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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 482 में से

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५४ | वेदान्तपरिभाषा | [ जातिखण्डनम्

सुगंधी है' यह ज्ञान उसे हो रहा हो तो 'चन्दन-खण्डत्व' रूप लिंग (हेतु) से होनेवाला सौरभज्ञान 'अनुमितिज्ञान' कहावेगा। आम्रफल के मधुर रस के विषय में भी इसी तरह समझना चाहिये। क्योंकि पूर्वोक्त 'पर्वत अग्निमान् है' इस अनुमितिज्ञान में पर्वत की तरह प्रस्तुत उदाहरण में सौरभ व माधुर्य का आश्रयभूत मूठा और आम्रफल प्रत्यक्ष दीखते हैं। इस कारण तत्तद् अंश में उनका ज्ञान अपरोक्ष ही है।

शंका—सौरभ में भी योग्यविषयता है। वह घ्राणेन्द्रिय का विषय बन सकता है। तब सौरभ अंश में भी ज्ञान अपरोक्ष क्यों नहीं ? अर्थात् सुगन्ध में इन्द्रिययोग्यविषयत्व होते हुए भी उसका ज्ञान क्यों न प्रत्यक्ष हो।

समाधान—सौरभ में चक्षुरिन्द्रिय-विषय होने की योग्यता नहीं है तथापि घ्राणेन्द्रिय के विषय होने की योग्यता है, क्योंकि सुगन्ध घ्राणेन्द्रिय का विषय है, वह चक्षुरिन्द्रिय का विषय नहीं। इस कारण हमने प्रत्यक्ष-प्रयोजक का जो पहले 'तत्तदिन्द्रिययोग्यत्वघटित' लक्षण¹ बताया है, उसका इस सौरभ में अभाव है। केवल चक्षु से देखकर सौरभ का अपरोक्ष ज्ञान होना शक्य नहीं। इसलिये उपर्युक्त शंका हो नहीं सकती।

जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष 'असन्निकृष्ट' (परोक्ष) रहता है उस अनुमिति में पक्ष की अपरोक्षता का असन्निकृष्टत्व (परोक्षत्व) जैसा बाधक बनता है उसी तरह जिस अनुमिति में पक्ष सन्निकृष्ट (अपरोक्ष) है ऐसे 'चन्दन सुरभि है' ज्ञान में 'पक्षांश' का ज्ञान अपरोक्ष तथा 'साध्यांश' का ज्ञान परोक्ष होता है। यह मानने पर प्रसिद्ध जातिबाधक 'सांकर्य' की प्राप्ति बाधक होती है। इस कारण 'ज्ञान, पक्ष के अंश में अपरोक्ष और साध्य के अंश में परोक्ष होता है' यह तुम्हारा पूर्वोक्त कथन अनुचित है। इस शंका का अनुवाद कर उसका निरसन किया जाता है :--

न चैवमेकत्र ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरभ्युपगमे तयोर्जातित्वं न स्यादिति वाच्यम्। इष्टत्वात्, जातित्वोपाधित्व-परिभाषायाः


१. 'तत्तदिन्द्रियवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याभिन्नयोग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभेद' रूपस्थलक्षणस्याभावः।

२. असन्निकृष्टपक्षकानुमितिस्थले पक्षस्य प्रत्यक्षत्वे यथा असन्निकृष्टत्वं बाधकं, तथा इदं चन्दनं सुरभि चन्दनखण्डत्वात् चन्दनखण्डान्तरवत्' इति—सन्निकृष्टपक्षकानुमितिस्थले चन्दनखण्डांशे अपरोक्षत्वं (प्रत्यक्षत्वं) सौरभांशे परोक्षत्व-(अप्रत्यक्षत्व-) मिति परोक्षत्वाऽपरोक्षत्वयोः अभ्युपगमे प्रसिद्धजातिबाधकसङ्कर्यप्रसङ्गो बाधको भवेत्। तथा चोक्तं किरणावल्याम्—'व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथानवस्थितिः। रूपहानि रसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः'॥ संकरश्च—'परस्परात्यन्ताभावसमानाधिकरणधर्मयोरेकत्रसमावेशः।' तथा च नेदं युक्तमित्याशंक्य निराकरोति ग्रन्थकारः 'न चे'ति। तत्र जातित्वाभावस्तु अभीष्ट एव जात्युपाध्युदासीनधर्ममात्रस्याभ्युपगमात्।

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