भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४५

गौरवम्, भेरीशब्दो मया श्रुत इति प्रत्यक्षस्य भ्रमत्वकल्पना-गौरवं च स्यात् । तदेवं व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ॥ श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्त-परिभाषायां प्रत्यक्ष-परिच्छेदः समाप्तः । --:--

'अर्थ--यहाँतक बताया हुआ प्रत्यक्ष प्रकारान्तर से दो प्रकार का है । १. इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष और २. इन्द्रियाजन्य प्रत्यक्ष । उनमें सुखादिप्रत्यक्ष इन्द्रियाजन्य प्रत्यक्ष है, क्योंकि हमने मन के इन्द्रियत्व का निराकरण किया है । घ्राण, रसन, चक्षु, श्रोत्र और त्वक्--ये पाँच इन्द्रियाँ हैं । सब इन्द्रियां अपने-अपने विषय से संयुक्त होने पर ही प्रत्यक्ष ज्ञान को पैदा करती हैं । परन्तु उनमें से घ्राण, रसन और त्वक् तीन इन्द्रियाँ अपने स्थान में स्थित रहती हुई ही गंध, रस और स्पर्श विषयों का क्रमशः प्रत्यक्ष ( अनुभव ) उत्पन्न करती हैं । परन्तु चक्षु और श्रोत्र दो इन्द्रियाँ स्वयं ही जहाँ विषय हो वहाँ जाकर अपने-अपने विषयों का ग्रहण करती हैं । चक्षु के समान परि- च्छिन्न होने से श्रोत्र का भी भेरी, मृदंगादि स्थानों में गमन संभव है । इसी कारण 'भेरी शब्द को मैंने सुना' 'मृदंगध्वनि को मैंने सुना' अनुभव होता है । नैयायिक वीचीतरंग न्याय से कर्णशष्कुली के प्रदेश में अनन्त शब्दों की उत्पत्ति मानते हैं । परन्तु इस प्रकार मानने में गौरव है और 'मैंने भेरी का शब्द सुना' इस प्रत्यक्षज्ञान में भ्रम की कल्पना करना भी दूसरा गौरव है । इस प्रकार हमने प्रत्यक्ष का व्याख्यान किया ।

विवरण—इन्द्रियजन्य ( इन्द्रिय से उत्पन्न हुआ ) और इन्द्रियाजन्य ( इन्द्रिय से उत्पन्न न हुआ ) इस भेद से प्रत्यक्ष दो प्रकार का है । यहाँ इन्द्रियजन्य पद के इन्द्रिय शब्द से पाँच ज्ञानेन्द्रियों का ग्रहण किया जाता है । नैयायिकों की तरह छह इन्द्रियाँ या ओरों की तरह पाँच कर्मेन्द्रिय और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर दस इन्द्रियाँ नहीं मानी जाती । क्योंकि कर्मेन्द्रियों को ज्ञान-जनकत्व नहीं तथा मन को इन्द्रियत्व नहीं--इस बात को हमने पहले बताया है ।


सन्तानस्य सर्वतः प्रसरो नास्ति इति सर्वतः प्रसरः शब्दसन्तानस्य कदम्बमुकुलन्यायेनैव संभवतीत्यभिप्रेत्य केचिदस्य ग्रन्थस्य कदम्बमुकुलन्यायोपलक्षणत्वं वर्णयन्ति । इत्थं च शब्दस्य अनित्यतावादो न युक्तः ।

कदम्बमुकुलन्यायः--कदम्बो वृक्षविशेषः, तस्य मुकुलः ईषद् विकसितपुष्पं कलिकेति यावत् । गोलाकार-कदम्बपुष्पस्य गोलके सर्वावयवेषु युगपत् पुष्पाणामुत्पत्तिः । अर्थात् कदम्बवृक्षस्य कुड्मलं प्रथमवृष्टिपाते सर्वतः दशसु दिक्षु अपि सहसा विक- सति । तद्वत् एकस्मात् प्रथमोत्पन्नात् शब्दात् सर्वदिक्कानि दीर्घदीर्घाणि शब्दवृं- लानि उत्पद्यन्ते ।

१४६ | वेदान्तपरिभाषा | [ उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम्

