भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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४२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रत्यक्षविचारः

'भिन्नदेशस्थ उपाधियों' को भेदजनकत्व है और 'एकदेशस्थ उपाधियों' को भेद-जनकत्व नहीं है—ऐसी गुरुकल्पना करने की अपेक्षा 'विशेषण' की तरह 'उपाधियों' में भी स्वरूप से ही भेदजनकत्व मानने में कल्पनालाघव होगा' ऐसी आशङ्का होने पर सिद्धान्ती 'अत एव' आदि ग्रन्थ से उसका समाधान करता है। एक देश में स्थित होने से ही उन दो उपाधियों को भेदजनकत्व नहीं है—यह अनुभव में आने से मठ (घर) में स्थित घट से अवच्छिन्न हुआ आकाश, मठावच्छिन्न-आकाश से भिन्न नहीं है। मठ-रूप उपाधि के भाग में 'घट' रहता है। इस कारण महाकाश और घटावच्छिन्नाकाश दोनों एक स्थान में स्थित हुई उपाधियों से अवच्छिन्न हैं, इसलिए वे परस्पर भिन्न नहीं हैं। घट के प्रत्यक्ष ज्ञान के समय घट देश के साथ अन्तःकरण का संयोग होता है। अन्तःकरण के 'एक भाग' को ही वृत्ति कहते हैं। इस कारण 'घटावच्छिन्न-चैतन्य', और घट को 'अभिव्यक्त करनेवाला चैतन्य' दोनों एक ही हैं। अर्थात् फलमुख (फल-प्रधान = सफल) गौरव दोषावह नहीं होता। अब इस विचार विनिमय से जो निष्कर्ष निकला उसे कहते हैं—

तथा चायं घट इति घटप्रत्यक्षस्थले घटाकारवृत्तेर्घटसंयोगितया घटावच्छिन्नचैतन्यस्य तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य चाभिन्नतया तत्र घटज्ञानस्य घटांशे प्रत्यक्षत्वम्²।

अर्थ— इस प्रकार दो उपाधियों के एकदेशस्थित होने से उपाधेयों में भेद उत्पन्न करने का सामर्थ्य नहीं रहता। ऐसा निर्णीत होने पर 'यह घट है' इस प्रत्यक्ष ज्ञान में घटाकारवृत्ति में घटसंयोगित्व होता है। (वृत्ति, घट से संयुक्त हो जाती है) इस कारण 'घटावच्छिन्न चैतन्य' और घटाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य' का अभेद (ऐक्य) होता है और इन दो चैतन्यों का ऐक्य होने से 'यह घट है' इस प्रत्यक्ष स्थल में घटज्ञान 'घट' अंश में प्रत्यक्षत्व है।


१. 'प्रत्यक्षस्थले'—इति पाठान्तरम्।
२. अयमभिप्रायः—'अयं घटः' इति प्रत्यक्षस्थले घटाकारवृत्तेः घटसम्बन्धे सति विषयस्य--घटावच्छिन्नचैतन्यस्य, प्रमाणस्य--घटसंयुक्तघटाकारान्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्यस्य च एकदेशस्थितोपाधिद्वयावच्छिन्नत्वेन अभेदात् अभिव्यक्तं घटावच्छिन्नचैतन्यं घटप्रत्यक्षमित्युच्यते।
उपाध्योः एकदेशस्थत्वं कुत्रचित् स्वतः कुत्रचिच्च परतः। तत्रान्तरप्रत्यक्षे स्वतः, वृत्ति-विषययोः सदैव एकस्मिन् देशे सम्बन्धात्। बाह्यप्रत्यक्षे तु परतः, तत्रोपाध्योः स्वतो भिन्नदेशत्वात्। यदा तु वृत्तेरिन्द्रियद्वारा विषयसम्बन्धः, तदा तत्सम्बन्धाधीनं तयोरुपाध्योरेकदेशस्थत्वम्।