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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 482 में से

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१३२ वेदान्तपरिभाषा [ कार्यविनाशद्वैविध्यम्

उस (अज्ञान) के सहित रजतरूप कार्य, नाश को प्राप्त होता है। इसलिए इस नाश को 'बाध' कहते हैं। और स्वप्नगजादि कार्यों का नाश, जागरणरूप स्वप्नविरोधी वृत्ति के उत्पन्न होने पर अपने आप हो जाता है। इसलिये स्वाप्नरथादिकों का नाश—निवृत्ति कहा जाता है। इस प्रकार से कार्यनाश द्विविध है।

जागरित अवस्था में ब्रह्म-साक्षात्कार का अभाव रहता है। इस कारण स्वप्नप्रपंच की उपादानभूत अविद्या (अज्ञान) का नाश नहीं होता। उपादानभूत अज्ञान का नाश न होने से स्वप्नप्रपंच का बाध नहीं होता। तथापि स्वाप्निक रथगजादिकों की निवृत्तिरूप दूसरे प्रकार के नाश होने में कोई किसी प्रकार का विरोध नहीं है। कारण यह है कि समस्त प्रपंच की उपादानभूत अविद्या (अज्ञान) का ब्रह्म-साक्षात्कार से यद्यपि नाश नहीं हुआ, तथापि मुसलप्रहार से जैसे घट का नाश होता है उसी प्रकार उस स्वाप्नप्रपंच (स्वाप्नगजादि) के प्रत्यय के विरुद्ध दूसरे प्रत्यय के उत्पन्न होने से ही उसकी निवृत्ति हो सकती है। इस कारण ऐसी निवृत्ति को ब्रह्मसाक्षात्कारपूर्वक अज्ञान के नाश की ही कोई आवश्यकता नहीं होती। बाधरूप नाश के लिये मात्र ब्रह्मसाक्षात्कार द्वारा उपादानभूत अज्ञान के नाश की आवश्यकता होती है। परन्तु स्वाप्नगजादिकों का जागरण में बाध न होकर, निवृत्ति होती है। अतः कोई विरोध नहीं होता।

स्वप्न के गजादि प्रपंच की निवृत्ति, जागरणरूप विरोधीवृत्ति के उत्पन्न होने से जैसे हो सकती है, वैसे ही स्वप्न प्रत्यय को उत्पन्न करने वाले निद्रा, अदृष्टादि दोषों के नाश से भी हो सकती है।

जागरित अवस्था में स्वाप्नप्रपंच की निवृत्ति सुनकर चकित होने की आवश्यकता नहीं। स्वप्न में भी विरोधी वृत्ति के उत्पन्न होते ही पूर्व प्रतीत हुए अर्थ की निवृत्ति होती दिखाई देती है। जैसे स्वप्न में पूर्वक्षण में गज का प्रत्यय होते-होते ही दूसरा अश्वविषयक प्रत्यय उत्पन्न होने पर, गजप्रत्यय की निवृत्ति होती है—यह अनुभूत है। तात्पर्य यह है—कार्य का नाश, दूसरे विरोधी प्रत्यय की उत्पत्ति अथवा कार्य में निमित्त बननेवाले दोषों की निवृत्ति होने से भी हो सकता है। ऐसे नाश को निवृत्ति कहते हैं।

यदि ऐसी स्थिति है तो शुक्तिरूप्य के नाश को आप बाध कहेंगे या निवृत्ति?

एवं¹ च² शुक्तिरूप्यस्य शुक्त्यवच्छिन्न-चैतन्यनिष्ठ-तूलाविद्या-³


१. शुक्तिरूप्यस्य बाधो निवृत्तिर्वेतिजिज्ञासायां सत्यां 'एवञ्चे'ति ग्रन्थः। कार्यनाशस्य द्वैविध्ये सिद्धे सति।
२. 'वं शुक्ति०'—इति पाठान्तरम्।
३. अविद्या तावत् त्रिविधा—मूलाऽविद्या, अवस्थाऽविद्या, तूलाऽविद्या चेति। तत्र मूलाऽविद्या अनादिभावभूता आवरणविक्षेपशक्तिमती, ब्रह्मज्ञाननाश्या, शुद्धब्रह्माश्रया तद्विषया च। अवस्थाऽविद्या-आवरण-विक्षेपशक्तिमती, ब्रह्मज्ञानाऽन्यज्ञाननाश्या,