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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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प्राक्कथन

भारतीय दर्शनों का प्रारम्भकाल वेदों के प्रादुर्भावकाल से शुरू होता है । विद्वान् ऐतिहासिक, ज्योतिष आदि प्रमाणों द्वारा ऋग्वेद का प्रादुर्भावकाल ईसा की उत्पत्ति के पूर्व पाँच हजार वर्षों से दस हजार वर्षों तक मानते हैं । दर्शनों का काल भी उतना ही प्राचीन मानना उचित है क्योंकि ऋग्वेद में ही अनेक जगह ( इस समय परस्पर विभिन्न ) अनेक दर्शनों के स्रोत मूल अवस्था में उपलब्ध होते हैं। वे ही यजुर्वेद, अथर्ववेद एवं अनेक ब्राह्मणग्रन्थ और उपनिषदों द्वारा अब समुद्र के समान गम्भीर और समृद्ध हो गए हैं। उनका प्रवाह धर्म, देश, काल, जाति आदि भेदों से अवरुद्ध न होता हुआ, मनुष्य मात्र को शान्ति, आनन्द, ज्ञान, करुणा और सर्वात्मभावदर्शन आदि के अनेक अमूल्य उपदेश देता हुआ सर्वदा अखण्ड रूप से बहता ही रहेगा । अतः वे उपदिष्ट तत्त्व मनुष्य मात्र के लिये सर्वदा आचरणीय और प्रचारणीय हैं।

ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध मन्त्र कुछ दर्शनों के मूल स्रोतों का सूचक है, वह मन्त्र इस प्रकार है—

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
१, १६४, २०

संसार रूप वृक्ष पर मित्रभूत दो पक्षी बैठे हैं जीव तथा ईश्वर, एक सांसारिक पदार्थों का उपभोग करता है और दूसरा विषयों का उपभोग न करता हुआ केवल संसार का नियन्त्रण—शासन—करता है। यही मन्त्र शङ्कराचार्यादि द्वारा उपबृंहित अद्वैतदर्शन को छोड़कर सभी दर्शनों का मूलस्रोत है। इसके और उपनिषद् एवं श्रीभगवद्व्यासविरचित ब्रह्मसूत्रादि के आश्रय से अनेक वादियों ने अपने-अपने द्वैतादि दर्शन खड़े किये हैं।

ऋग्वेद में वागाम्भृणीसूक्त दशम मण्डल में आता है, उसमें सर्वत्र एक तत्त्व का अनुभव करने के बाद की स्थिति का वर्णन मिलता है। उसका प्रारम्भ इस प्रकार है—

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । १०। १२५ । १

इसी प्रकार सर्वत्र एक आत्मतत्त्व का अनुभव करनेवाले ऋषि गौतमवामदेव का एक सूक्त है जिसका प्रारम्भ इस प्रकार है—

अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवाँ ऋषिरस्मि विप्रः । ४।२६।१