वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंव्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३७
व्यधिकरण धर्म का अर्थ है विरुद्ध व्यावहारिक रजतादि, जिसका अधिकरण है। वह धर्म लौकिक पारमार्थिकत्व (व्यावहारिकत्व) है। उस व्यावहारिकत्व धर्म से अवच्छिन्न प्रातिभासिक रजत में जिसकी प्रतियोगिता है, वह अभाव लौकिकपारमार्थिकत्वावच्छिन्न-प्रातिभासिक रजत-प्रतियोगिताक है। यही अभाव 'यह रजत नहीं' इस निषेधज्ञान का विषय है।
तथापि आपका कथन अनुपपन्न ही प्रतीत होता है। क्योंकि व्यधिकरण-धर्म का बोध होने पर या न होने पर भी उसकी अनुपपत्ति ही है। इस आशय से शंका—
ननु¹ प्रातिभासिके रजते पारमार्थिकत्वमवगतम् न वा ? अनवगते² प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न³-रजतत्वज्ञानाभावादभावप्रत्यक्षानुपपत्तिः, अवगतेऽपरोक्षावभासस्य⁴ तत्कालीन-विषयसत्ता-नियतत्वाद्, रजते पारमार्थिकमप्यनिर्वचनीयं रजतवदेवोत्पन्नमिति तदवच्छिन्नरजतसत्त्वे तदवच्छिन्नाभावस्तस्मिन्⁵ कथं वर्तते ? इति चेत् ।
अर्थ— प्रातिभासिक रजत में पारमार्थिकत्व का ज्ञान हुआ है या नहीं ? ज्ञात नहीं है कहें, तो प्रतियोगितावच्छेदक (रजतत्व) से अवच्छिन्न रजत के ज्ञान में तत्त्वज्ञान का अभाव होने से, अभाव के प्रत्यक्ष की अनुपपत्ति होती है। रजतत्व ज्ञात है कहें, तो उसके अपरोक्षावभास की तत्कालीन विषयसत्ता के नियत होने से रजत में, (उसी की तरह) पारमार्थिकत्व भी अनिर्वचनीय उत्पन्न होने से तदवच्छिन्न रजत-सत्त्व होने पर वहीं तदवच्छिन्न-रजताभाव कैसे होगा ? यह आक्षेप यदि करें तो ठीक नहीं।
विवरण— जिन शुक्ति आदिकों में 'यह रजत' इत्याकारक बुद्धि उत्पन्न होती है उस रजत में, लौकिक पारमार्थिकत्व (व्यावहारिकत्व) ज्ञात होता है या नहीं ? उस रजत में व्यावहारिकत्व ज्ञात नहीं होता—यह मानने पर 'यह रजत नहीं है' इत्याकारक अभाव का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं होगा। तथाहि—उस अभाव की प्रतियोगिता रजत में होने से उसका अवच्छेदक 'रजतत्व' है, परन्तु उस ज्ञान में तत्त्वज्ञानता (यथार्थता) नहीं होने से अभाव का प्रत्यक्ष अनुपपन्न होता है।
१. व्यधिकरणधर्मस्य अवगमे अनवगमेऽपि अनुपत्तिरिति शङ्कते 'नन्वि'त्यादिग्रन्थेन। अयमाशयः—यद्यपि व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावो विद्यते, तथापि तस्य ज्ञानं नैव भवेत्, व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नस्य प्रतियोगिनो ज्ञानाभावात्। अभावज्ञानं प्रति प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नस्य प्रतियोगिनो ज्ञानस्य हेतुत्वात्।
२. 'मे'—इति पाठान्तरम्।
३. 'अज्ञाना०'—इति पाठान्तरम्।
४. 'मे'—इति पाठान्तरम्।
५. 'स्तत्र'—इति पाठान्तरम्।