इन्द्रियों के अस्तित्व में यदि प्रमाण पूछो तो दो प्रमाण हैं—एक अनुमान¹ और दूसरी श्रुति । १--रूपादि ज्ञान सकरणक हैं, २--क्योंकि उन्हें क्रियात्व है, ३--छेदन क्रिया की तरह । इस अनुमान से इन्द्रियों का अस्तित्व सिद्ध होता है । काष्ठादिकों का छेदन ( काटना ) क्रिया है । कोई भी क्रिया बिना करण ( साधन ) के संभव नहीं होती । रूपादिकों का ज्ञान भी क्रिया है । क्रिया कहते ही वह सकरणक होनी चाहिये । अर्थात् जिसके व्यापार से रूप का ज्ञान होता है वह रूप-ज्ञान में करण है । जिससे शब्द का ज्ञान होता है वह श्रोत्र, इत्यादि अनुमान से घ्राणादि ज्ञानेन्द्रियों की सिद्धि होती है । उसी तरह 'जीवात्मा शरीर त्यागकर जब जाने लगता है तब उसके पीछे-पीछे सब प्राण ( इन्द्रियाँ ) शरीर छोड़कर जाते हैं' ( बृ. उ. ४।३।३८ ) यह श्रुति भी इस विषय में प्रमाण है ।

बौद्धों का कहना है कि 'इन्द्रियाँ, विषयों को बिना प्राप्त हुए ही विषयज्ञान कराती हैं' अतः इनका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं कि 'ये सब ज्ञानेन्द्रियां अपने-अपने विषयों से संयुक्त होकर ही स्व-स्व विषय का ज्ञान उत्पन्न करते हैं ।

परन्तु उसमें भी फलबलकल्प्य विशिष्ट स्वभाव का आश्रय करके अवान्तर भेद बताते हैं । घ्राण, रसन और त्वक् तीन इन्द्रियाँ नासिकाग्र, जिह्वाग्र और समस्त शरीर आदि अपने-अपने स्थान में स्थित होकर ही गन्ध, रस और स्पर्श आदि स्व-स्व विषय का अनुभव उत्पन्न करते हैं । ( वे अपने स्थानों से निकलकर विषय के समीप नहीं पहुँचते किन्तु उनके समीप आये हुए गन्धादि विषयों का ग्रहण करते हैं ) परन्तु चक्षु और श्रोत्र दो इन्द्रियाँ अपने गोलकादि स्थान से बाहर निकलकर विषय-प्रदेश में पहुँचती हैं और क्रमशः रूप और शब्द का ग्रहण करती हैं ।

शंका—अपने स्थान से निकलकर विषय के समीप चक्षुरिन्द्रिय के जाने पर भी श्रोत्रेन्द्रिय का विषय प्रदेश में पहुँचना सम्भव नहीं । क्योंकि कर्णशष्कुली से अवच्छिन्न हुए आकाश का विषयप्रदेश में जाना कैसे हो सकता है, कारण, श्रोत्र आकाश रूप है और आकाश सर्वव्यापक है ।

समाधान—श्रोत्रेन्द्रिय, आकाश के सत्त्वगुण से उत्पन्न हुआ है । यद्यपि वह व्यापक आकाश से उत्पन्न हुआ है, तथापि तेज आदि के सत्त्वगुण से उत्पन्न हुए चक्षुरादिकों की तरह परिच्छिन्न है । इस कारण उसका भेरी प्रभृतियों के प्रदेश में जाना संभव है । शब्द प्रदेश में श्रोत्र का गमन होने के कारण ही ( जहाँ शब्द पैदा होता है वहाँ श्रोत्र के पहुँचने से ही ) 'मैंने नगाड़े का शब्द सुना, मैंने गाय का शब्द सुना' इत्यादि अनुभव होता है । नैयायिक श्रोत्र और शब्द के संयोग की व्यवस्था, वीचीतरंग न्याय से लगाते हैं । वीची से तरंग, उससे दूसरा, उससे तीसरा इस तरह क्रम से असंख्य तरंग


१. 'रूपादिज्ञानं सकरणकं क्रियात्वात् छिदिक्रियावत्' ।

उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४७

जैसे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार नगाड़े और दण्ड के संयोग से वहाँ के आकाश मे प्रथम शब्द उत्पन्न होता है, इसी असमवायिकारण से दूसरा शब्द उत्पन्न होता है, उससे तीसरा शब्द उत्पन्न होता है, इस परम्परा से श्रोत्रेन्द्रिय से संयुक्त होने वाले अन्त्य शब्द की उत्पत्ति होती है, और स्वस्थान पर स्थित श्रोत्रेन्द्रिय से उस अन्त्य शब्द का सम्बन्ध होकर शब्द का प्रत्यक्षज्ञान होता है । यह नैयायिकों की प्रक्रिया है ।

