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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३३

इस कथन में पहिले तो कोई प्रमाण नहीं है।$^१$ 'जीव, मृत्यु के समय मन जिनमें छठवाँ है ऐसी इन्द्रियों का आकर्षण करता है'—गीता के पन्द्रहवें अध्याय का भगवान् का यह वचन ही मन के (अन्तःकरण के) इन्द्रियत्व में प्रमाण है—यह कहो तो ठीक नहीं है। क्योंकि इन्द्रिय न होकर भी मन से इन्द्रियों की छठी संख्या की पूर्ति करने में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि इन्द्रियों की संख्या-पूर्ति इन्द्रिय से ही करने का कोई नियम नहीं है। इसी कारण 'यजमान जिनमें पाँचवाँ है ऐसे ऋत्विज, इडा का भक्षण करते हैं'$^१$ इस श्रौत (वैदिक) वचन में ऋत्विजों की पांचवीं संख्या ऋत्विजों से भिन्न यजमान के द्वारा भी पूर्ण की हुई दिखाई देती है। इसी तरह 'महाभारत जिसमें पाँचवाँ है ऐसे वेदों को पढ़ाया' इस स्मृतिवाक्य में भी वेदों की पांचवीं संख्या वेद से भिन्न महाभारत के द्वारा पूर्ण की हुई दिखाई देती है। इसी तरह 'इन्द्रियों से वासना- त्मक अर्थ परे है, उस वासनात्मक अर्थ से मन परे' है। इत्यादि श्रुति से भी मन का इन्द्रिय न होना ज्ञात होता है।

विवरण--'अन्तःकरण, इन्द्रिय होने से वह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं है' वादी के इस कथन का उत्तर हम इस प्रकार देते हैं—अन्तःकरण (मन) के अन्तरिन्द्रिय होने में कोई प्रमाण नहीं है। जब कि वह इन्द्रिय ही नहीं तब उसका अतीन्द्रियत्व कैसे सिद्ध हो सकता है। अतः अन्तःकरण प्रत्यक्ष-विषय नहीं होता, यह कथन अनुचित है। इसी बात को 'न तावद्' इत्यादि ग्रन्थ से सूचित किया है।

वादी की पुनः शंका--'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि०' मन जिनमें छठा है ऐसी इन्द्रियों का जीव आकर्षण करता है—इत्यादि भगवद्-वाक्य मन के इन्द्रिय होने में प्रमाण है।

समाधान--इन्द्रियों की षष्ठ—संख्यापूर्ति अनिन्द्रिय 'मन' से भी की जा सकती है। अतः वादी के द्वारा प्रदर्शित भगवद् वाक्य से कोई विरोध नहीं है। भगवद्-वाक्य का तात्पर्य मन को इन्द्रियत्व बताने में ही नहीं है। मन को इन्द्रिय बताने वाली कोई श्रुति भी नहीं है। 'मेरा मन' इस अनुभव से भी मन का अनिन्द्रियत्व सिद्ध होता है।

इस पर भी मन का इन्द्रियत्व सिद्ध करने के लिए यदि आप अनुमान$^२$—प्रमाण को


१. सिद्धेन हेतुना साध्यं साधनीयं भवति। अत्र तु सिद्धेन इन्द्रियत्व-हेतुना अन्तः- करणस्य अतीन्द्रियत्वं साधनीयं, न असिद्धेन। अत्र च हेतुरेव असिद्धः।

२. यद् यद्गतसंख्यापूरकं तत् तज्जातीयमितिनियमेन मनस इन्द्रियगतसंख्यापूरकत्व- मिन्द्रियत्वं विना अनुपपन्नमिति इन्द्रियत्वं कल्पयति। अतो मनस इन्द्रियत्वे अर्थापत्तिः प्रमाणम्। तथाऽनुमानमपि—'मनः, इन्द्रियम्, इन्द्रियगतसंख्यापूरकत्वात्, यन्नैवं तन्नैवमिति।

किन्तु उक्तनियमस्य अनैकान्तिकत्वम्, अनुमानस्य च अप्रयोजकत्वं वर्तते। नियमव्य- भिचारो यथा—'यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति'—इति श्रुत्या यजमानसहितानां चतुर्णां- मृत्विजामिडाभक्षणं विधीयते। तत्र यजमानो यदि ऋत्विक् स्यात्, ऋत्विजामिडाभक्ष-