वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३७
सिद्धान्ते १प्रत्यक्षत्वप्रयोजकं किमिति चेत्, किं ज्ञानगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं पृच्छसि किं वा विषयगतस्य ? आद्ये प्रमाणचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्याभेद इति ब्रूमः । तथा हि त्रिविधं चैतन्यं २विषयचैतन्यं प्रमाणचैतन्यं प्रमातृचैतन्यं चेति । तत्र घटाद्यवच्छिन्नं चैतन्यं विषयचैतन्यम्, अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नं चैतन्यं प्रमाणचैतन्यम्, अन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं प्रमातृचैतन्यम् ॥
अर्थ— ( इन्द्रियजन्यत्व यदि प्रत्यक्षता में प्रयोजक नहीं है तो ) आप के सिद्धान्त में भी प्रत्यक्षत्व का क्या प्रयोजक है ? इस प्रकार तार्किक के द्वारा पूछे जाने पर सिद्धान्ती प्रश्न को स्पष्ट कराने के लिए तार्किकों से ही प्रश्न करता है—हम (सिद्धान्ती) तुमसे पूछते हैं कि तुम ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक पूछ रहे हो, या विषयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक पूछ रहे हो ? ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक यदि पूछो तो प्रमाणचैतन्य का विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभेद ( तादात्म्य, ऐक्य ) होना, ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है—ऐसा हम कहते हैं । ( परन्तु एक ही अद्वितीय चैतन्य का भेद कैसे संभव होता है ? उत्तर—वास्तव में चैतन्य के एक होने पर भी उसका उपाधि के कारण इस प्रकार भेद होता है ) तथाहि—चैतन्य त्रिविध है—एक विषय चैतन्य, दूसरा प्रमाण चैतन्य व तीसरा प्रमातृचैतन्य । इन तीन प्रकार के चैतन्यों में से घटादि विषयों से अवच्छिन्न ( मर्यादित ) हुआ चैतन्य–विषयचैतन्य, अन्तःकरण की वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य–प्रमाणचैतन्य, और अन्तःकरणावाच्छिन्न हुआ चैतन्य–प्रमातृचैतन्य है ।
**विवरण—**प्रत्यक्ष प्रमा का प्रयोजक ( कारण ) कोई तो अवश्य ही होगा । इन्द्रिय-
१. 'प्रत्यक्ष' शब्दस्य व्यवहारो प्रत्यक्षात्मके ज्ञाने, तद्विषये, तत्प्रमाणे चोपलभ्यते, प्रत्यक्षं ज्ञानम्, प्रत्यक्षो विषयः, प्रत्यक्षम्प्रमाणमिति । तेषु प्रमाणगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वम् । तस्य प्रसिद्धत्वात् प्रागुक्तत्वाच्च तन्नैव जिज्ञास्यम् । ज्ञानगतस्य विषयगतस्य च प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं नैकं, किन्तु भिन्नम् । अतः तयोः कतरत् तव जिज्ञास्यमिति विभज्य पृच्छति ? इति सिद्धान्तिन आशयः ।
नैयायिकास्तावत् इन्द्रियजन्यत्वं ज्ञानगतप्रत्यक्षत्वे प्रयोजकम्, प्रत्यक्षज्ञानविषयत्वञ्च विषयगतप्रत्यक्षत्वे प्रयोजकम् इत्याहुः ।
वेदान्तिनस्तु प्रत्यक्षज्ञानविषयत्वरहितं स्वतोऽपरोक्षरूपं कञ्चन साक्षिणं मन्यन्ते । अतस्तस्य प्रत्यक्षत्वं न तद्विषयत्वप्रयुक्तम्, किन्तु अन्यप्रयुक्तमिति प्रयोजकद्वयजिज्ञासा समुचितेतिभावः ।
२. प्रमातृचैतन्यं प्रमाणचैतन्यं विषयचैतन्यं चेति । पाठान्तरम् ।