परन्तु इस प्रक्रिया में अनन्त शब्द और उनकी उत्पत्ति इत्यादि गुरुकल्पना (कल्पनागौरव) करनी पड़ती है । 'वीचीतरंगादि' यहाँ आदि शब्द से 'कदम्ब-मुकुल' न्याय भी समझना चाहिए । कदम्ब-पुष्प के चारों ओर पंखुड़ियाँ जैसी एक-दम फैलती हैं, उसी तरह प्रथम पैदा हुए एक शब्द से दस दिशाओं में दस शब्द उत्पन्न होते हैं, उससे और दस, इस क्रम से उत्तरोत्तर शब्दों की उत्पत्ति होकर जहाँ कर्ण-शष्कुली प्रदेश होगा वहाँ उससे उस शब्द का सम्बन्ध होता है । नैयायिकों की प्रक्रिया में कल्पनागौरव के सिवाय एक ओर दोष होता है । नगाड़े का शब्द सुनकर यह नगाड़े का शब्द है—यह प्रत्यक्षज्ञान होता है । नैयायिकों के कथनानुसार प्रथम शब्द से दूसरा आदि क्रम से कर्णशष्कुली प्रदेश में अन्त्य शब्द के उत्पन्न होने पर 'मैंने भेरीशब्द सुना' इस प्रत्यक्ष को भ्रम कहना पड़ेगा । परन्तु प्रत्यक्षज्ञान में भ्रमत्व की कल्पना करने में भी गौरव है ।

श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरण-प्रकाशे प्रत्यक्ष-परिच्छेदः समाप्तः ॥

—: ० :—

अथानुमानपरिच्छेदः २

इस प्रकार समस्त वादियों को सम्मत तथा समस्त प्रमाणों में ज्येष्ठ ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण का प्रथमतः निरूपण करके तदनन्तर ग्रन्थकार, बहुत से वादियों को सम्मत, कुछ इने-गिने वादियों को असम्मत ऐसे अनुमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा कर रहे हैं।

अथानुमानं निरूप्यते¹ । अनुमितिकरणमनुमानम् । अनुमितिश्च व्याप्तिज्ञानत्वेन² व्याप्तिज्ञान-जन्या । व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायादेस्तत्त्वेन तज्जन्यत्वाभावान्नानुमितित्वम्³ ।

**अर्थ—**प्रत्यक्षनिरूपण के अनन्तर अनुमान का निरूपण किया जाता है। जो अनुमिति-प्रमा का कारण हो वह अनुमान है। और अनुमिति-प्रमा व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्य है। व्याप्तिज्ञान के अनुव्यवसायादिकों को व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्ति-ज्ञानजन्यत्व नहीं है। इसलिये अनुव्यवसाय, स्मृति, शाब्दज्ञान आदि को अनुमितित्व नहीं है।

**विवरण—**जिस ज्ञान से 'अनुमिति' नामक यथार्थ ज्ञान (प्रमा) होता है वह ज्ञान 'अनुमान' नाम का द्वितीय प्रमाण है। यहाँ पर 'अनुमान' नामक दूसरे प्रमाण का लक्षण किया है। इसलिये 'अनुमितिकरण' यह अनुमान-प्रमाण का लक्षण है और 'अनुमान' यह लक्ष्य है। 'अनुमीयते-अनेन इति अनुमानम्' जिस ज्ञान के कारण अग्न्यादिकों का अनुमान किया जाता है, जिस व्याप्तिज्ञान से अनुमिति-प्रमा पैदा की जाती है वह (व्याप्तिज्ञान) अनुमान है। इस रीति से व्युत्पन्न 'अनुमान' पदार्थ लक्षण है और अव्युत्पन्न (रूढ़) अनुमान शब्दार्थ, लक्ष्य है। 'व्याप्तिज्ञान' रूप अर्थ में जब 'अनुमान' शब्द व्युत्पन्न रहता है तब वह अनुमान नामक द्वितीय प्रमाण का


