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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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यह ऋग्वेद सूक्त श्रीभगवान् व्यासविरचित ब्रह्मसूत्र द्वारा पल्लवित, श्रीगोड़-पादाचार्यरचित माण्डूक्यकारिका द्वारा पुष्पित एवं श्रीशंकराचार्य रचित भाष्य द्वारा सुफलित दर्शनमूर्धन्य अद्वैतदर्शन का मूलस्रोत है, ऐसा कहा जाय तो अनुचित नहीं होगा । एवं च हमारे कहने का भाव यह है कि अनेक दर्शन रूप प्रासादों की भित्तियाँ एवं ईंट-प्रस्तरादि के समान तत्त्व समूह सर्वप्रथम प्रकट हुए ऋग्वेदादि ग्रन्थों में बीज रूप से मिलते हैं, अतएव ऋग्वेदादिकों के समान हमारे वर्तमान दर्शन भी मूलतः सूत्र रूप से अति प्राचीन हैं, अस्तु ।

शाङ्करदर्शन को दर्शनों में मूर्धन्यभूत कहने का हमारा तात्पर्य यह है कि सर्वतः सब प्रकार से भेद एवं तन्मूलक भयादिकों को मिटानेवाला अद्वैतदर्शन को छोड़कर दूसरा दर्शन नहीं है। ‘‘द्वितीयाद्वै भयं भवति’’।

इस शांकरदर्शन के तत्त्वों का विशद् विवरण एवं उसके ऊपर किये हुए अनेक आक्षेपों का निराकरण करने वाले अनेक ग्रन्थ, जैसे भामती, विवरण, संक्षेपशारीरक, सिद्धान्तलेश, चित्सुखी, अद्वैतसिद्धि, खण्डनखण्डखाद्य आदि-आदि सैकड़ों ग्रन्थ विशिष्ट विद्वानों ने बनाये हैं। थोड़े में एवं सरल रीति से बोध हो इस हेतु साक्षात् श्रीशंकराचार्यजी के बनाये हुए छोटे-छोटे उपदेशसाहस्री, तत्त्व-बोध, आत्मबोध, वाक्यवृत्ति आदि ग्रन्थ एवं श्रीविद्यारण्यविरचित पञ्चदशी, वैयासिकन्यायमाला आदि ग्रंथ भी प्रसिद्ध हैं एवं जिज्ञासुओं का उपकार करने वाले हैं। इन ग्रंथों से अधिकारी एवं कुछ व्युत्पन्न जिज्ञासु लाभ उठा सकते हैं, श्रीशङ्कराचार्यजी के तत्त्वबोध आदि छोटे ग्रंथों से तो अव्युत्पन्न शंकरहित परन्तु जिज्ञासु अवश्य ही लाभ उठा सकता है इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं, बल्कि शास्त्रार्थ के अंशों को छोड़कर केवल प्रमेय पदार्थों के वर्णनपरक ग्रंथ खास शंकरहित अधिकारी, अव्युत्पन्न एवं जिज्ञासुओं के लिये ही परम दया से श्रीशङ्कराचार्यजी ने बनाये हैं।

परन्तु जो अनेक शास्त्रार्थों द्वारा सिद्ध प्रमेय तत्त्वों को युक्ति एवं उपपत्ति से अनेक शंकाओं के निरासपूर्वक जानना चाहता है उसके लिये सर्वत्र प्रचलित अतः प्रसिद्ध तीन ग्रंथ हैं—श्रीविद्यारण्यरचित पंचदशी, श्रीसदानन्दकृत वेदान्त-सार एवं श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्ररचित वेदान्तपरिभाषा । उनमें पञ्चदशी श्लोकबद्ध तथा कुछ शास्त्रार्थयुक्त होने से प्राथमिक जिज्ञासुओं के लिये कुछ कठिन मालूम होती है, वेदान्तसार एवं वेदान्तपरिभाषा ये दो ग्रंथ शंकालु एवं कुछ व्युत्पन्न जिज्ञासुओं के लिये अधिक उपयुक्त हैं। वेदान्तसार और वेदान्तपरिभाषा की तुलना हम मीमांसा के ग्रंथ मीमांसापरिभाषा या अर्थसंग्रह या आपदेवी या व्याकरण की लघुकौमुदी एवं सिद्धान्तकौमुदी के साथ कर सकते हैं। मीमांसा-परिभाषा या अर्थसंग्रह द्वारा कुछ मीमांसा के पदार्थों का बोध होकर आगे विशिष्ट