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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 482 में से

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व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३९

जपा$^१$कुसुमगत-लौहित्यस्य स्फटिके भानसम्भवान् न स्फटिकेऽनिर्वचनीयलौहित्योत्पत्तिः ।

**अर्थ—**ऐसी शंका उठाना ठीक नहीं । क्योंकि अधिष्ठाननिष्ठ पारमार्थिकत्व का रजत में प्रतिभास होना शक्य है (प्रातिभासिक रजत में शुक्ति के 'इदम्' अंश के साथ पारमार्थिकत्व का भी प्रतिभास संभव होने से) हमें रजतनिष्ठ पारमार्थिकत्व की तत्काल उत्पत्ति नहीं माननी पड़ती, क्योंकि जहाँ पर आरोप्य सन्निकृष्ट न होकर इन्द्रिय से असन्निकृष्ट (असम्बद्ध) रहता है वहीं पर प्रातिभासिक वस्तु की उत्पत्ति को हम मानते हैं । इसी कारण (इन्द्रियसन्निकृष्टत्व के कारण) गुड़हर (जपापुष्प) की लालिमा स्फटिक में भासित होती है । अत एव स्फटिक में उसकी अनिर्वचनीय उत्पत्ति की कल्पना नहीं करनी पड़ती ।

इस पर एक सूक्ष्म शंका और समाधान—

नन्वेवं यत्र जपा$^२$कुसुमं द्रव्यान्तर-व्यवधानादसन्निकृष्टं, तत्र लौहित्य-प्रतीत्या प्रातिभासिकं लौहित्यं स्वीक्रियतामिति चेत् । न । इष्टत्वात् । एवं प्रत्यक्षभ्रमान्तरेष्वपि प्रत्यक्षसामान्यलक्षणाऽनुगमो यथार्थप्रत्यक्षलक्षणासद्भावश्च दर्शनीयः ।

अर्थ—(शंका) इन्द्रियसन्निकृष्ट जपाकुसुम भी जब दूसरे (हस्तादि) द्रव्य से व्यवहित हो जाता है तब वह पुष्प, इन्द्रिय से असन्निकृष्ट हो जाता है, तथापि स्फटिक में लालिमा प्रतीत होती ही है। इस कारण ऐसे स्थलों पर प्रातिभासिक लौहित्य का स्वीकार करना ही पड़ेगा (ऐसे समय पर स्फटिक में अनिर्वचनीय लौहित्य उत्पन्न होता है—यह कहना पड़ेगा)।

यह शंका करना ठीक नहीं, क्योंकि वह तो हमें इष्ट ही है (ऐसे स्थलों में आरोप्य की अनिर्वचनीय उत्पत्ति होना तो हमें स्वीकार ही है) और इसी तरह अन्य प्रत्यक्ष


इष्टापत्या परिहारः कृतः ।
ननु इन्द्रियसन्निकृष्ट-प्रभायाः स्फटिके भानसंभवात् अनिर्वचनीयलौहित्योत्पत्तिः अनुपपन्नेति चेन्न । अस्वच्छद्रव्यस्य जपाकुसुमस्य प्रभाया एव असिद्धेः । तथा चोक्तं पञ्चपादिकायाम्—"यथा पद्मरागादिप्रभा निराश्रयापि उन्मुखा उपलक्ष्यते न तथा जपाकुसुमादेः" । तथा च 'असन्निहितस्य परत्र अवभासः अध्यासः' इत्यध्यासलक्षणं न क्वापि व्यभिचरति ।

१. '-वा-' इति पाठान्तरम् ।
२. '-वा-' इति पाठान्तरम् ।