकता होगी। अन्यथा असम्बद्ध और अतद्रूप समवाय उन दो पदार्थों में किसी प्रकार के अतिशय को पैदा नहीं कर सकता। इस कारण रूप और समवाय का कल्पित सम्बन्ध भी परस्पर सम्बद्ध होकर ही सम्बन्धी पदार्थों में अतिशय को पैदा कर सकेगा। अतः समवाय और समवायी का सम्बन्ध होने के लिये दूसरा समवाय, उसके सम्बन्ध के लिये तीसरा, उसके सम्बन्ध के लिए चौथा, इस प्रकार अविच्छिन्न समवायपरम्परा प्राप्त होगी। इसी को अनवस्था दोष कहते हैं। रूप और घट से समवाय की स्वरूप से ही स्थिति मानने पर 'घट और पट' के संयोग की भी स्वरूप से ही स्थिति माननी होगी। अर्थात् घट पटादि पदार्थों पर संयोग की समवाय से स्थिति की कल्पना करना व्यर्थ है। इसलिये रूप और घट का तादात्म्य मानना ही सर्वथा सयुक्तिक है।
यदि ऐसा कहें कि समवाय, समवायी पदार्थों से नित्यसम्बद्ध हुआ ही प्रतीत होता है, जिससे पूर्वोक्त अनवस्था दोष नहीं हो सकेगा। तो संयोग भी संयोगी पदार्थों से नित्य-सम्बद्ध हुआ ही प्रतीत होता है तब संयोग को सम्बन्धित होने के लिए एक दूसरे समवाय सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए। इस पर यदि ऐसा कहें कि दो द्रव्यों का संयोग होने से 'संयोग' पृथक् पदार्थ है, उसे 'गुण' कहते हैं, अतः अपने स्वरूप (गुण) से भिन्न स्वरूप वाले द्रव्य से सम्बन्धित होते समय उसे 'समवाय' की अपेक्षा नहीं रहती। तो समवाय भी अर्थान्तर (पृथक् पदार्थ) है अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म पदार्थों से वह भिन्न पदार्थ है। तब वह द्रव्य, गुण और कर्म से सम्बन्धित होते समय दूसरे 'समवाय' की अपेक्षा कैसे नहीं करेगा ? अवश्य ही करेगा। इस पर यदि ऐसा कहें कि 'संयोग' यह गुण पदार्थ होने से द्रव्यों से सम्बन्धित होते समय 'समवाय' की अपेक्षा करता है। 'संयोग' की तरह 'समवाय' स्वयं गुण नहीं है, अपितु सात पदार्थों में से छठा पदार्थ है। इसलिए उसे दूसरे 'समवाय' की अपेक्षा नहीं होती कहें, तो 'संयोग' को गुणत्व आपकी परिभाषा में है, शास्त्रीय नहीं। सिवाय अपेक्षा में निमित्त 'पदार्थान्तरत्व' का होना दोनों में समान है। 'संयोग' जैसे संयोगी से पृथक् पदार्थ है, वैसे 'समवाय' भी 'समवायी' से पृथक् पदार्थ है। अतः जैसे संयोग, संयोगी के साथ सम्बद्ध होने के लिए समवाय की अपेक्षा रखता है वैसे ही समवाय को समवायी से सम्बद्ध होने के लिए दूसरे समवाय