भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186
१२८वेदान्तपरिभाषा[ स्वप्नपदार्थविचारः

प्रतीत होनेवाला देशविशेष भी प्रातिभासिक होने से वास्तव में रथादिकों का उसमें अधिष्ठानत्व नहीं है। क्योंकि वह देशविशेष भी चैतन्य पर अध्यस्त है इसलिये वह प्रातिभासिक है। स्वप्न में रथादिकों का चक्षुरादि इन्द्रियों से ग्राह्य होना प्रतीत होता है, परन्तु वह भी प्रातिभासिक ही है। क्योंकि स्वप्नकाल में चक्षुरादि समस्त बाह्ये-न्द्रियों का अन्तःकरण में लय हो जाता है। इसलिये प्रतीत होनेवाला रथादिकों का इन्द्रियग्राह्यत्व भी प्रातिभासिक ही है।

शंका—यद्यपि चैतन्य, स्वप्नगजादिकों का अधिष्ठान है तथापि उसे अन्तःकरणा-वच्छिन्नत्व है ही। क्योंकि बृहदारण्यक में चैतन्यात्मा 'बुद्धि से युक्त होकर स्वप्न होता है और इस लोक में संचार करता है' यह श्रुति है।

इस कारण 'यह गज' ऐसी प्रतीति न होकर 'मैं मनुष्य' इस प्रतीति की तरह 'मैं गज' ऐसी प्रतीति होने का प्रसंग आता है। ऐसा यदि कहो तो 'मैं गज' इत्यादि प्रतीति के प्रसंग का निरसन पहले की तरह ही करना चाहिये। जिस प्रकार शुक्ति-रजतादिक को इदमाकार अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों से युक्त हुई अविद्या-निरूपित-जन्यत्व होने के कारण 'मैं रजत' यह प्रतीति नहीं होती, वैसे ही 'मैं गज' ऐसी प्रतीति नहीं होगी। निष्कर्ष यह है कि शुक्ति में यह रजत है—ऐसा जो प्रतिभास होता है वह देह के बाहर होता है। 'मैं शुक्ति रजत' यह अनुभव नहीं होता। इस कारण 'यह शुक्ति-रजत' इस अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से शुक्ति रजतादिकों की उत्पत्ति होती है। पहले 'यह रजत' इत्याकारक ही अनुभव हुआ होने से भ्रमकाल में भी 'मैं शुक्ति रजत' 'मैं सर्प', ऐसा प्रत्यय नहीं होता। इसी न्याय से व्यावहारिक गज का 'यह गज' ऐसा प्रत्यय हुआ होने से प्रातिभासिक गज का भी 'यह गज' ऐसा ही प्रत्यय होता है। 'मैं गज' ऐसा प्रत्यय नहीं होता।

शंका—स्वप्नगजादि उसी काल में उत्पन्न होते हैं—यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि स्वप्नगजादिकों का योग्य उपादान नहीं बन पाता। चैतन्य कूटस्थ (अपरिणामी) होने से स्वप्नगजादिकों का उपादान नहीं बन सकता। मूलाविद्या भी उसका उपादान नहीं बन सकती, क्योंकि मूलाविद्या, उन-उन पदार्थों के अवयवों की अपेक्षा रखती है साक्षात् वह स्वयं ही किसी का भी उपादान नहीं बन सकती। किन्तु उत्पन्न होने वाले भिन्न-भिन्न पदार्थों के अवयवों की सहायता लेकर ही उन-उन उत्पन्न होनेवाले पदार्थों की उपादान बन सकती है। मूलाविद्या भी स्वप्नगजादिकों का उपादान नहीं बन सकती। क्योंकि बाह्यदेशावच्छिन्न चैतन्य के आश्रय से स्थित तूलाविद्या को ही उपादानत्व होता है। अब यह विचार करना चाहिये कि बाह्यदेशावच्छिन्न चैतन्याश्रित तूलाविद्या, स्वाप्निक पदार्थों का अधिष्ठान है, या अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्याश्रित तूला-विद्या, स्वाप्निक पदार्थों का अधिष्ठान है? इसमें प्रथम पक्ष का तो 'सम्भव नहीं होता, क्योंकि स्वप्न के बाह्यप्रदेश को भी प्रातिभासिकत्व है। दूसरे पक्ष का भी सम्भव नहीं।