भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 98

४० | वेदान्तपरिभाषा | [ वृत्तिनिरूपणम्

द्वारा शरीर से बाहर निकल कर घटादि विषय तक जाता है और घटादि विषयों के आकार में परिणत होता है। उस परिणाम को ही वृत्ति कहते हैं। परन्तु अनुमित्यादि प्रमास्थलों में (अनुमिति, उपमिति इत्यादि प्रमाओं में) 'अन्तःकरण' अग्नि के देश में नहीं जाता, क्योंकि उस समय अग्नि आदि विषयों का चक्षुरादि इन्द्रियों से सन्निकर्ष (सम्बन्ध) नहीं हुआ रहता।

विवरण— किसी तालाब या नदी का बाँध से रोक रखा जल किसी नहर अथवा स्वाभाविक मार्ग से ही बहकर खेत में प्रविष्ट होकर उस विशिष्ट आकार को धारण कर लेता है। अन्तःकरण के परिणाम होने के विषय में यह दृष्टान्त दिया है। इस जल के परिमाण की तरह ही 'तैजस अन्तःकरण' का भी परिणाम होता है। 'अन्तःकरण' सत्त्वगुण का कार्य है। सत्त्व को ही 'तेज' कहते हैं। क्योंकि वह प्रकाशक है। 'तैजस' विशेषण से अन्तःकरण अत्यन्त स्वच्छ, विरल, तेजोद्रव्य है, यह सूचित किया है। इसलिये सूर्यकिरण की तरह वह (अन्तःकरण) शीघ्र फैल सकता है। शीघ्र गमन करना उसका स्वभाव ही है। अतः 'मध्यमपरिमाण वाला अन्तःकरण' शरीर के बाहर कैसे जा सकेगा? यह शङ्का नहीं हो सकती। दृष्टान्त में बताये हुए जल की तरह ही 'तैजस मन' इन्द्रिय-छिद्रों में से बाहर निकल कर जहाँ विषय हो वहीं जाता है और उसके आकार का हो जाता है। इन आकारों में होनेवाला अन्तःकरण का परिणाम ही अन्तःकरण की वृत्ति कही जाती है। अर्थात् खेत के आकार में परिणत हुआ जल, तालाब के जल से जैसे पृथक् नहीं, वैसे ही विषयाकार हुआ मन 'मूल मन' से पृथक् नहीं है। इसलिए स्वतः विकसित हुआ 'मन' ही वृत्ति शब्द से कहा जाता है। 'वृत्ति' उसका वास्तविक परिणाम नहीं है।

शंका— अनुमिति आदि प्रमाओं में भी 'अन्तःकरण' अग्नि आदि के देश में जाकर 'वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य' का अग्नि आदि 'विषयावच्छिन्न चैतन्य' के साथ अभेद (ऐक्य) होने से आपका कहा हुआ 'ज्ञानगत प्रत्यक्ष' का प्रयोजक अनुमिति आदि में अतिव्याप्त हो रहा है।

उत्तर— अनुमिति आदि स्थलों में अतिव्याप्ति नहीं है, क्योंकि अनुमिति आदि स्थलों में 'अन्तःकरण' अग्नि आदि के देश में नहीं जाता। क्योंकि अनुमिति आदि प्रमाओं में अनुमित अग्नि आदि विषयों के साथ चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों का सन्निकर्ष नहीं रहता। चक्षुरादि इन्द्रियों का उसके धूमादि लिङ्गों से सन्निकर्ष रहता है। इसलिये ज्ञानगत 'स्वरूपचैतन्य' से भिन्न 'विषयगत प्रत्यक्ष' का प्रयोजक, अनुमिति आदि प्रमाओं में अतिव्याप्त नहीं होता।

'तथापि प्रत्यक्ष ज्ञान, में भी वृत्ति और घट इनका भेद होने से उन भिन्न उपाधियों से युक्त—'प्रमाण-प्रमेय चैतन्यों' का भी भेद अवश्य ही रहेगा। इसलिए पूर्वोक्त प्रयोजक