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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 482 में से

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३८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रत्यक्षलक्षणम्

जन्यत्व ही उसका प्रयोजक है, ऐसा तार्किक लोग मानते हैं। परन्तु वेदान्ती मन को इन्द्रिय नहीं कहते, प्रत्युत मन के इन्द्रियत्व का निराकरण करते हैं। परन्तु 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभव में आनेवाले साधारण ज्ञानों में अनुवृत्त ( व्यापक ) होने वाला दूसरा प्रयोजक उपलब्ध न होने से सुखादिकों में प्रत्यक्षत्व नहीं है—ऐसा अनुभवविरुद्ध स्वीकार करना होगा। इस आशय से 'वेदान्त सिद्धान्त में प्रत्यक्षता का प्रयोजन क्या है ? कुछ भी नहीं है' इस प्रकार तार्किक के कहने पर सिद्धान्ती 'हमारे सिद्धान्त में प्रत्यक्षता का प्रयोजक है' कहने के उद्देश्य से तार्किकों के उपर्युक्त आक्षेप का निरसन करने के लिए उनसे प्रश्न करता है कि 'तुम ज्ञान ( वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ) की प्रत्यक्षता का कारण पूछ रहे हो या ज्ञेय ( विषय ) की प्रत्यक्षता का प्रयोजन पूछ रहे हो ? तब वादी ने कहा कि—'मैं ज्ञानगत ( ज्ञान की ) प्रत्यक्षत्व ( प्रत्यक्षता ) का प्रयोजक ( कारण ) पूछ रहा हूँ ।' यह सुनकर सिद्धान्ती ने उत्तर दिया "प्रमाणचैतन्य ( वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ) और प्रमेयचैतन्य ( विषयावच्छिन्न चैतन्य ) इन दोनों का ऐक्य ही ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है ।"

तब वादी पूछता है—तुम अद्वैतियों के मत में चैतन्य का प्रमाणचैतन्य और प्रमेयचैतन्य आदि भेद ही कैसे संभव हो सकता है ? और यदि वह असंभव है तो 'प्रमाणचैतन्य और प्रमेयचैतन्यों का अभेद' ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक होता है यह कैसे कह सकते हो ? सिद्धान्ती—अद्वैतवाद में एक अद्वितीय चैतन्य का वास्तविक भेद नहीं है तथापि आकाश के घटाकाशादि भेदों की तरह उसका भी औपाधिक भेद होना संभव है । उसी को देखिए—विषयचैतन्य, प्रमाणचैतन्य और प्रमातृचैतन्य, यह त्रिविध चैतन्य है । घटादि विषयों से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही विषयचैतन्य है । अन्तःकरण की वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही प्रमाणचैतन्य है । अन्तःकरण से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही प्रमातृचैतन्य है । इस प्रकार सिद्धान्ती ने आकाश के घटाकाश मठाकाशादि औपाधिक भेदों की तरह चैतन्य का भी विषय, अन्तःकरणवृत्ति, और अन्तःकरण इन तीन उपाधियों के कारण त्रिविध भेद होता है । इस प्रकार सिद्धान्ती के कहने पर वादी पूछता है—अन्तःकरण की वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य प्रमाणचैतन्य होता है, यह आप कैसे कहते हैं ? क्योंकि अन्तःकरण का परिमाण 'अणु' है । अतः अणुपरिमाणवाले अन्तःकरण की वृति का होना सम्भव नहीं । अन्तःकरण का 'महत् परिमाण' भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्राणशक्ति के आश्रयभूत अन्तःकरण की ही उत्क्रान्ति, गति आदि सुनी जाती है । महत् परिमाण से युक्त आकाश, काल आदि पदार्थों की उत्क्रान्ति, गति आदि नहीं हुआ करती । अन्तःकरण को 'मध्यम-परिमाण' वाला भी नहीं कह सकते, क्योंकि देह की तरह उसका 'मध्यम परिमाण' मानने पर देह की तरह उसकी गति भी मन्द माननी होगी । जिससे वह विषय को 'एक क्षण' में प्रकाशित नहीं कर सकेगा । परन्तु वह तो हजारों कोस दूर पर स्थित 'ध्रुव' को भी एक क्षण में प्रकाशित कर देता है ।