भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 482 में से

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पृष्ठ 205

उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४७

जैसे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार नगाड़े और दण्ड के संयोग से वहाँ के आकाश मे प्रथम शब्द उत्पन्न होता है, इसी असमवायिकारण से दूसरा शब्द उत्पन्न होता है, उससे तीसरा शब्द उत्पन्न होता है, इस परम्परा से श्रोत्रेन्द्रिय से संयुक्त होने वाले अन्त्य शब्द की उत्पत्ति होती है, और स्वस्थान पर स्थित श्रोत्रेन्द्रिय से उस अन्त्य शब्द का सम्बन्ध होकर शब्द का प्रत्यक्षज्ञान होता है । यह नैयायिकों की प्रक्रिया है ।

परन्तु इस प्रक्रिया में अनन्त शब्द और उनकी उत्पत्ति इत्यादि गुरुकल्पना (कल्पनागौरव) करनी पड़ती है । 'वीचीतरंगादि' यहाँ आदि शब्द से 'कदम्ब-मुकुल' न्याय भी समझना चाहिए । कदम्ब-पुष्प के चारों ओर पंखुड़ियाँ जैसी एक-दम फैलती हैं, उसी तरह प्रथम पैदा हुए एक शब्द से दस दिशाओं में दस शब्द उत्पन्न होते हैं, उससे और दस, इस क्रम से उत्तरोत्तर शब्दों की उत्पत्ति होकर जहाँ कर्ण-शष्कुली प्रदेश होगा वहाँ उससे उस शब्द का सम्बन्ध होता है । नैयायिकों की प्रक्रिया में कल्पनागौरव के सिवाय एक ओर दोष होता है । नगाड़े का शब्द सुनकर यह नगाड़े का शब्द है—यह प्रत्यक्षज्ञान होता है । नैयायिकों के कथनानुसार प्रथम शब्द से दूसरा आदि क्रम से कर्णशष्कुली प्रदेश में अन्त्य शब्द के उत्पन्न होने पर 'मैंने भेरीशब्द सुना' इस प्रत्यक्ष को भ्रम कहना पड़ेगा । परन्तु प्रत्यक्षज्ञान में भ्रमत्व की कल्पना करने में भी गौरव है ।

श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरण-प्रकाशे प्रत्यक्ष-परिच्छेदः समाप्तः ॥

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