वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ | वेदान्तपरिभाषा | [ मानसः इन्द्रियत्वखण्डनम्
अनापत्ति ( अप्राप्ति ) होगी । ( परन्तु अनुमित्यादि अप्रत्यक्ष ज्ञानों को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होना और ईश्वरज्ञान का साक्षात्त्व नष्ट होना, ये दोनों अनिष्ट हैं ) ।
विवरण— 'इन्द्रियजन्य ज्ञान को तो प्रत्यक्षत्व है परन्तु मन में इन्द्रियत्व नहीं है' ऐसा कहने से सुखदुःखादि का प्रत्यक्षत्व नहीं है यह सिद्ध होगा । क्योंकि मन तो इन्द्रिय नहीं है और सुख-दुःखादि का ज्ञान उसी से होता है तब अनिन्द्रियमनोजन्य सुख-दुःखादिकों के अनुभव की प्रत्यक्षता कैसे बन सकेगी । परन्तु सुखादिकों की तो प्रत्यक्ष-रूपेण उपलब्धि होती है अतः उनके प्रत्यक्षत्व की सिद्धि के लिये मन का इन्द्रियत्व अवश्य स्वीकार करना होगा । यह शंका 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्' ( इन्द्रिय से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष कहते हैं ) प्रत्यक्ष ज्ञान का इस प्रकार लक्षण करने वाले तार्किकों की है । उसका अनुवाद करके सिद्धान्ती—
समाधान— ज्ञान की प्रत्यक्षता में इन्द्रियजन्यत्व प्रयोजक ( निमित्त ) नहीं है । अतः 'सुखादिकों के साक्षात् अनुभव में इन्द्रियजन्यत्व न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है, यह कहना ठीक नहीं है ।
प्रश्न— प्रत्यक्षत्व में इन्द्रियजन्यत्व को प्रयोजक मानने में क्या बाधक है ?
उत्तर— तार्किक लोग मन को अन्तरिन्द्रिय कहते हैं और ज्ञान की प्रत्यक्षता में 'इन्द्रियजन्यत्व' को प्रयोजक मानते हैं । परन्तु सुखादिज्ञानों की प्रत्यक्षता सिद्ध करने के लिए उपर्युक्त प्रयोजक के अनुसार मन में इन्द्रित्व है तो मनोजन्य अनुमिति, उपमिति इत्यादि अन्य ज्ञान भी प्रत्यक्ष हैं ऐसा कहने का प्रसंग आवेगा । यही प्रत्यक्षत्व में इन्द्रियजन्यत्व को प्रयोजक मानने में बाधक है ।
इन्द्रियत्वरूप से इन्द्रियजन्यत्व, प्रत्यक्षता में प्रयोजक है और अनुमिति, उपमिति आदि ज्ञानों में मनस्त्वेन रूप से इन्द्रियजन्यत्व है, इस कारण ऐसा अतिप्रसंग ( अति-व्याप्ति ) नहीं हो पाता । ऐसा यदि आप कहें तो 'ईश्वर का ज्ञान' इन्द्रियजन्य न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है, यह कहने का प्रसंग आवेगा, अर्थात् आप का बताया हुआ 'प्रत्यक्षत्वप्रयोजक' ईश्वरज्ञान में अव्याप्त रहेगा । अथवा 'इन्द्रियजन्यत्व' का अर्थ 'इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्व' विवक्षित करेंगे तो अनुमिति आदि प्रमाएँ इन्द्रियसन्निकर्षजन्य न होने से प्रत्यक्षप्रयोजक का लक्षण अतिव्याप्त नहीं हो सकेगा । 'ईश्वर का ज्ञान अजन्य और प्रत्यक्षरूप है' यह कथन सर्वसम्मत नहीं है । अद्वैती उसे मायाजन्य मानते हैं । तथापि 'वह इन्द्रियजन्य नहीं' यह सर्वसम्मत है । तस्मात् मन के इन्द्रियत्व में कोई प्रमाण नहीं है, प्रत्युत बाधक प्रमाण हैं । इसलिए 'मन' इन्द्रिय नहीं है, इसी कारण 'मैं इच्छा करता हूँ'—इत्यादि अनुभव में अन्तःकरण का प्रत्यक्ष संभव होता है ।
इस प्रकार सिद्धान्ती के द्वारा तार्किकों के अभिमत प्रत्यक्षत्वप्रयोजक का निरसन किये जाने पर सिद्धान्तपक्ष में भी दूसरा प्रत्यक्षत्वप्रयोजक नहीं बन सकता, यह समझने-वाले तार्किक का आक्षेप—