वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १३६ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः |
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यदि स्वीकार किया जाय तो 'यह रजत नहीं है' ऐसा त्रैकालिक निषेधज्ञान होगा नहीं। किन्तु 'इस समय यह रजत नहीं है' यह ज्ञान होगा। अब 'यह घट काला नहीं है' इस ज्ञान के समान ही वह भी वर्तमान निषेध ज्ञान होगा। यह कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि 'यह रजत नहीं है' इस त्रैकालिक निषेधज्ञान में रजतत्व से अवच्छिन्न जो रजत उसमें जिसकी प्रतियोगिता है ऐसा अभाव, उस निषेधज्ञान का विषय रहता है, क्योंकि व्यधिकरण-धर्म से अवच्छिन्न प्रातिभासिक-रजत में जिसकी प्रतियोगिता है, ऐसे अभाव को हमने स्वीकृत किया है।
विवरण—शुक्तिरजत, अविद्या का कार्य है। इस कारण प्रतिभास के समय में शुक्ति में भासित होनेवाले रजत का प्रातिभासिक सत्त्व माननेपर 'यह रजत नहीं है इत्याकारक त्रैकालिक निषेध-ज्ञान उत्पन्न नहीं होगा। किंबहुना वैसा त्रैकालिक निषेध-ज्ञान हो ही नहीं सकेगा। उसका ज्ञान इस तरह हो सकेगा कि 'अब (वर्तमान काल में) यह घट श्याम नहीं' इस वाक्य से वर्तमानकालीन श्यामत्व के निषेध की ज्ञान जैसे होता है, वैसे ही 'अब यह रजत नहीं' वर्तमानकालीन निषेधज्ञान होगा। परन्तु 'यह शुक्ति है, रजत नहीं' त्रैकालिक निषेधज्ञान है। इस कारण 'यह शुक्ति पहले कभी रजत नहीं थी, इस समय भी नहीं है और भविष्य में भी वह रजत नहीं होगी' इत्याकारक जो ज्ञान होगा, वह त्रैकालिक निषेधज्ञान कहा जा सकता है। इसलिये शुक्तिरूप्य के प्रतिभास के समय उसकी प्रातिभासिक सत्ता मानने पर 'अब (वर्तमान में) यह रजत नहीं है' इतना ही ज्ञान होगा। पूर्वोक्त त्रैकालिक ज्ञान होगा नहीं। क्योंकि प्रतिभास के निवृत्त होते ही प्रातिभासिक सत्ता भी निवृत्त होती है। उस कारण व्यवहारदशा में 'यह शुक्ति, रजत नहीं' इतना ही ज्ञान उससे होगा। यह पूर्वोक्त शंका का आशय है।
विषय का भेद होने से त्रैकालिक निषेध से कोई विरोध नहीं हो पाता। क्योंकि 'यह रजत नहीं' इस प्रकार त्रैकालिक निषेधज्ञान जब होता है, तब उस निषेधज्ञान का, 'रजतत्व' विशेषण से विशिष्ट हुए रजत में जिसकी प्रतियोगिता है ऐसा अभाव, विषय नहीं होता है। किन्तु 'व्यावहारिकत्व'—इस विशेषण से विशिष्ट—प्रातिभासिक रजत में जिसकी प्रतियोगिता है—ऐसा अभाव ही 'यह रजत नहीं है' इत्याकारक निषेधज्ञान का विषय है। यहाँ के 'लौकिक पारमार्थिक' पद से 'व्यावहारिक' अर्थ समझना चाहिये। 'यह रजत नहीं' इस उदाहरण में प्रातिभासिक रजत, लौकिक-पारमार्थिक (व्यावहारिक) नहीं, इस प्रकार प्रातिभासिक रजत में जिसकी प्रतियोगिता है ऐसा जो व्यावहारिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिता का अभाव है। वही उस निषेध-ज्ञान का विषय है।
जिस प्रकार नैयायिकों ने कपाल पर भी पटत्वेन (पटत्वरूप से) घट का अभाव स्वीकार किया है उसी प्रकार हमने भी व्यधिकरणाभाव स्वीकार किया है।