१. निरूप्यते स्वरूप-लक्षण-फलैर्ज्ञाप्यते ।
२. व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिप्रकारक-ज्ञानत्वेन । तृतीयाविभक्त्यर्थः अवच्छिन्नत्वम् । तस्य व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकतायामन्वयः । व्याप्तिप्रकारकज्ञानस्य जनकत्वञ्च व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वेन, नान्येनरूपेणेति व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वं व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकताया अवच्छेदकम्, व्याप्तिज्ञाननिष्ठं जनकत्वञ्च अवच्छेद्यम् । तथा च 'व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वावच्छिन्नव्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकता-निरूपित-जन्यतावज्-ज्ञानत्वमनुमितित्वम्' इति अनुमितेर्लक्षणम् ।
३. व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायादेः तत्त्वेन व्याप्तिज्ञानत्वेन तज्जन्यत्वाभावात् अर्थात् व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्नजनकतानिरूपित-जन्यतावज्ज्ञानत्वाभावात् । व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायं प्रति व्याप्तिज्ञानस्य विषयत्वेनैव कारणत्वात् तत्र विषयत्वावच्छिन्न-जनकता-निरूपित-जन्यतावज्ज्ञानत्वसत्त्वात् नानुमितित्वम् ।

. अनुमितिलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १४९

लक्षण होता है और लोकप्रसिद्ध 'अनुमान' उस लक्षण का लक्ष्य रहता है। अर्थात् व्युत्पन्न अनुमान, लक्षण और अव्युत्पन्न (रूढ़) अनुमान, लक्ष्य है।

अब 'अनुमति-करण' यहाँ अनुमिति-प्रमा का लक्षण बताते हैं 'व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्या अनुमितिः—व्याप्तिज्ञानत्व से (विषयत्वादिरूप से नहीं) युक्त व्याप्तिज्ञान से जो प्रमा होती है, वह अनुमिति-प्रमा है। 'यह घट है' इस घटज्ञान में 'घटत्व' प्रकार है, इसलिये इस ज्ञान को घटत्वप्रकारक-घटज्ञान कहते हैं। इसी तरह 'यह व्याप्ति' इस ज्ञान में 'व्याप्तित्व' प्रकार है, इसलिए इस व्याप्तिज्ञान को व्याप्तित्वप्रकारकज्ञान कहते हैं। इसी प्रकार 'धूम वह्निव्याप्य है' इत्याकारक व्याप्तिप्रकारक-ज्ञान में 'व्याप्ति' प्रकार है। ऐसे व्याप्तिज्ञानत्वेन रूपेण जो व्याप्ति-ज्ञान-जन्य ज्ञान हो उसे अनुमितिज्ञान कहते हैं। 'धूम वह्निव्याप्य है' जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि रहती है—यह व्याप्ति का सामान्य उदाहरण है। ऐसे व्याप्तिज्ञानत्वेन रूपेण व्याप्तिज्ञान से जो ज्ञान होता है वह अनुमितिज्ञान है। अन्यथा 'यह व्याप्ति है' इस व्याप्ति के (व्याप्तिविषयक) ज्ञान से भी 'पर्वत वह्निमान् है' यह ज्ञान होने लगेगा। परन्तु होता नहीं है। इसलिये 'व्याप्तिज्ञानत्वेन' का अर्थ 'व्याप्तिकारक-ज्ञानत्वेन' विवक्षित है।

शंका—'धूम, वह्निव्याप्य है' यह व्याप्तिप्रकारक-ज्ञान 'पर्वत वह्निमान् है' इस अनुमति के प्रति जैसे कारण होता है वैसे ही व्याप्तिज्ञान का अनुव्यवसाय, स्मृति, ध्वंस आदि के प्रति भी कारण है (वे भी व्याप्तिज्ञानजन्य हैं) अतः अनुमिति का लक्षण उनमें अतिव्याप्त होता है। क्योंकि 'मैं वह्निव्याप्य धूमवान् पर्वत को जानता हूँ' यह 'अनुव्यवसाय'-ज्ञान है। इन्द्रियों से होनेवाला जो प्रथम ज्ञान है, वह 'व्यवसाय ज्ञान' कहलाता है और पश्चात् होनेवाला तद्विषयक-मानसज्ञान, अनुव्यवसाय-ज्ञान कहलाता है। इस व्याप्तिज्ञान के अनुव्यवसाय में व्यवसाय-ज्ञान कारण है (उसे व्याप्तिज्ञानजन्यत्व है) इसलिए 'व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्य-ज्ञान को अनुमिति-ज्ञान कहा जाता है'—यह अनुमति-ज्ञान का लक्षण, व्याप्तिज्ञान के अनुव्यवसाय-ज्ञान में अतिव्याप्त होता है।

