वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४० वेदान्तपरिभाषा [ व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः
के 'चित्त्व' रूप सामान्य लक्षण की अनुवृत्ति और यथार्थ-प्रत्यक्ष-लक्षण का असद्भाव ( नास्तित्व ) समझना चाहिये ।
विवरण--आरोप्य पदार्थ के इन्द्रियसन्निकृष्टत्व और इन्द्रियासन्निकृष्टत्व रूप से दो भेदों की कल्पना कर जहाँ जपाकुसुम की तरह आरोप्य, इन्द्रियसन्निकृष्ट हो वहाँ स्फटिक में लालिमा अनिर्वचनीय पैदा होती है, यह मानना नहीं पड़ता, परन्तु जहाँ आरोप्य रजतादि, इन्द्रियसन्निकृष्ट नहीं रहता, वहाँ शुक्ति आदि में अनिर्वचनीय रजतादि की उत्पत्ति होना तो हम भी मानते हैं। जहाँ आरोप्य असन्निकृष्ट हुआ कि वहाँ आरोप्य की अनिर्वचनीय उत्पत्ति को हम मानते हैं, इस नियम को ध्यान में रखने से उपर्युक्त शंका नहीं उठेगी ।
शंका--इन्द्रिय से सन्निकृष्ट हुई प्रभा का स्फटिक में भास हो सकेगा, तब अनिर्वचनीय लौहित्य की उत्पत्ति मानना तो अनुपपन्न भी होगा। परन्तु यह शंका ठीक नहीं । क्योंकि जपाकुसुम अस्वच्छ द्रव्य है इस कारण उसकी प्रभा का ही संभव नहीं । पंचपादिका में भी 'जैसी पद्मरागादि मणियों की प्रभा, बिना आश्रय के भी ऊपर की ओर फैली दीखती है, वैसी जपाकुसुमादिकों की प्रभा, ऊपर या चारों ओर फैली नहीं दीखती' कहा है । इसलिये 'असन्निहित' = असमीप के पदार्थ का 'परत्र' अन्य पदार्थ में अवभास होना, यह अध्यास का लक्षण कहीं पर भी व्यभिचरित नहीं होने पाता ।
शंका--शुक्ति में रजत के अध्यास का संभव होने पर भी अहंकारादिकों का आत्मा में अध्यास नहीं हो सकता। क्योंकि आत्मा, अध्यास का अधिष्ठान हो नहीं सकता। कारण यह है कि अधिष्ठान का अध्यस्यमान के सदृश होना, ( जिसका उस पर अध्यास करना है उसके समान होना ) दो अंशों से युक्त होना, परिच्छिन्न और अध्यस्यमान के साथ ही एक ज्ञान का विषय बनने योग्य होना आवश्यक होता है । जैसे--शुक्ति रूप अधिष्ठान, अध्यस्यमान रजत के समान, 'इदं' और त्रिकोणत्वादि दो अंशों से युक्त, परिच्छिन्न = मर्यादित और रजत के साथ एक ही ज्ञान का विषय बनने योग्य होता है, परन्तु आत्मा में यह अधिष्ठान की सामग्री नहीं होती । इसलिये आत्मा, अहंकारादिकों के अध्यास का अधिष्ठान नहीं बन पाता ।
समाधान--यह शंका ठीक नहीं है । क्योंकि अहंकारादि कार्य अविद्या में प्रतिबिम्बित हुए चैतन्य पर आरोपित किया जाता है । इसका कारण यह है कि कार्य का अध्यास कारणावच्छिन्न में होना ही उचित है । अहंकार का कारण अज्ञान है । उस अज्ञान से अवच्छिन्न = युक्त, विशिष्ट चैतन्य पर कार्यरूप अहंकार का अध्यास होना योग्य ही है ।
शंका--ऐसा कहने पर समानाश्रयत्व का भंग होता है ।
सिद्धान्ती--समानाश्रयत्व का भंग नहीं होता । क्योंकि बिम्ब और प्रतिबिम्ब की एकता होने से समानाश्रयत्व का भंग नहीं होता । इसी कारण अहंकारादिकों के अधिष्ठानभूत चैतन्य का अभिधेयत्वादि ( विषयत्वादि ) भी ठीक बन जाता है । अहंकार