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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३२ वेदान्तपरिभाषा [ मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम्

अर्थ-- अन्तःकरण के इन्द्रियत्व होने से (अर्थात् अन्तःकरण इन्द्रिय होने से) वह अतीन्द्रिय है (इन्द्रिय का विषय नहीं होता) कोई भी इन्द्रिय, प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देती तब उसे 'अहम्' इस प्रकार इन्द्रिय-विषयत्व कैसे? ('मैं' इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है)।

विवरण-- अग्नि और लोहे का गोला दोनों के प्रत्यक्ष होने से उनका परस्पर तादात्म्याध्यास होकर लोहा 'जलाता है' यह भ्रामक व्यवहार हो सकता है। परन्तु आत्मा और अन्तःकरण में से आत्मा, प्रत्यक्षविषय और अन्तःकरण, प्रत्यक्षाविषय (अतीन्द्रिय) है। तब प्रत्यक्षविषय आत्मा और अतीन्द्रिय अन्तःकरण का तादात्म्याध्यास कैसे हो सकेगा? और जब तादात्म्याध्यास का ही संभव नहीं तब 'मैं इच्छा करता हूँ' यह भ्रामक व्यवहार भी कैसे होगा?

'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य' यह 'अहं' शब्द का अर्थ होना संभव नहीं। क्योंकि अन्तःकरण 'इन्द्रिय' है, और इन्द्रिय, अतीन्द्रिय होती है। इसलिए वह अन्तःकरण, प्रत्यक्षप्रमा का विषय नहीं बन सकता। इस विषय में अनुमान^१ इस प्रकार किया जाता है—

(प्रतिज्ञा)—अन्तःकरण अतीन्द्रिय है। (हेतु)—क्योंकि वह इन्द्रिय है। (दृष्टान्त)—चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों के समान। इस आशय से वादी के शंका करने पर समाधान—

उच्यते। न तावदन्तःकरणमिन्द्रियमित्‍यत्र मानमस्ति। 'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि' इति भगवद्गीतावचनं प्रमाणमिति चेत् न। अनिन्द्रियेणाऽपि मनसा षट्त्वसङ्ख्यापूरणाविरोधात्। न हीन्द्रियगतसङ्ख्यापूरणमिन्द्रियेणैवेति नियमः। 'यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति' इत्यत्र ऋत्विग्गतपञ्चत्वसङ्ख्याया अनृत्विजाऽपि यजमानेन पूरणदर्शनात्। वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्' इत्यत्र^२ वेदगतपञ्चत्वसङ्ख्याया अवेदेनापि महाभारतेन पूरणदर्शनात्। 'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः' (का० १-३-१०) इत्यादिश्रुत्या मनसोऽनिन्द्रियत्वावगमाच्च।

अर्थ— (उपर्युक्त शंका का समाधान कहते हैं—'अन्तःकरण इन्द्रिय है' तुम्हारे इस


१. अनुमान प्रयोग:—
'अन्तःकरणम् अतीन्द्रियम् इन्द्रियत्वात् चक्षुरादिवत्'
२. त्यादौ–इति पाठान्तरम्।