**समाधान—**यद्यपि यह सच है कि व्याप्ति का 'अनुव्यवसाय' व्याप्तिज्ञानजन्य होता है। तथापि उस अनुव्यवसाय-ज्ञान में जो जन्यत्व है, उस जन्यत्व से निरूपित (उस जन्यत्व से ज्ञात होने वाला) जो व्याप्तिज्ञान में कारणत्व है, वह व्याप्तिज्ञान के विषयत्व रूप से होता है। व्याप्तिज्ञानत्व के रूप से नहीं होता। उसी प्रकार व्याप्तिज्ञानजन्य स्मृति, शाब्दबोध, उसका ध्वंस आदिकों को भी व्याप्तिज्ञानजन्यत्व होने पर भी उनमें व्याप्तिज्ञान, विषयत्व-रूप से उनका कारण होता है। व्याप्तिज्ञानत्व रूप से नहीं होता। 'यह घट' इस ज्ञान में 'घट' उस ज्ञान का विषय होता है और विषयत्व-रूप से उस ज्ञान का जनक होता है। ज्ञानत्व-रूप से जनक नहीं होता। उसी प्रकार पूर्वोक्त अनुव्यवसायादि ज्ञान, व्याप्तिज्ञानजन्य होने पर भी व्याप्तिज्ञान का

१५० | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमितिकरणम्

उनके साथ विषयत्व, प्रतियोगित्वादि रूप से सम्बन्ध रहता है । ज्ञानत्व-रूप से उसे उनका जनकत्व नहीं होता । इसलिए उक्त अनुमितिलक्षण की अनुव्यवसायादि में अतिव्याप्ति नहीं है । अनुमिति का 'व्याप्तिज्ञानजन्या' इतना ही लक्षण यदि किया होता तो उस लक्षण की अनुव्यवसाय आदि में अतिव्याप्ति हुई होती । परन्तु 'व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्या' इतना कहने के कारण ( लक्षण में 'व्याप्तिज्ञानत्वेन' यह पद जोड़ने के कारण ) लक्षण पर अतिव्याप्ति दोष नहीं आने पाता !

'ज्ञानं प्रति विषयस्य कारणत्वम्' किसी भी ज्ञान में उसका विषय कारण होता है—यह नियम है । इस नियम के अनुसार 'व्याप्तिज्ञान' अपने अनुव्यवसाय का 'विषयत्व' धर्म से कारण होता है। वह अपनी स्मृति का भी 'समान-विषयक-अनुभवत्व' धर्म से कारण होता है। वह अपने ध्वंस का भी 'प्रतियोगित्व' धर्म से कारण होता है। 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से कारण नहीं होता । वह ( व्याप्तिज्ञान ) तो 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से केवल अनुमिति को ही उत्पन्न करता है । इसलिये पूर्वोक्त अनुव्यवसायादिकों में इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती ।

'दण्ड' पदार्थ इन्धनत्व ( काष्ठत्व ) धर्म से ( रूप से ) यद्यपि ज्वलन ( जलना ) क्रिया में कारण होता है, तथापि 'घट' का कारण अपने 'दण्डत्व' धर्म से ही होता है । वहाँ दण्ड की कारणता का अवच्छेदक धर्म दण्डत्व है, इन्धनत्वादि नहीं । इसी प्रकार व्याप्तिज्ञान में जो अनुमिति-कारणत्व है, वह 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से ही है । विषयत्वादि धर्मों से ( रूपों से ) नहीं । अर्थात् यहाँ कारणतावच्छेदक व्याप्तिज्ञानत्व है । इससे उक्त लक्षण पर अतिव्याप्ति दोष नहीं है ।

अनुमिति के कारण को अनुमान कहते हैं । परन्तु अनुमिति का करण क्या है ? ऐसी आकांक्षा होने पर अग्रिम ग्रन्थ से उसका समाधान करते हैं—

अनुमितिकरणं च व्याप्तिज्ञानं । तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः,

१. अनुमितिकरणरूपमनुमानं निरूपयति—'अनुमितिकरणमि'ति । अनुमितिरूपायाः प्रमायाः करणं व्याप्तिज्ञानमेव । अर्थात् 'साध्याभाववदवृत्तिर्हेतु'रित्याकारकं व्याप्तिज्ञानम् । अथवा 'यावत्साधनाश्रयाश्रित-साध्यसमानाधिकरणो हेतु'रित्याकारकं ज्ञानम् । तत्र यदा साध्याभाववदवृत्तिर्हेतुरिति ज्ञानं भवति, तदा हेतौ साध्याभाववद्वृत्तित्वरूपाया व्याप्तेर्ज्ञानं भवति, हेतोः साध्याभाववदवृत्तिरूपतया तत्र साध्याभाववदवृत्तित्व-धर्मस्य सत्त्वात् । यदा तु 'यावत् साधनाश्रयाश्रितसाध्यसमानाधिकरणो हेतु'-रिति ज्ञानं भवति, तदापि हेतौ तादृशसमानाधिकरण्यरूपाय व्याप्तेर्ज्ञानं भवति, हेतोस्तादृशसाध्य-समानाधिकरणरूपतया तत्र तादृशसाध्यसामानाधिकरण्यस्य सत्त्वात् । एतेन ज्ञायमानस्य लिङ्गस्य अनुमितिकरणत्वे अतीतादिलिङ्गकानुमितेरुच्छेदापत्तेः, अतीतादिलिङ्गस्य तदानीमविद्यमानत्वेन ज्ञायमानत्वाभावात् । विद्यमानस्यैव ज्ञानविषयीभूतस्य ज्ञायमानत्वात् ।

२. तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः व्याप्तिसंस्कारः कार्य-कारणयोर्व्याप्तिज्ञानाऽनुमित्यो-

परामर्शखण्डनम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५१

न¹ तु तृतीय-लिङ्गपरामर्शोऽनुमितौ करणम्, तस्यानुमितिहेतुत्वा-ऽसिद्ध्या तत्करणत्वस्य दूरनिरस्तत्वात् ।

अर्थ— व्याप्तिज्ञान, अनुमिति-करण ( साधन ) है, और उसका ( व्याप्ति-ज्ञान का ) संस्कार, अवान्तर व्यापार है । तृतीय ( तीसरा ) लिंगपरामर्श, अनुमिति का करण नहीं है । क्योंकि उसमें अनुमिति का हेतुत्व ( कारणत्व ) ही असिद्ध है । इसलिये असाधारणकारणत्वरूप करणत्व दूरनिरस्त ( अत्यन्त खण्डित ) होता है ।

विवरण— 'धूम वह्निव्याप्य है' इत्याकारक व्याप्तिज्ञान ही अनुमिति का करण है । अर्थात् व्याप्तिज्ञान ही अनुमान है ।

शंका— आपने पहले 'अनुमिति, व्याप्तिज्ञानजन्य है' कहा था, जिससे व्याप्ति-ज्ञान, अनुमिति का कारण है—यह अर्थ निष्पन्न होता है । और अब व्याप्तिज्ञान को अनुमिति का करण बताया जा रहा है । ये दोनों बातें कैसे संगत हो सकती हैं ? ( एक ही को कारणत्व तथा करणत्व कैसे हो सकता है ? ) ।

उत्तर— कारणत्व और करणत्व—ये दोनों यदि परस्पर विरोधी होते तो एक ही व्याप्ति ज्ञानको कारण तथा करण नहीं कहा जा सकता था । परन्तु ये दो धर्म ( कारणत्व-करणत्व ) परस्पर विरोधी नहीं हैं । किन्तु करणत्व, कारणत्व का ही एक विशेष है । क्योंकि असाधारण कारण को ही करण कहते हैं । जैसे एक ही ब्राह्मण पर ब्राह्मणत्व और परिव्राजकत्व रहता है वैसे ही एक ही व्याप्ति-ज्ञान पर कारणत्व तथा

मध्यवर्ती व्यापारः । व्याप्तिसंस्कारस्य व्याप्तिज्ञानजन्यत्वात् व्याप्तिज्ञानजन्याऽनुमिति-जनकत्वाच्च युक्तं तस्य व्यापारत्वम् । 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनको व्यापारः' इति तल्लक्षणात् । एवञ्च सति व्याप्तिज्ञानस्य अनुमितिकरणत्वं नानुपपन्नम् । व्याप्तिसंस्कार-रूप-व्यापारद्वारैव तस्यानुमितिजनकत्वात् ।


