वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकार्यविनाशद्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३१
देरिव विरोधी¹प्रत्ययान्तरोदयेन स्वप्नजनकीभूत-निद्रादि-दोषनाशेन वा गजादि-निवृत्तौ को विरोधः ।
अर्थ—उपर्युक्त शंका का समाधान कहते हैं। कार्य का विनाश दो प्रकार का है। कुछ कार्यों का विनाश उपादान कारण के साथ होता है और कुछ का विनाश उपादान की विद्यमानता में ही होता है। उपादान के साथ होनेवाले कार्यविनाश को बाध कहते हैं। और उपादान की विद्यमानता में होनेवाले विनाश को निवृत्ति कहते हैं। अधिष्ठान का साक्षात्कार होना बाध का कारण है। क्योंकि अधिष्ठान का साक्षात्कार बिना हुए भ्रान्त कार्य की उपादानभूत अविद्या की निवृत्ति नहीं होती। परन्तु निवृत्तिरूप जो दूसरे प्रकार का कार्यनाश है, उसका कारण विरोधी वृत्ति की उत्पत्ति, अथवा दोष की निवृत्ति होता है। ऐसा होने से प्रकृत स्वप्नगजादिकों के उदाहरण में ब्रह्मसाक्षात्कार ( अधिष्ठान साक्षात्कार ) का अभाव होने से स्वप्नप्रपंच का बाध भले ही न हो, किन्तु मूसल के प्रहार से घटादिकों की निवृत्ति जैसी होती है वैसे ही पूर्व प्रत्यय के विरुद्ध दूसरा प्रत्यय उत्पन्न होने से, या स्वप्न को उत्पन्न करने वाले निद्रादि दोषों के नाश से स्वप्नगजादिकों की यदि निवृत्ति हो जाती है तो उसमें क्या विरोध है ? अर्थात् कोई विरोध नहीं।
विवरण—अधिष्ठान का साक्षात्कार किये बिना अध्यस्त ( आरोपित ) पदार्थ का बाध नहीं होता। यद्यपि यह सच है तथापि शुद्ध चैतन्यरूप अधिष्ठान का साक्षात्कार बिना किये भी अध्यस्त की निवृत्ति होना संभव है। उसमें जागरित में स्वाप्नरथगजादिकों की अनुवृत्ति का प्रसंग नहीं आता। इसी संक्षिप्त समाधान के आश्रय से मूल में 'उच्यते' शब्द से समाधान की प्रतिज्ञा की है। स्वप्न के प्रातिभासिक रथगजादिकों का बाधरूप नाश न होने पर भी निवृत्तिरूप नाश हो सकता है। यह समाधान सिद्धान्ती को कहना है इसलिए पहले नाश दो प्रकार का है इत्यादि बताते हैं। कार्य का विनाश, बाध और निवृत्ति के भेद से दो प्रकार का है। समस्त कार्यों का उपादान जो अज्ञान उसके सहित कार्य का नाश होना बाध कहलाता है। और जो कार्यनाश उपादान के रहते हुए ही हो, उसे निवृत्ति कहते हैं। बाधरूप नाश में कारण—अधिष्ठान के स्वरूप का साक्षात्कार है। क्योंकि अधिष्ठान के स्वरूप का साक्षात्कार बिना हुए, कार्य का उपादानभूत जो अधिष्ठान का अज्ञान, उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती।
परन्तु निवृत्तिसंज्ञक जो दूसरा कार्यनाश है, वह विरोधी वृत्ति के उत्पन्न होने पर या जिस दोष के कारण, कार्य का भास हो रहा है उसकी निवृत्ति होने पर होता है। अर्थात् कार्य की निवृत्ति होती है।
जैसे—शुक्ति-रजतरूप कार्य के शुक्तिरूप अधिष्ठान का साक्षात्कार होने पर शुक्ति संबंधी अज्ञान नष्ट हो जाता है और रजतरूप कार्य का उपादानभूत जो शुक्ति का अज्ञान,
१. '—प्रत्यन्तरो—' इति पाठान्तरम् ।