वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंउक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४५
गौरवम्, भेरीशब्दो मया श्रुत इति प्रत्यक्षस्य भ्रमत्वकल्पना-गौरवं च स्यात् । तदेवं व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ॥ श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्त-परिभाषायां प्रत्यक्ष-परिच्छेदः समाप्तः । --:--
'अर्थ--यहाँतक बताया हुआ प्रत्यक्ष प्रकारान्तर से दो प्रकार का है । १. इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष और २. इन्द्रियाजन्य प्रत्यक्ष । उनमें सुखादिप्रत्यक्ष इन्द्रियाजन्य प्रत्यक्ष है, क्योंकि हमने मन के इन्द्रियत्व का निराकरण किया है । घ्राण, रसन, चक्षु, श्रोत्र और त्वक्--ये पाँच इन्द्रियाँ हैं । सब इन्द्रियां अपने-अपने विषय से संयुक्त होने पर ही प्रत्यक्ष ज्ञान को पैदा करती हैं । परन्तु उनमें से घ्राण, रसन और त्वक् तीन इन्द्रियाँ अपने स्थान में स्थित रहती हुई ही गंध, रस और स्पर्श विषयों का क्रमशः प्रत्यक्ष ( अनुभव ) उत्पन्न करती हैं । परन्तु चक्षु और श्रोत्र दो इन्द्रियाँ स्वयं ही जहाँ विषय हो वहाँ जाकर अपने-अपने विषयों का ग्रहण करती हैं । चक्षु के समान परि- च्छिन्न होने से श्रोत्र का भी भेरी, मृदंगादि स्थानों में गमन संभव है । इसी कारण 'भेरी शब्द को मैंने सुना' 'मृदंगध्वनि को मैंने सुना' अनुभव होता है । नैयायिक वीचीतरंग न्याय से कर्णशष्कुली के प्रदेश में अनन्त शब्दों की उत्पत्ति मानते हैं । परन्तु इस प्रकार मानने में गौरव है और 'मैंने भेरी का शब्द सुना' इस प्रत्यक्षज्ञान में भ्रम की कल्पना करना भी दूसरा गौरव है । इस प्रकार हमने प्रत्यक्ष का व्याख्यान किया ।
विवरण—इन्द्रियजन्य ( इन्द्रिय से उत्पन्न हुआ ) और इन्द्रियाजन्य ( इन्द्रिय से उत्पन्न न हुआ ) इस भेद से प्रत्यक्ष दो प्रकार का है । यहाँ इन्द्रियजन्य पद के इन्द्रिय शब्द से पाँच ज्ञानेन्द्रियों का ग्रहण किया जाता है । नैयायिकों की तरह छह इन्द्रियाँ या ओरों की तरह पाँच कर्मेन्द्रिय और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर दस इन्द्रियाँ नहीं मानी जाती । क्योंकि कर्मेन्द्रियों को ज्ञान-जनकत्व नहीं तथा मन को इन्द्रियत्व नहीं--इस बात को हमने पहले बताया है ।
सन्तानस्य सर्वतः प्रसरो नास्ति इति सर्वतः प्रसरः शब्दसन्तानस्य कदम्बमुकुलन्यायेनैव संभवतीत्यभिप्रेत्य केचिदस्य ग्रन्थस्य कदम्बमुकुलन्यायोपलक्षणत्वं वर्णयन्ति । इत्थं च शब्दस्य अनित्यतावादो न युक्तः ।
कदम्बमुकुलन्यायः--कदम्बो वृक्षविशेषः, तस्य मुकुलः ईषद् विकसितपुष्पं कलिकेति यावत् । गोलाकार-कदम्बपुष्पस्य गोलके सर्वावयवेषु युगपत् पुष्पाणामुत्पत्तिः । अर्थात् कदम्बवृक्षस्य कुड्मलं प्रथमवृष्टिपाते सर्वतः दशसु दिक्षु अपि सहसा विक- सति । तद्वत् एकस्मात् प्रथमोत्पन्नात् शब्दात् सर्वदिक्कानि दीर्घदीर्घाणि शब्दवृं- लानि उत्पद्यन्ते ।