१. तृतीयलिङ्गपरामर्शस्य अनुमितिकरणत्वं प्राचीनैरुक्तम् । तथा चोक्तं न्याय-वार्तिके—"वयन्तु पश्यामः सर्वमनुमानम्, अनुमितेस्तन्नान्तरीयकत्वात् । प्रधानोप-सर्जनताविवक्षायां लिङ्गपरामर्श इति न्याय्यम्" किन्तु मीमांसकानां वेदान्तिनाञ्च तन्न सम्मतम् । महानसादौ दृष्टान्ते हेतौ साध्यव्याप्तिप्रत्यक्षदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तत्प्रथमम् । 'पर्वतो धूमवान् इत्याकारकपक्षधर्मता-ज्ञानदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तद् द्वितीयम् । वह्निव्याप्य-धूमवान् पर्वतः इत्याकारक-परामर्शज्ञानदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तदेव तृतीय-लिङ्गपरामर्श इत्युच्यते । स च अनुमितौ न करणम् । यतः अशेषसाधना-श्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यरूपस्य व्याप्तिवैशिष्टयस्य पर्वतीय धूमे ग्रहणाऽसंभ-वात्, महानसीयधूमे एव धूमत्वेन रूपेण गृहीतव्याप्तिसंस्कारस्यैव हि पक्षधर्मताज्ञान-सहितस्य अनुमितिंप्रति कारणत्वं मीमांसकैर्वेदान्तिभिश्चाङ्गीक्रियते । अतो व्याप्ति-विशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं नानुमितिकारणम् । पक्षधर्मताज्ञान-संस्कारयोरेव अनुमितिहेतुत्वम्, न लिङ्गपरामर्शस्येति विज्ञेयम् ।

१५२ वेदान्तपरिभाषा [ परामर्शखण्डनम्

करणत्व इन अविरोधी धर्मों के रहने में कोई दोष नहीं है। इसीलिए हम 'दण्ड घट में कारण है' और 'दण्ड से घट को उत्पन्न करता है' इत्यादि व्यवहार करते हैं। इस कारण एक ही पदार्थ को कारण और करण कह सकते हैं।

प्राचीन नैयायिक अनुमिति के प्रति लिङ्ग (हेतु = धूमादि) को ही कारण मानते हैं। परन्तु यह उचित नहीं है। क्योंकि जहाँ लिंग (हेतु) प्रत्यक्ष योग्य नहीं होता वहाँ परामर्श को व्यापारत्व संभव नहीं होता। अर्थात् व्यापार के न होने से लिग को करणत्व भी नहीं मान सकते। क्योंकि 'व्यापारवत् (व्यापारयुक्त) जो 'असाधारण कारण' उसे ही 'करण' संज्ञा है। सिवाय धूलि में धूम का भ्रम होने से 'पर्वत वह्निमान् है' ऐसी अयथार्थ अनुमिति होती है। यहाँ पर लिंग के न होते हुए भी अनुमिति हुई। इसलिए 'लिंग अनुमिति में करण है' नहीं कहा जा सकता। केवल धूम का ज्ञान हुआ और व्याप्तिज्ञान (व्याप्ति-स्मृति) नहीं हुआ, अर्थात् केवल पर्वत धूमवान् है, पर्वत पर धूम है—एतावन्मात्र ज्ञान होने से 'वह वह्निमान् है' यह अनुमिति नहीं होती। और प्रत्यक्ष के अयोग्यहेतुक स्थल में किसी व्यापार का भी सम्भव नहीं। इसलिए लिंगज्ञान को भी करण नहीं माना जा सकता। परामर्श, अनुमिति में करण क्यों नहीं? इसे ग्रन्थकार आगे बतावेंगे। अतः व्याप्तिज्ञान, अनुमिति-करण (अनुमान) है—कहने से लिंग, लिंगज्ञान, और लिंगपरामर्श को ही अनुमितिकरणत्व है—माननेवाले नैयायिक-वैशेषिकों का खण्डन हो गया।

शंका—आपने 'व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति करण है' बताया। परन्तु यहाँ व्यापार कौन सा है? क्योंकि 'जो असाधारण, व्यापार से युक्त रहता है उसे ही करण कहते हैं।' व्याप्तिज्ञान में व्यापार कौन सा है, समझ में नहीं आता।

