वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजातिखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५५
सकलप्रमाणागोचरतया अप्रामाणिकत्वात् । घटोऽयमित्यादि प्रत्यक्षं हि घटत्वादिसद्भावे मानं, न तु तस्य जातित्वेऽपि ।
जातित्वरूप-साध्याप्रसिद्धौ तत्सा¹धकानुमानस्याप्यनवकाशात् । समवायासिद्ध्या ब्रह्मभिन्न²निखिलप्रपञ्चस्यानित्यतया च नित्यत्व-समवेतत्व-घटित-जातित्वस्य घटत्वादावसिद्धेश्च । एवमेवोपाधित्व³मपि निरसनीयम् ॥
अर्थ—'पूर्वोक्त प्रकार से एक ज्ञान में आंशिक परोक्षत्व और आंशिक अपरोक्षत्व इन दो धर्मों का स्वीकार करने से उन दोनों को भी जातित्व नहीं है' यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व का जातित्व न होना हमें इष्ट ही है । क्योंकि जातित्व और उपाधित्व की परिभाषा (तर्कशास्त्र का संकेत) किसी प्रमाण का विषय न होने से अप्रामाणिक है (उस परिभाषा में कोई प्रमाण नहीं है) । 'यह घट है' इत्यादि प्रत्यक्ष-प्रमाण घटत्वादिकों के अस्तित्व में ही प्रमाण है, उनके जातित्व में प्रमाण नहीं हो सकता । इस प्रकार जातित्वरूप साध्य की अप्रसिद्धि (सर्वथा असिद्धि) होने से तत्साधक अनुमान की भी प्रवृत्ति हो नहीं सकती और समवाय की प्रमाण से सिद्धि न होने से तथा ब्रह्मभिन्न समस्त प्रपञ्च की अनित्यता होने से नित्यत्व और समवेतत्व से युक्त जातित्व की घटत्वादिकों में असिद्धि होती है । इस कारण 'यह घट है' इत्याकारक प्रत्यक्ष, घटत्वादिकों के जातित्व में प्रमाण नहीं हो सकता । इसी न्याय से नैयायिकों के पारिभाषिक उपाधित्व का भी निरसन कर देना चाहिये ।
**विवरण—**उपर्युक्त शंका का आशय इस प्रकार है—'पर्वत वह्निमान् है' इस एक ही ज्ञान में 'परोक्षत्व' भी है और 'अपरोक्षत्व' भी है—ऐसा आप कहते हैं । परन्तु 'पर्वत वह्निमान् है' यह वह्निप्रकारक-पर्वतविशेष्यक और संयोगसंसर्गक विशिष्ट ज्ञान एक ही है, किन्तु उसे पर्वतरूप विशेष्यांश में प्रत्यक्ष और अग्निरूप विशेषणांश में परोक्ष मानने पर प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व धर्मों में जातित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा । क्योंकि वह विशिष्ट ज्ञान, सांकर्य रूप जातिबाधक-कारण से युक्त है । 'परस्पर समानाधिकरण न होनेवाले दो धर्मों का एक स्थान में समावेश होना' (उनका एक अधिकरण में रहना) संकर कहलाता है । 'संकर', जाति का बाधक (बाध करनेवाला) दोष है । उपर्युक्त दो धर्मों का 'पर्वतो वह्निमान्' इस स्थल में संकर⁴ होता है । इस
१. 'साध्यका:'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'भिन्नाखिल:'--इति पाठान्तरम् ।
३. 'पाधित्वं निर०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः' इत्यनुमितौ अपरोक्षत्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणं