वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३५
( विषयों से ) भी पर है । अतः 'मन विषयों से पर है' इतना कह देने मात्र से वह इन्द्रिय नहीं है, यह सिद्ध नहीं होता ।
समाधान—उपर्युक्त 'इत्यादिश्रुत्या' इस वाक्य के आदि शब्द से 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च' ( मुं० २।१।३ ) इस पुरुष से प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश इत्यादि उत्पन्न होते हैं' इस श्रुति का ग्रहण किया गया है। इसलिए आदि शब्द से गृहीत इस श्रुति से एक वाक्यता को प्राप्त होकर 'इन्द्रियों से पर रहनेवाले विषयों से मन पर है' यह श्रुति मन के अनिन्द्रियत्व का बोधन कराती है । तस्मात् मन ( अन्तःकरण ) को इन्द्रियत्व नहीं है । अर्थात् मन इन्द्रिय नहीं है ।
मन की इन्द्रियता मुख्य न होकर गौणरूप से मानी जा सकती है, इससे उसकी प्रत्यक्ष प्रतीति का भी बाध नहीं होगा । 'वेदानध्यापयामास' इस वाक्य में महाभारत भी सकल वेदार्थ प्रतिपादक होने से गौणरूप से वेद है, यह स्वीकार करना चाहिए । इस पर सिद्धान्ती, तार्किकों की एक शंका का अनुवाद करके इसका समाधान करता है ।
न चैवं मनसोऽनिन्द्रियत्वे सुखादिप्रत्यक्षस्य साक्षात्त्वं न ^१स्यादिन्द्रियाजन्यत्वादिति वाच्यम् । ^२न हीन्द्रियजन्यत्वेन ज्ञानस्य साक्षात्त्वम्, अनुमित्यादेरपि मनोजन्यतया साक्षात्त्वापत्तेः, ईश्वरज्ञानस्यानिनिन्द्रियजन्यस्य^३ साक्षात्त्वानापत्तेश्च ॥
अर्थ—मन की इन्द्रियता को स्वीकार न करने पर सुखादिकों के प्रत्यक्ष अनुभव की प्रत्यक्षता नहीं बन सकेगी, क्योंकि वह इन्द्रिय से जन्य नहीं है । परन्तु यह कहना उचित नहीं है, कारण ज्ञान को इन्द्रिय-जन्यत्व होने से ( ज्ञान इन्द्रियों से उत्पन्न होता है इसलिये ) उसका साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षत्व ) है, यह नहीं कहा जा सकता । इन्द्रियजन्य होने से ज्ञान का साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षत्व ) यदि स्वीकार किया जाय तो अनुमितिज्ञान, उपमितिज्ञान इत्यादि अन्य ज्ञान भी मन से ही उत्पन्न होने से उन्हें भी साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षज्ञान ) कहना होगा । और ईश्वर का ज्ञान इन्द्रियजन्य न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है यह कहना होगा । ईश्वर का ज्ञान इन्द्रियों से पैदा न होने से उसे साक्षात्त्व की
१. "इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" इति न्यायसूत्रात् प्रत्यक्षत्वे इन्द्रियजन्यत्वं प्रयोजकम् । अतो मनस अनिन्द्रियत्वाभ्युपगमे तज्जन्यसुखादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं न भवेत्, यतो हि कारणाभाव एव कार्याभावे हेतुरितिनियमादिति शङ्काकर्तुर्नैयायिकस्याशयः।
२. अनुमित्यात्मकस्य ज्ञानस्य मनोरूपेन्द्रियजन्यत्वेऽपि अप्रत्यक्षत्वमिति प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वम्प्रयोजकं नास्ति, इति सिद्धान्तिन आशयः।
३. 'तया'-इति पाठान्तरम् ।