वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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महामीमांसक
विद्यासागर श्री पट्टाभिरामशास्त्री
( संचालक, वेदमीमांसानुसन्धान केन्द्र )
डॉ० गजाननशास्त्री मुसलगांवकर मीमांसा-वेदान्ताचार्य अध्ययन व अध्यापन कार्यों में व्यापृत रहते हुए लेखन कार्य में भी व्यस्त रहते हैं। कुशल अध्यापक का यह कार्य अनुरूप ही नहीं बल्कि आवश्यक भी है। आजकल संस्कृत अध्ययन में लोगों की रुचि कम होती जा रही है, किन्तु कुशल अध्यापक का यह कर्त्तव्य है कि लोगों में इसके प्रति रुचि उत्पन्न करना एवं अध्ययन में प्रवृत्त कराना है। इसका उत्कृष्ट साधन संस्कृत-ग्रन्थों को राष्ट्र भाषा में अनूदित कर प्रकाश में लाना भी है। राष्ट्रभाषा के माध्यम से भी संस्कृत सीख सकते हैं और दार्शनिक तत्त्वों से अभिज्ञ हो सकते हैं। इस प्रकार के कार्यों को संस्कृत का प्रचार ही समझना चाहिए। इस दृष्टि को रखते हुए डा० शास्त्री ने अनेक दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद प्रस्तुत किया है, उनमें 'वेदान्त-परिभाषा' भी है। अद्वैत वेदान्त में प्रवेश करने वालों का यह प्रकरण ग्रन्थ वेदान्त-परिभाषा उपादेयतम है। गम्भीर विषयों को संस्कृत से समझना अतिकठिन है। श्री शास्त्री ने उन गम्भीर विषयों को सरल भाषा से विवेचन करते हुए समझाया है। ग्रन्थ के विषयों को विभिन्न प्रकरणों में वर्गीकरण करते हुए प्रश्न, शंका, समाधान के रूप से अपने विवरण को प्रस्तुत किया है। इस ग्रंथ के सम्पादन में शास्त्रीजी का अथक परिश्रम अभिव्यक्त होता है।
मेरी आन्तरिक इच्छा है कि शास्त्री जी के इस अनुवाद से लाभ उठाकर शास्त्रीजी के परिश्रम को सफल बनावें।
—पट्टाभिरामशास्त्री
विद्वन्मूर्द्धन्य वे० सु० रामचन्द्रशास्त्री
( प्रिंसिपल, संस्कृत कालेज, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय )
अद्वैतवेदान्तशास्त्रं प्रविविक्षूणां सौलभ्याय धर्मराजाध्वरीन्द्रनाम्ना पण्डितपुण्डरीकेण वेदान्तपरिभाषा व्यरचि . यत्रोपनिषदां ब्रह्मसूत्रभाष्यादीनाञ्चाध्ययनोपयोगिनो बहवो विषया न्यरूप्यन्त। पठनसम्प्रदायोस्या आसेतोराच हिमाद्रेस्सर्वत्र दरीदृश्यते। सन्ति चास्या व्याख्यास्संस्कृतभाषामय्यो विवृतास्संक्षिप्ताश्च मुद्रणपथं प्रापिताः।
छात्रमनोरञ्जिनी हिन्दीभाषामयी प्रकाशाख्या काचन व्याख्या वेदान्तपरिभाषाया मन्मित्रवरैः काशीहिन्दूविश्वविद्यालये मीमांसाप्राध्यापकैः श्रीगजाननशास्त्रि मुसलगांवकरमहोदयै रचिता तत्र तत्र मया पर्यशीलयत। या मूलानुसारिणी तत्तात्पर्यप्रकाशिनी छात्रवर्गस्योपकारिणी चेत्यभिप्रेमि।
—वे० सु० रामचन्द्रशास्त्री