वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४६ | वेदान्तपरिभाषा | [ उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम्
इन्द्रियों के अस्तित्व में यदि प्रमाण पूछो तो दो प्रमाण हैं—एक अनुमान¹ और दूसरी श्रुति । १--रूपादि ज्ञान सकरणक हैं, २--क्योंकि उन्हें क्रियात्व है, ३--छेदन क्रिया की तरह । इस अनुमान से इन्द्रियों का अस्तित्व सिद्ध होता है । काष्ठादिकों का छेदन ( काटना ) क्रिया है । कोई भी क्रिया बिना करण ( साधन ) के संभव नहीं होती । रूपादिकों का ज्ञान भी क्रिया है । क्रिया कहते ही वह सकरणक होनी चाहिये । अर्थात् जिसके व्यापार से रूप का ज्ञान होता है वह रूप-ज्ञान में करण है । जिससे शब्द का ज्ञान होता है वह श्रोत्र, इत्यादि अनुमान से घ्राणादि ज्ञानेन्द्रियों की सिद्धि होती है । उसी तरह 'जीवात्मा शरीर त्यागकर जब जाने लगता है तब उसके पीछे-पीछे सब प्राण ( इन्द्रियाँ ) शरीर छोड़कर जाते हैं' ( बृ. उ. ४।३।३८ ) यह श्रुति भी इस विषय में प्रमाण है ।
बौद्धों का कहना है कि 'इन्द्रियाँ, विषयों को बिना प्राप्त हुए ही विषयज्ञान कराती हैं' अतः इनका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं कि 'ये सब ज्ञानेन्द्रियां अपने-अपने विषयों से संयुक्त होकर ही स्व-स्व विषय का ज्ञान उत्पन्न करते हैं ।
परन्तु उसमें भी फलबलकल्प्य विशिष्ट स्वभाव का आश्रय करके अवान्तर भेद बताते हैं । घ्राण, रसन और त्वक् तीन इन्द्रियाँ नासिकाग्र, जिह्वाग्र और समस्त शरीर आदि अपने-अपने स्थान में स्थित होकर ही गन्ध, रस और स्पर्श आदि स्व-स्व विषय का अनुभव उत्पन्न करते हैं । ( वे अपने स्थानों से निकलकर विषय के समीप नहीं पहुँचते किन्तु उनके समीप आये हुए गन्धादि विषयों का ग्रहण करते हैं ) परन्तु चक्षु और श्रोत्र दो इन्द्रियाँ अपने गोलकादि स्थान से बाहर निकलकर विषय-प्रदेश में पहुँचती हैं और क्रमशः रूप और शब्द का ग्रहण करती हैं ।
शंका—अपने स्थान से निकलकर विषय के समीप चक्षुरिन्द्रिय के जाने पर भी श्रोत्रेन्द्रिय का विषय प्रदेश में पहुँचना सम्भव नहीं । क्योंकि कर्णशष्कुली से अवच्छिन्न हुए आकाश का विषयप्रदेश में जाना कैसे हो सकता है, कारण, श्रोत्र आकाश रूप है और आकाश सर्वव्यापक है ।
समाधान—श्रोत्रेन्द्रिय, आकाश के सत्त्वगुण से उत्पन्न हुआ है । यद्यपि वह व्यापक आकाश से उत्पन्न हुआ है, तथापि तेज आदि के सत्त्वगुण से उत्पन्न हुए चक्षुरादिकों की तरह परिच्छिन्न है । इस कारण उसका भेरी प्रभृतियों के प्रदेश में जाना संभव है । शब्द प्रदेश में श्रोत्र का गमन होने के कारण ही ( जहाँ शब्द पैदा होता है वहाँ श्रोत्र के पहुँचने से ही ) 'मैंने नगाड़े का शब्द सुना, मैंने गाय का शब्द सुना' इत्यादि अनुभव होता है । नैयायिक श्रोत्र और शब्द के संयोग की व्यवस्था, वीचीतरंग न्याय से लगाते हैं । वीची से तरंग, उससे दूसरा, उससे तीसरा इस तरह क्रम से असंख्य तरंग
१. 'रूपादिज्ञानं सकरणकं क्रियात्वात् छिदिक्रियावत्' ।