वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२६ | वेदान्तपरिभाषा | [ स्वप्नपदार्थविचारः |
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समाधान--व्यवहार में 'यह गज' ऐसी प्रतीति (अनुभव) हुई रहने से प्रातिभासिक गज का भी 'यह गज' इस आकार का ही प्रत्यय होता है। परन्तु 'स्वप्नगजादिक, साक्षात् माया के परिणाम हैं' अर्थात् मूलाऽविद्या, उनकी साक्षात् उपादान है। ऐसा कुछ लोग कहते हैं। और 'वे स्वप्न गजादिक, अन्त करण के द्वारा माया के परिणाम हैं' ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।
विवरण--शंका करने वाले का आशय यह था कि शुक्ति में भासमान चाँदी की, दृष्टा के सामने स्थित शुक्ति, अधिष्ठान रूप में है। उसी तरह स्वप्नगत रथादिकों का अधिष्ठान आप को बताना चाहिये। उनका अधिष्ठान आप 'चैतन्य' को बताते हैं या किसी देशविशेष को। यदि चैतन्य को अधिष्ठान के रूप में बतावें तो वह चैतन्य कौन सा ? शुद्धचैतन्य, या अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ? इनमें से किसी भी पक्ष का संभव नहीं। क्योंकि स्वप्न के प्रातिभासिक रथादिकों के अधिष्ठान के रूप में किसी भी चैतन्य की प्रतीति नहीं होती। यदि दूसरे पक्ष का स्वीकार करें तो वह देशविशेष कौन सा ? जाग्रदवस्था का बाह्य देशविशेष, या स्वप्नगत देशविशेष ? 'बाह्यजाग्रदवस्था के देशविशेष का संभव नहीं होता, क्योंकि स्वप्न में जाग्रदवस्था का देश बहुत दूर होता है अर्थात् समीप नहीं होता। इस कारण यहाँ 'यह रथ' इस तरह वह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। स्वप्न में दूरस्थित (इन्द्रियसन्निकृष्ट न रहनेवाला) देश-विशेष स्वप्नगत प्रातिभासिक रथ का अधिष्ठान नहीं हो सकता।
इसी तरह स्वप्नगत देशविशेष भी प्रातिभासिक रथादिकों का अधिष्ठान नहीं बन सकता। क्योंकि स्वाप्निक प्रतिभासिक रथादिकों के अधिष्ठान रूप से प्रतीत होनेवाले देश को सन्निकृष्टत्व रहता है (समीप होता है)। इस कारण उस देशविशेष का भी रथादिकों की तरह प्रातिभासिकत्व अवश्य स्वीकार करना होगा। क्योंकि स्वप्न में प्रतीत होनेवाली समस्त वस्तुएँ आपके सिद्धान्त के अनुसार प्रातिभासिक ही हुआ करती हैं। अर्थात् उस प्रातिभासिक देशविशेष को अधिष्ठान की अपेक्षा होती है। अतः स्वप्नगत देशविशेष स्वप्नगत प्रातिभासिक रजतादिकों का अधिष्ठान नहीं हो सकता। इस अभिप्राय से वादी कहता है--स्वप्न में 'रथादिकों का अधिष्ठान' इस आकार से प्रतीत होने वाला देशविशेष उस समय सन्निकृष्ट (समीपवर्ती) नहीं होता। इस कारण स्वप्न के रथादिकों का अधिष्ठान, इत्याकारक अनिर्वचनीय (सदसद्विलक्षण) प्रातिभासिक देश भी मानना होगा। क्योंकि अधिष्ठान के भ्रम का सम्भव नहीं होता। आरोपित रज्जुसर्प, शुक्तिरजत के भ्रम का तो संभव होता है। परन्तु उनके अधिष्ठानभूत रज्जु, शुक्ति आदि का भ्रम नहीं हो सकता। स्वप्न के समस्त पदार्थों का प्रातिभासिक होना तो स्पष्ट है। इसलिये स्वप्न के रथादिकों के अधिष्ठान के रूप में भासमान जो देशविशेष है उसे भी प्रातिभासिकत्व है। इस कारण रथभ्रम से पूर्व उसका विद्यमान रहना तो शक्य नहीं। परन्तु अधिष्ठान यदि पूर्वक्षण में विद्यमान रहे तभी उत्तरक्षण में उसके