भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 482 में से

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कार्यविनाशद्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३३

कार्यत्वपक्षे शुक्तिरिति ज्ञानेन तदज्ञानेन सह रजतस्य बाधः। मूला- विद्याकार्यत्वपक्षे तु मूलाविद्याया ब्रह्मतत्त्व ^१साक्षात्कारमात्रनिवर्त्यतया शुक्तित्वज्ञानेना ^२ऽनिवर्त्यतया ^३ रजतस्य तत्र शुक्तिज्ञानान्निवृत्तिमात्रं, ^४मुसलप्रहारेण घटस्येव।

अर्थ—कार्य का नाश दो प्रकार का है—यह सिद्ध होने पर शुक्तिरूप्य, शुक्त्य- वच्छिन्न—चैतन्यनिष्ठ तूलाविद्या का कार्य है—इस पक्ष में 'यह शुक्ति है' इस ज्ञान से शुक्तिविषयक अज्ञान के साथ रजत का बाध होता है। परन्तु शुक्तिरूप्य, मूलाविद्या का कार्य है—इस पक्ष में मूलाविद्या केवल ब्रह्मतत्त्वसाक्षात्कार से ही निवृत्त होने योग्य है। इसलिये शुक्तिरूप्य, शुक्तित्वज्ञान से निवृत्त होना संभव नहीं। अतः इस पक्ष में शुक्तिज्ञान से रजत की, केवल निवृत्ति होती है। अधिष्ठानसाक्षात्कार के बिना ही मुसलप्रहार से घट की जैसे निवृत्ति होती है वैसे ही अधिष्ठानसाक्षात्कार से मूलाज्ञान की निवृत्ति के बिना ही रजत की निवृत्ति होती है, बाध नहीं।

विवरण—शुक्ति में भासित होनेवाले रजत को शुक्तिरूप्य कहते हैं और शुक्ति- ज्ञान से उसकी निवृत्ति होती है, बाध नहीं। यह उपर्युक्त प्रश्न का संक्षेप में उत्तर है। परन्तु प्रथमतः उस विषय में मतभेद के कारण रूढ़ हुए दो पक्षों को बताते हैं। प्राति- भासिक पदार्थ तूलाविद्या के कार्य हैं—ऐसा पद्मपादाचार्य कहते हैं। उनके मत में 'यह शुक्ति है' इस ज्ञान से, प्रातिभासिक पदार्थों के उपादानभूत, शुक्ति के अज्ञान के साथ रजत का बाध होता है। परन्तु प्रातिभासिक पदार्थ, मूलाविद्या के ही कार्य हैं— ऐसा मत वाचस्पति मिश्र आदिकों का है। इनके मत के अनुसार विचार करने पर वह मूलाविद्या, केवल ब्रह्मज्ञान से ही बाधित हो सकती है। सिवाय ब्रह्मज्ञान के दूसरे किसी ज्ञान से बाधित नहीं हो सकती। इसलिये 'यह शुक्ति है' इस ज्ञान से


मूलाज्ञानतादात्म्यापन्ना, सोपाधिकचिदाश्रया तद्विषया च। तूलाऽविद्या तु आवरण- विशेषशक्तिमती, ब्रह्मज्ञानान्यज्ञाननाश्या, मूलाज्ञानतादात्म्यानापन्ना, सोपाधिकचिदाश्रया तद्विषया च। तत्र शुक्तिरूप्यादिकं तूलाऽविद्याया कार्यमितीष्टसिद्धिकाराः। तथा- चोक्तमिष्टसिद्धौ—“किमनन्तानि शुक्त्यज्ञानानि ? बाढम्, अनन्तान्येवे”ति। अनेन तूलाऽविद्याऽवस्थाविद्ययोर्भेद एव वर्तते। अद्वैतसिद्धौ प्रतिकर्मव्यवस्थायां—“तूलाऽज्ञान- नाशाद्वाऽवस्थाविशेषप्रच्यवाद्दे”ति।

१. 'ह्यसाक्षा'—इति पाठान्तरम्। २. अनिवर्त्यतया मूलाऽविद्याया इत्यनेनान्वयः। ३. 'या तत्र'—इति पाठान्तरम्। ४. 'मुद्गरप्र०'—इति पाठान्तरम्।

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