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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 482 में से

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पृष्ठ 187

स्वाप्नपदार्थविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १२९

क्योंकि अन्तःकरण को गजादि स्वप्न पदार्थों उपादानभूत अविद्या का अधिष्ठानत्व है—इसमें कोई प्रमाण नहीं। यह शंका कर ग्रंथकार ने मूल में स्वप्नगजादि, साक्षात् माया के = मूलाविद्या के परिणाम हैं—ऐसा कुछ लोग मानते हैं' यह पक्ष बताया है। अब 'स्वप्नगजादि प्रातिभासिक पदार्थों का उपादान कारण यदि मूलाविद्या हो तो सुषुप्ति में भी उनका प्रतिभास होगा' ऐसा कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि स्वप्न मे गजादिकों का उपादान कारण मूलाविद्या है और रागद्वेषादिकों से युक्त अन्तःकरण, उनका निमित्त कारण है। कारण यह है कि शुक्तिरजतादि स्थल में रागादि निमित्त कारण हैं और रज्जुसर्पस्थल में भय आदि निमित्त होते हैं। वे रागादि-धर्म अन्तःकरण में रहते हैं। उसी प्रकार दोषयुक्त अन्तःकरण स्वप्नगजादिकों का निमित्त कारण है। परन्तु सुषुप्ति में उसका (अन्तःकरण का) अभाव (लय) हो जाता है, इस कारण से निद्रा में स्वप्नगजादिकों का प्रत्यय नहीं होता।

स्वप्नगजादिक साक्षात् माया के परिणाम हैं और अन्तःकरण उनका निमित्त कारण है—यह एक पक्ष बताया गया। परन्तु स्वाप्नगजादिकों के प्रति अन्तःकरण को निमित्त-कारणत्व की कल्पना करने की अपेक्षा उन्हें अन्तःकरण के द्वारा अविद्या-परिणामित्व की कल्पना करना अच्छा होगा—ऐसा माननेवाले विद्वानों का दूसरा पक्ष भी मूल बताया गया है।

अध्यस्त-पदार्थ, अधिष्ठान का साक्षात्कार होने पर निवृत्त हो जाता है—यह नियम है। आप बता चुके हैं कि स्वाप्न-पदार्थ का अधिष्ठान शुद्ध-चैतन्य है। परन्तु स्वप्नदशा के बाद जाग्रत अवस्था आने पर शुद्ध-चैतन्य का साक्षात्कार तो होता नहीं। और अधिष्ठान के साक्षात्कार हुए बिना तो अध्यस्त स्वाप्न-रथादिकों की निवृत्ति होना शक्य नहीं। उससे जाग्रदवस्था में स्वप्न के अध्यस्त-रथादिकों की अनुवृत्ति होना अपरिहार्य है। परन्तु अनुभव में तो यह आता नहीं। इसलिये 'स्वाप्न गजादि पदार्थ, चैतन्य पर आरोपित हैं' यह कहना अयुक्त होता है—इस आशय से वादी शंका करता है—

'ननु गजादेः शुद्धचैतन्याध्यस्तत्वे इदानीमधिष्ठानसाक्षात्कारा- भावेन जागरणेऽपि स्वप्नोपलब्ध-गजादयोऽनुवर्तेरन्।

अर्थ—'स्वप्नगजादि पदार्थ, शुद्ध-चैतन्य पर अध्यस्त हैं' यह यदि कहें तो स्वप्नावस्था के बाद जागरित अवस्था में जब आते हैं तब उनके अधिष्ठानभूत शुद्ध चैतन्य का साक्षात्कार हुआ नहीं रहता (अद्यापि अधिष्ठान के साक्षात्कार का अभाव होने से) इसलिये जागरित-अवस्था में भी स्वप्न में उपलब्ध हुए गजादिक अनुवृत्त होंगे।


१. वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यं बिम्बभूतशुद्धचैतन्यमेव। एवञ्च शुद्धचैतन्याधिष्ठानत्वे एव पर्यवसानात् जाग्रत्प्रपञ्चात् स्वाप्न-प्रपञ्चस्य न विशेषसिद्धिरिति शङ्काशयः। २. 'नीं तत्सा'-इति पाठान्तरम्।