वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ वेदान्तपरिभाषा [ मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम्
उपस्थित करें—'( प्रतिज्ञा ) मन इन्द्रिय है, ( हेतु ) इन्द्रियों की संख्या का पूरक होने से' तो इसमें हेतु प्रयोजक ( साध्य साधन में असमर्थ ) है । क्योंकि अनिन्द्रिय मन से भी इन्द्रियों की संख्यापूर्ति की जा सकती है ।
शिवाय उपर्युक्त अनुमान में 'जो इन्द्रियगत संख्यापूरक हो इन्द्रिय है' यह विशेष व्याप्ति, उसका ( अनुमान का ) मूल है, अथवा 'जो जिसका संख्यापूरक हो वह उसकी जाति का होता है' यह सामान्य व्याप्ति, उसका ( अनुमान का ) मूल है, ऐसा विकल्प करते हैं, किन्तु यहाँ दोनों पक्ष सम्भव नहीं हैं, इस आशय से सिद्धान्ती का कथन है कि ' इन्द्रियगत संख्या की पूर्ति इन्द्रिय से ही की जाय' ऐसा नियम न होने से विशेष व्याप्ति का यहाँ सम्भव नहीं है क्योंकि ऐसा दृष्टान्त कहीं दिखाई नहीं देता ।
इसी तरह पूर्वोक्त सामान्य व्याप्ति भी उपर्युक्त अनुमान में मूल नहीं है—क्योंकि 'यजमान जिसमें पांचवां है ऐसे ऋत्विज इडा भक्षण करते हैं, इस उदाहरण में 'ऋत्विजों की पञ्च-संख्या का पूरक यजमान है, परन्तु वह ऋत्विक् नहीं है । इस कारण 'जो जिनकी संख्या का पूरक होता है वह उनकी जाति का होता है' यह सामान्य व्याप्ति भी यहाँ घटित नहीं होती । इस प्रकार श्रौत उदाहरणों में व्याप्ति का भंग दिखलाकर सिद्धान्ती स्मार्त्त-उदाहरण में भी उसका भंग दिखाता है—'महाभारत जिसमें पांचवां है ऐसे वेद को अध्यापक ने पढ़ाया' उदाहरण में वेदगत पंचत्व ( पाँच ) संख्या जिस महाभारत के योग से पूर्ण होती है वह इतिहास नाम से प्रसिद्ध महाभारत पौरुषेय ( व्यास रचित ) होने से अपौरुषेय वेद की कोटि में नहीं है । जैसे 'मैं नक्षत्रों में चन्द्र हूँ' यह वचन चन्द्र के नक्षत्र होने में प्रमाण नहीं, वैसे ही 'इन्द्रियों में मन मैं हूँ' यह वचन भी मन के इस इन्द्रिय होने में प्रमाण नहीं है ।
शंका—मन के इन्द्रिय होने में बाधक प्रमाण तो कोई है नहीं ।
उत्तर—'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः' यह श्रुति 'इन्द्रियों से पर विषय ( सूक्ष्म ), व्यापक और नित्य विषयों से मन पर है' बताकर मन के अनिन्द्रियत्व का बोधन कराती है । अतः मन के इन्द्रिय होने में बाधक प्रमाण नहीं है यह कथन अनुचित है । उसके इन्द्रियत्व की बाधक प्रत्यक्ष श्रुति ही प्रमाण है ।
शंका—'इन्द्रियेभ्यः पराः०' इस श्रुति का अर्थ इस प्रकार भी संभव हो सकता है— मन इन्द्रिय को छोड़कर अन्य सब इन्द्रियों से अर्थ पर है, और मन-इन्द्रिय उन अर्थों से
णेनैव तस्यापि तत् प्राप्तमिति 'यजमानपञ्चमा' इति नोक्तं स्यात्, किन्तूच्यते । तस्मात् ज्ञायते—यजमानो न ऋत्विक् इति । तेन अनृत्विजापि यजमानेन तथा ऋत्विग्गतसंख्यापूरणं, तथैवानिन्द्रियेणाऽपि मनसा इन्द्रियगतसंख्यापूरणम् । एवञ्चात्र नियमस्य व्यभिचरितत्वात् न तेन मनसः इन्द्रियत्वसिद्धिः ।