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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 482 में से

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पृष्ठ 188

१३० | वेदान्तपरिभाषा | [ कार्यविनाशद्वैविध्यम्

विवरण--रज्जु पर भासित हुए अध्यस्त-सर्प की निवृत्ति, रज्जु (रज्जु-सर्प के अधिष्ठान) का साक्षात्कार होने पर ही होती है। यह रज्जु है इस प्रकार की प्रत्यक्ष प्रतीति जब तक नहीं हो तब तक अध्यस्त-सर्प निवृत्त नहीं होता। अर्थात् अध्यस्त-पदार्थ, अधिष्ठान-साक्षात्कार हुए बिना निवृत्त नहीं हो सकता। आपने 'स्वप्न के प्रातिभासिक रथगजादि पदार्थ शुद्ध-चैतन्य पर आरोपित हैं' कहा है। उस पर हम पूछते हैं—यदि वे शुद्ध-चैतन्य पर आरोपित हैं तो जागरित होने पर भी उनकी अनुवृत्ति होनी चाहिये। क्योंकि आरोपित की निवृत्ति अधिष्ठान के साक्षात्कार के बिना नहीं होती। यह नियम है, और वह आपको भी मान्य है। परन्तु जागरित होने पर भी शुद्ध-चैतन्य का साक्षात्कार न हो पाने से अध्यस्त स्वाप्न रथगजादिकों की निवृत्ति होना शक्य नहीं है। अर्थात् जगने पर भी उनका प्रत्यय होना चाहिये, परन्तु होता नहीं। अतः 'स्वाप्न गजादिक शुद्ध चैतन्य पर आरोपित (अध्यस्त) हैं' कहना ठीक प्रतीत नहीं होता।

इसका समाधान सिद्धान्ती कहता है—

'उच्यते। कार्यविनाशो^२ हि द्विविधः-कश्चिदुपादानेन सह, कश्चिद्विद्यमान एवोपादाने। आद्यो बाधः। द्वितीयस्तु निवृत्तिः। आद्यस्य कारणमधिष्ठान^३-तत्त्वसाक्षात्कारः, तेन विनोपादानभूताया अविद्याया अनिवृत्तेः। द्वितीये विरोधिवृत्युत्पत्तिर्दोषनिवृत्तिश्च^४। तदिह ब्रह्मसाक्षात्काराभावात् स्वप्नप्रपञ्चो^५ 'माबाधि^६। मुसलप्रहारेण घटा-


१. शुद्धचैतन्याधिष्ठानत्वे ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्तं बाधाभावेऽपि विनाशो विद्यत एवेति न जाग्रत्कालेऽपि स्वाप्नानुवृत्त्यापातः। कारणात्मना विनाशः कारणरूपेणापि अभावो बाधः। कारणात्मना अवस्थानं निवृत्तिरिति बाधनिवृत्त्योर्भेदः।
२. शोद्धि०'—इति पाठान्तरम्।
३. 'तसाक्षा०'—इति पाठान्तरम्।
४. 'त्तिर्वा'—इति पाठान्तरम्।
५. विभिन्नैषु ग्रन्थेषु 'मा बाधिष्ट' इति पाठ उपलभ्यते, तथापि 'माङ्' उपपदस्य 'बधेः' कर्मणि लुङि 'चिण्भावकर्मणोः' इत्यनेन 'माबाधि' इति 'स्वाप्नप्रपञ्चं मा बाधिष्ट' इति वा प्रयोगो भाव्यः। 'जागरणवृत्त्या' इति अध्याहारः कर्तव्यः। तथा च जागरणवृत्तिः स्वाप्नप्रपञ्चं मा बाधताम् परन्तु तं निवर्तयतीत्यभ्युपगमे कोऽपि विरोधो नास्ति। कर्मण एव कर्तृत्वविवक्षया यथा श्रुतपाठस्य उपपत्तिः कर्तुं शक्या, तथापि क्लिष्टकल्पनया अपेक्षितस्यार्थस्य अलाभाच्च 'मा बाधि' इत्येव पाठः साधीयान्।
६. 'धिष्ट'—इति पाठान्तरम्।