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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 482 में से

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पृष्ठ 206

अथानुमानपरिच्छेदः २

इस प्रकार समस्त वादियों को सम्मत तथा समस्त प्रमाणों में ज्येष्ठ ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण का प्रथमतः निरूपण करके तदनन्तर ग्रन्थकार, बहुत से वादियों को सम्मत, कुछ इने-गिने वादियों को असम्मत ऐसे अनुमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा कर रहे हैं।

अथानुमानं निरूप्यते¹ । अनुमितिकरणमनुमानम् । अनुमितिश्च व्याप्तिज्ञानत्वेन² व्याप्तिज्ञान-जन्या । व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायादेस्तत्त्वेन तज्जन्यत्वाभावान्नानुमितित्वम्³ ।

**अर्थ—**प्रत्यक्षनिरूपण के अनन्तर अनुमान का निरूपण किया जाता है। जो अनुमिति-प्रमा का कारण हो वह अनुमान है। और अनुमिति-प्रमा व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्य है। व्याप्तिज्ञान के अनुव्यवसायादिकों को व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्ति-ज्ञानजन्यत्व नहीं है। इसलिये अनुव्यवसाय, स्मृति, शाब्दज्ञान आदि को अनुमितित्व नहीं है।

**विवरण—**जिस ज्ञान से 'अनुमिति' नामक यथार्थ ज्ञान (प्रमा) होता है वह ज्ञान 'अनुमान' नाम का द्वितीय प्रमाण है। यहाँ पर 'अनुमान' नामक दूसरे प्रमाण का लक्षण किया है। इसलिये 'अनुमितिकरण' यह अनुमान-प्रमाण का लक्षण है और 'अनुमान' यह लक्ष्य है। 'अनुमीयते-अनेन इति अनुमानम्' जिस ज्ञान के कारण अग्न्यादिकों का अनुमान किया जाता है, जिस व्याप्तिज्ञान से अनुमिति-प्रमा पैदा की जाती है वह (व्याप्तिज्ञान) अनुमान है। इस रीति से व्युत्पन्न 'अनुमान' पदार्थ लक्षण है और अव्युत्पन्न (रूढ़) अनुमान शब्दार्थ, लक्ष्य है। 'व्याप्तिज्ञान' रूप अर्थ में जब 'अनुमान' शब्द व्युत्पन्न रहता है तब वह अनुमान नामक द्वितीय प्रमाण का


१. निरूप्यते स्वरूप-लक्षण-फलैर्ज्ञाप्यते ।
२. व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिप्रकारक-ज्ञानत्वेन । तृतीयाविभक्त्यर्थः अवच्छिन्नत्वम् । तस्य व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकतायामन्वयः । व्याप्तिप्रकारकज्ञानस्य जनकत्वञ्च व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वेन, नान्येनरूपेणेति व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वं व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकताया अवच्छेदकम्, व्याप्तिज्ञाननिष्ठं जनकत्वञ्च अवच्छेद्यम् । तथा च 'व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वावच्छिन्नव्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकता-निरूपित-जन्यतावज्-ज्ञानत्वमनुमितित्वम्' इति अनुमितेर्लक्षणम् ।
३. व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायादेः तत्त्वेन व्याप्तिज्ञानत्वेन तज्जन्यत्वाभावात् अर्थात् व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्नजनकतानिरूपित-जन्यतावज्ज्ञानत्वाभावात् । व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायं प्रति व्याप्तिज्ञानस्य विषयत्वेनैव कारणत्वात् तत्र विषयत्वावच्छिन्न-जनकता-निरूपित-जन्यतावज्ज्ञानत्वसत्त्वात् नानुमितित्वम् ।