वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वाप्नपदार्थविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १२७
विषय में प्रतिभास का संभव हो सकता है। इस कारण रथभ्रम से पूर्व अविद्यमान प्रातिभासिक देशविशेष, रथादिकों का अधिष्ठान नहीं बन सकता। और इसी कारण स्वप्नगत रथादिक भी प्रातिभासिक नहीं हैं। किन्तु वे स्मरण के विषय हैं—यह मानना होगा। अथवा उन्हें यदि प्रातिभासिक ही मानना हो तो, पूर्वक्षण में विद्यमान रहने-वाला उनका अधिष्ठान बताना होगा। बिना उसके स्वप्नरथादि का प्रातिभासिकत्व ( भ्रमत्व ) सिद्ध नहीं होगा।
अब आक्षेपक के विकल्पों में से पहला 'चैतन्य' पक्ष स्वीकार कर उसका प्रति-समाधान कहते है—शुद्ध चैतन्य, स्वप्नरथ आदि का अधिष्ठान है। "देखनेवाले के सामने स्थित शुक्ति, रज्जु आदि पदार्थों की तरह शुद्धचैतन्य, वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्य का ( प्रमाणचैतन्य का ) विषय नहीं होता और शुक्ति, रज्जु आदि पुरोवर्ती अन्तःकरणा-वच्छिन्न चैतन्य के विषय होनेवाले पदार्थों में ही रजत, सर्प आदि पदार्थों का प्रतिभास ( भ्रम ) हुआ करता है, यह प्रसिद्ध है। तब वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का विषय न होनेवाले शुद्ध चैतन्य में स्वप्नरथादि प्रातिभासिक पदार्थों का अधिष्ठानत्व कैसे बन सकता है ? यह आशंका कोई न करे इसीलिये ग्रंथकार ने रथादि प्रातिभासिक पदार्थों का अधिष्ठान-भूत चैतन्य में 'स्वयं प्रकाशस्य' विशेषण दिया है। उससे स्वयंप्रकाश चैतन्य में रथादिकों का अधिष्ठानत्व है। स्वप्रकाश और परप्रकाश दोनों के लिये साधारण ज्ञायमानत्व ही लाघव से अधिष्ठानत्व का प्रयोजक है। स्वयंप्रकाश चैतन्य में उभयसाधारण ज्ञायमा-नत्व होने से उसमें स्वाप्न रथादि पदार्थों का अधिष्ठानत्व बनता है। अर्थात् उसमें अधिष्ठान बनने की योग्यता है।
शंका—"स्वयंप्रकाश चैतन्य का उस समय चिद्रूप से भान होना, रथादि जड, दुःख और असत् पदार्थों के अधिष्ठानत्व का निर्वाहक नहीं बन सकता। क्योंकि सत्, चित् और आनन्द रूप चैतन्य, असत् अचेतन, और दुःखरूप रथादि पदार्थों का अधिष्ठान बनकर उनके अस्तित्व आदि का निर्वाह कैसे कर सकेगा ? क्योंकि चैतन्य और रथादि, ये दोनों परस्पर प्रतिकूल हैं। उसी तरह चैतन्य का आनन्द रूप से भान होना भी रथा-दिकों के अधिष्ठानत्व का निर्वाहक नहीं हो सकता। क्योंकि मूलाज्ञान की निवृत्ति हुए बिना चैतन्य का आनन्द रूप से भान होना सम्भव नहीं। अर्थात् आप जिस चैतन्य में स्वप्नगत प्रातिभासिक रथादिकों का अधिष्ठानत्व बताते हैं, उस चैतन्य का चिद्रूप से या आनन्दरूप से होने वाला भान, रथादिकों के अधिष्ठानत्व का कार्य नहीं कर सकता।"
उत्तर—स्वयंप्रकाश चैतन्य में उस रथादिकों का अधिष्ठानत्व होने से स्वप्न में प्रतीत होने वाले रथादि पदार्थ 'हैं' इस आकार से ही प्रतीत होते हैं। इस कारण सद्रूप से प्रकाशित होनेवाला चैतन्य ही उनका अधिष्ठान है। ( स्वयंप्रकाश चैतन्य का सत्ता-रूप से होने वाला भान, रथादिकों के अधिष्ठान रूप से होकर उनका निर्वाह कर सकता है ) उसी तरह 'यहाँ यह रथ है' इस प्रकार स्वप्न में रथादिकों के अधिष्ठान रूप में