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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 482 में से

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पृष्ठ 196

१३८ वेदान्तपरिभाषा [ व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः

शंका—प्रतियोगी रजत में स्थित जो प्रातिभासिक रजतत्व है, वही प्रतियोगितावच्छेदक है—यह ज्ञान होता है। अतः उसे छोड़कर व्यावहारिक रजतत्व-तक क्यों दौड़ा जाय? परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि अभावज्ञान जिस रूप से प्रतियोगी को विषय करता है, उसका प्रतियोगितावच्छेदक नियमेन तद्रूप ही रहता है। 'यह रजत नहीं है' यहाँ रजत का अभावज्ञान, 'यह रजत व्यावहारिक नहीं है' इस प्रकार से प्रतियोगी को व्यावहारिकत्वरूप से विषय करता है। इसलिये उसमें व्यावहारिकत्व ही प्रतियोगितावच्छेदक है। परन्तु उसी का यदि बोध न होता हो तो उस अभाव के प्रत्यक्ष का असम्भव हो जाता है। क्योंकि अभाव के प्रत्यक्ष-ज्ञान करने में उसके प्रतियोगी का और प्रतियोगी के अवच्छेदक का ज्ञान होना आवश्यक है। बिना उसके अभाव का प्रत्यक्षज्ञान हो नहीं सकता।

दूसरा पक्ष (प्रातिभासिक रजत में स्थित पारमार्थिकत्व अवगत था) मानें तो वह भी ठीक नहीं। क्योंकि किसी भी इन्द्रियसन्निकृष्ट (सम्बद्ध) वस्तु का ही प्रत्यक्ष अवभास होता है—यह नियम है। इस कारण जैसे आप कहते हैं कि प्रातिभासिक-रजत, उसी समय (प्रतिभासकाल में ही) उत्पन्न हुआ। वैसे ही उस प्रातिभासिक-रजत पर रहनेवाला व्यावहारिकत्व भी उसी समय (प्रतिभास के समय ही) उत्पन्न हुआ—मानना उचित है, और ऐसा मानने पर 'यह रजत नहीं' इत्याकारक निषेध नहीं हो सकेगा। क्योंकि इस स्थिति में निषेध का अर्थ होगा कि 'व्यावहारिकत्व से अवच्छिन्न रजत में व्यावहारिकत्वावच्छिन्न-रजत नहीं है।' परन्तु ऐसा कहने में व्याघात दोष होगा। इस कारण लौकिक पारमार्थिकत्व से (व्यावहारिकत्व से) अवच्छिन्न—प्रातिभासिक रजत है प्रतियोगी जिसका, ऐसा अभाव, 'यह रजत नहीं' इत्याकारक निषेधज्ञान का विषय नहीं बन सकता।

वादी के द्वारा ऐसी शंका उपस्थित होने पर ग्रन्थकार उसका परिहार करते हैं—

न¹। पारमार्थिकत्वस्याधिष्ठाननिष्ठस्य रजते प्रतिभाससम्भवेन रजतनिष्ठ-पारमार्थिकत्वोत्पत्त्यनभ्युपगमात्। ²यत्रारोप्यमसन्निकृष्टं, तत्रैव प्रातिभासिक-वस्तूत्पत्तेरङ्गीकारात्। अत³ एवेन्द्रिय⁴सन्निकृष्टतया


१. अवगमपक्षमालम्ब्य परिहारः नेतिग्रन्थेन।
२. लौकिकपारमार्थिकत्वोत्पत्तिः कुतो नाभ्युपगम्यत इत्याशङ्कायाः परिहारः 'यत्रेति' ग्रन्थेन।
३. अतो यत्रारोप्यं सन्निकृष्टं न तत्र प्रातिभासिकवस्तूत्पत्तिः स्वीक्रियत इत्याह 'अत एवे'तिग्रन्थेन।
४. यत्र सन्निकृष्टमपि जपाकुसुमं हस्तादिद्रव्यान्तरव्यवधानात् असन्निकृष्टं तत्र स्फटिके अनिर्वचनीय-लौहित्योत्पत्तिः कुतो नांगीक्रियत इत्याशङ्कते 'नन्वित्यादिना'।