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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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वृत्तिनिरूपणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३९

इसके अतिरिक्त उसका मध्यमपरिमाण मानने पर शरीर के भीतर रहने से बाहर निकलना नहीं बन सकेगा। अतः अन्तःकरण का परिमाण 'अणु' है, यही मानना चाहिये। तब अणुपरिमाणयुक्त पदार्थ की वृत्ति (परिणाम) का होना संभव नहीं। इस कारण 'अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य-प्रमाणचैतन्य है' यह आपका कहना ठीक नहीं है। इस प्रकार तार्किकों के शङ्का करने पर सिद्धान्ती कहता है--

अन्तःकरण को अणुपरिमाणयुक्त मानने पर देहव्यापि सुखादियों का जो उपलब्धि होती है (देहगत सुखादियों का जो अनुभव होता है) उसकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। इसलिए मन को 'अणु' कहना ठीक नहीं। इसके अतिरिक्त प्राणशक्ति का आश्रयभूत 'मन' सुदूरस्थित 'ध्रुव' तक जब जायगा तो उसके साथ उससे अवच्छिन्न हुआ जीव भी जायगा, जिससे देह निर्जीव होने का प्रसङ्ग उपस्थित होगा। इसलिये मन (अन्तःकरण) का परिमाण 'मध्यम' ही मानना चाहिये। इस प्रकार अन्तःकरण 'मध्यमपरिमाणता' सिद्ध करके उसकी वृत्ति की संभावना भी दृष्टान्त से बताते हैं।

तत्र यथा तडागोदकं छिद्रान्निर्गत्य कुल्यात्मना केदारान्प्रविश्य तद्वदेव चतुष्कोणाद्याकारं भवति। तथा तैजस¹मन्तःकरणमपि चक्षुरादिद्वारा निर्गत्य घटादिविषयदेशं गत्वादिविषयाकारेण परिणमते²। स एव परिणामो वृत्तिरित्युच्यते। अनुमित्यादिस्थले तु नान्तःकरणस्य वह्न्यादिदेशगमनं, वह्न्यादेश्चक्षुराद्यसन्निकर्षात्।

अर्थ—'जैसे तालाब का जल छेद से निकल कर नाली के रास्ते से होता हुआ खेतों में प्रविष्ट होता है और उसी के आकार का तिकोना, चौकोना या वर्तुलाकार बन जाता है, वैसे ही पूर्वोक्त तीन उपाधियों में से 'तैजस अन्तःकरण' भी चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों के


१. अन्तःकरणस्य तैजसत्वविशेषणेन शीघ्रगमनसामर्थ्यं सूच्यते, यद्यपि नाणुपरिमाणमन्तःकरणम्, दूरवर्तिध्रुवादिविषयदेशपर्यन्तं गमनेन देहस्य विषयापरोक्षतादशायां निर्जीवत्वापत्तेः, नापि मध्यमपरिमाणन्तत्, देहादिवन्मन्दगमनप्रसंगेन झटिति विषयप्रतिभानायोगात्, नापि आकाशादिवत् परममहापरिमाणम्, निष्क्रियत्वापत्तेः तथापि अन्तःकरणस्य तैजसद्रव्यत्वेन रविकिरणवत् शीघ्रप्रसरणशीलत्वात् तत्परिणामो वृत्तिरिति सुसंगतमेव।

२. साकारद्रव्यसम्बद्धान्तःकरणस्य द्रव्याकारसमानाकारता तु भवितुमर्हति; किन्तु आकाररहितैर्गुणैः सम्बद्धस्वान्तःकरणस्य कथं गुणाकारसमानाकारता भवितुं शक्येति शंका शांकरभाष्यावलोकनेन निरस्ता भवति। तत्र च गुणादीनां द्रव्याऽभिन्नतया द्रव्याकारस्यैव गुणाद्याकारत्वात्। तथा च शांकरभाष्यम्--"तस्माद् द्रव्यात्मकता गुणस्य। एतेन कर्म-सामान्य-विशेष-समवायानां द्रव्यात्मकता व्याख्याता।"