भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 482 में से

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प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४१

यहाँ पर अव्याप्त है—ऐसी आशंका होने पर सिद्धान्ती 'यह घट है' इत्यादि प्रत्यक्षप्रमा में प्रत्यक्षलक्षण का समन्वय करके दिखाते हैं।

तथा^१ चायं घट इत्यादिप्रत्यक्षस्थले घटादेस्तदाकारवृत्तेश्च बहिरेकत्र देशे समवधानात् तदुभयावच्छिन्नं चैतन्यमेकमेव, विभाजकयोरप्यन्तःकरणवृत्ति-घटादिविषययोरेकदेशस्थत्वेन भेदाऽजनकत्वात्^२ । अत एव मठान्तर्वर्ति-घटावच्छिन्नाकाशो न मठावच्छिन्नाकाशाद्भिद्यते ।

अर्थ— इन्द्रिय ओर विषय के सन्निकर्ष के समय 'अन्तःकरण' शरीर से बाहर निकलता है। तब 'यह घट है' इत्यादि प्रत्यक्षप्रमा में घटादिविषय और तदाकार (घटाकार) वृत्ति का शरीर के बाहर एक स्थान में अवस्थान होने से उन दोनों से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' एक ही है। क्योकि अन्तःकरणवृत्ति और घटादिविषय, ये उपाधियां उपहित में भेद करनेवाली होने पर भी उनकी एक स्थान में स्थिति होने से वे भेद नहीं कर सकतीं। इसी कारण गृहस्थित घट से अवच्छिन्न हुआ आकाश, उस गृह से अवच्छिन्न हुए आकाश से भिन्न नहीं है।

विवरण— 'चैतन्य' के एक होने पर भी वह 'उपाधि' के भेद के कारण भिन्न होता है। 'घटाकाश' 'मठाकाश' से भिन्न है। इसी प्रकार 'प्रमाणचैतन्य' की 'वृत्ति' उपाधि है और 'विषयचैतन्य' की 'विषय' उपाधि है। इसलिये एक स्थान पर स्थित हुई भी दो विशेषणों की तरह उन दो उपाधियों में भेद-जनकत्व हैं (वे दो चैतन्य भिन्न ही हैं) तब उनमें अभेद कैसे सम्भव होता है? यह शंका होने पर सिद्धान्ती कहता है—'यह घट है' इत्याकारक ज्ञान 'घट' अंश में प्रत्यक्ष है। 'घट' और 'घट के सम्बन्ध से घटाकार हुई वृत्ति' इन दो उपाधियों से अवच्छिन्न हुआ 'द्विविध चैतन्य', शरीर के बाहर एक ही स्थान में स्थित हुईं उन दो उपाधियों से अवच्छिन्न (युक्त) हुआ है। अतः उनके भेद की प्रतीति नहीं हो सकती। क्योंकि भिन्न-भिन्न स्थानों में स्थित उपाधियां ही उपाधेयों में भेदप्रतीति करा सकती हैं। विशेषणों की तरह उपाधियों को स्वरूपतः भी भेदजनकत्व नहीं है। भिन्न देशों में स्थित उपाधियों में भेदजनकत्व होने पर भी एकदेशस्थित उपाधियों में (वृत्ति और विषय को) भेदजनकत्व नहीं है।


१. प्रत्यक्षलक्षणघटकत्वेन निरूपितं तावत् प्रमाणचैतन्यं विषयचैतन्यं च । इदानीं तु वृत्तेर्विषयदेशमनिर्गमनस्य चैतन्ययोरभेदात्मकं फलं निरूप्यते 'तथा चे'त्यनेन ग्रन्थेन ।
२. अयमभिप्रायः—उपाधिः उपाधित्वेन उपधेयस्य चैतन्यस्य न भेदप्रयोजकः, अपि तु भिन्नदेशस्थितत्वेन । एकदेशस्थितत्वेन तु स एव अभेदप्रयोजकः । एकश्चात्र उपाध्योर्वृत्ति-विषययोः एकदेशस्थितत्वात् उपाधेययोश्चैतन्ययोर्न भेदव्यवहारः, किन्तु अभेदव्यवहारः ।

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