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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 482 में से

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प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५३

विवरण—परन्तु इसके विपरीत ( १ )—'पृथिवी के परमाणु गंधवान् हैं। ( २ )—क्योंकि उनमें पृथिवीत्व है। ( ३ )—घटादिकों के समान' । इस अनुमान¹ में पृथिवी के परमाणु-पक्ष हैं। परन्तु वे अप्रत्यक्ष ( असन्निकृष्ट ) हैं। क्योंकि उनमें प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है। इसी तरह जिस अनुमिति-ज्ञान में 'पक्ष' अप्रत्यक्ष होता है उस अनुमान में पक्ष और साध्य रूप दोनों अंशों में ज्ञान 'परोक्ष' होता है। और जिस अनुमिति में पक्ष, प्रत्यक्ष रहता है वहाँ पक्ष रूप अंश में ज्ञान प्रत्यक्ष रहता है और साध्य अप्रत्यक्ष ( परोक्ष ) रहता है। अतः जिस अनुमिति में पक्ष तथा साध्य भी अप्रत्यक्ष हो वहाँ पक्ष और साध्य रूप दोनों अंशों में ज्ञान परोक्ष ही रहता है—इस नियम के अनुसार ही 'सुरभिचन्दनम्' ज्ञान की विशेषता के सम्बन्ध में शंका करते हैं—

शंका—चन्दन का मूठा; देखनेवाले व्यक्ति से दूर है, और उस व्यक्ति को 'यह चन्दन का मूठा सुगन्धी है' इत्याकारक ज्ञान उस मूठे को देखकर ही हुआ है। ऐसी स्थिति में यह ज्ञान 'सौरभ' अंश में परोक्ष है या अपरोक्ष ? उस ज्ञान में परोक्ष की सामग्री न होने से उसे परोक्ष नहीं कह सकते। 'जहाँ जहाँ चन्दन का टुकड़ा होता है, वहाँ वहाँ सुरभित्व होता है' इत्यादि व्याप्तिज्ञानादि, 'परोक्ष ज्ञान' की सामग्री है, परन्तु वह ( सामग्री ) 'चन्दन सुरभि है' इस ज्ञान के पूर्व सम्भव नहीं होती। सिवाय उस ज्ञान का विषय जो 'सौरभ', वह प्रत्यक्ष-योग्य भी है। इसलिए उस विषय में भी अनुमान करना व्यर्थ है। अतः 'सुरभि चन्दनम्' यहाँ ज्ञान को 'सौरभ अंश' में परोक्ष नहीं कह सकते, और अपरोक्ष भी नहीं कह सकते। क्योंकि वहाँ सुगन्धाकार वृत्ति, उत्पन्न नहीं हुई है। और विषयाकार वृत्ति जब तक उत्पन्न नहीं होती तब तक अपरोक्ष ज्ञान का सम्भव नहीं।

समाधान—इस पर सिद्धान्ती कहता है—'चन्दन सुगन्धि है' यहाँ सौरभ अंश में ज्ञान को हम परोक्ष ही मानते हैं। ( मूल में 'इत्यादि ज्ञानम्' के आदि शब्द से 'मधुर आम्रफल' इत्यादि दूसरे ज्ञानों का भी ग्रहण करना चाहिये ) किसी व्यक्ति ने दूर से ही चन्दन का मूठा अथवा आम्रफल को चक्षु से देखा और उसे वह मूठा या फल देखकर ही 'चन्दन सुगन्धि है और आम्रफल मधुर है' ज्ञान हुआ। उस स्थिति में उसे गन्ध का या रस का जो ज्ञान हो रहा है, वह परोक्ष है या अपरोक्ष ? क्योंकि उसने चन्दन को स्वयं सूंघा नहीं या आम्रफल को चखा नहीं, किन्तु दूर से ही उन पदार्थों को चक्षु से केवल देखा है। अतः उस ज्ञान में संशय होता है।

तथापि ऐसे प्रसंग में गंध-रसादिकों का ज्ञान 'परोक्ष' और चन्दन का टुकड़ा तथा आम्रफल का ज्ञान 'अपरोक्ष' रहता है, यही मानना चाहिये। क्योंकि उस व्यक्ति ने पहले उसी चन्दन का यदि गन्ध लिया होता तो मूठे को केवल देखकर ही 'वह सुगन्धी है' यह उत्पन्न हुआ ज्ञान 'स्मृति' कहावेगा। और यदि उसने पहले बिना सूंघे ही 'वह


१. 'पृथिवीपरमाणवः गन्धवन्तः पृथिवीत्वात् घटवत्' इत्यनुमानम् ।

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