समाधान—अन्तःकरण पर रहनेवाला व्याप्तिज्ञान का संस्कार ही मध्यवर्ती व्यापार है। तस्मात् व्याप्तिसंस्कार से युक्त होने के कारण व्याप्तिज्ञान करण है, अर्थात् व्याप्ति-ज्ञान, संस्कार द्वारा अनुमिति में करण होता है।

परन्तु नैयायिक तृतीय लिंगपरामर्श को ही अनुमिति के प्रति 'करण' कहते हैं। महानस में जब धूम और अग्नि की व्याप्ति ज्ञात होती है तब धूम का जो ज्ञान होता है, वह प्रथम लिंगज्ञान (हेतुज्ञान = धूमज्ञान) है। उसके बाद वह व्यक्ति वन में जाता है। वहाँ उसे पर्वत पर धूम दीखता है—यह द्वितीय लिंगज्ञान है। और उसके बाद 'यह पर्वत वह्निव्याप्य धूमवान् है' ज्ञान होता है, इसमें भी 'धूम' विषय है। इसलिये यह तृतीय लिंगज्ञान है। और यही परामर्श कहलाता है। इसके अनन्तर अग्रिम क्षण में ही 'पर्वत वह्निमान् है' अनुमिति होती है। इसलिए यह तृतीय लिंगपरामर्श (वह्निव्याप्यत्व = व्याप्ति रूप धर्म से पर्वतनिष्ठ धूमज्ञान) ही अनुमिति का करण है—यह मानना होगा। इनके मत में 'जो असाधारण कारण हो वही करण है' ऐसा करण का लक्षण में मध्य में (बीच में) व्यापार नहीं मानते।

परामर्शखण्डनम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५३


तात्पर्य यह है कि—प्रथमतः 'पर्वत धूमवान् है' यह ज्ञान होता है। अनन्तर 'जहाँ धूम रहता है वहाँ अग्नि भी रहती है' अर्थात् धूम वह्निव्याप्य है—इस प्रकार व्याप्ति का स्मरण होता है।

तदनन्तर 'व्याप्तिविशिष्ट (व्याप्ति से युक्त) धूम पर्वत पर है, इस प्रकार तृतीय ज्ञान होता है—यही लिङ्गपरामर्श है। तदनन्तर उत्तर क्षण में ही अनुमिति होती है। इसलिये यह तृतीय लिङ्गपरामर्श ही अनुमितिकरण (अनुमान) है।

परन्तु नैयायिकों का यह सिद्धान्त ठीक नहीं है। क्योंकि पक्षधर्मताज्ञान ('पर्वत धूमवान् है' इस प्रकार पक्षपर हेतु का ज्ञान) से महानस में गृहीत व्याप्तिज्ञान का संस्कार उद्बुद्ध (जागृत) होता है, तदनन्तर व्याप्ति का स्मरण होते ही वह्नि की अनुमिति होती है। परन्तु लिङ्गज्ञान या पक्षधर्मताज्ञान होकर भी यदि व्याप्ति का स्मरण न हुआ तो अनुमिति नहीं होती। इस अन्वय-व्यतिरेक से (संस्कार उद्बुद्ध होने पर व्याप्तिस्मरण यदि हुआ तो अनुमिति होती है। इस अन्वय और संस्कारोद्बोध के अभाव में अनुमिति नहीं होती, यह व्यतिरेक) अनुमिति में व्याप्तिज्ञान ही कारण है, 'परामर्श' अनुमिति में कारण नहीं है, यह सिद्ध होता है। क्योंकि 'परामर्शसत्त्वे अनुमितिः, परामर्शाभावे अनुमित्यभावः' परामर्श होने पर ही अनुमिति होती है, और उसके न होने पर नहीं होती, इस प्रकार परामर्श के विषय में अन्वयव्यतिरेक नहीं दिखाये जा सकते। क्योंकि जब पक्षधर्मता-ज्ञान और व्याप्तिज्ञान के कारण ही अनुमिति होती है तब बिना परामर्श के भी वह होती है—यह अनुभव है। इस कारण व्यतिरेकव्यभिचार हो जाता है। इसलिये परामर्श को अनुमिति का कारण नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में उसे, करण (असाधारण कारणस्वरूप) कहना कैसे सम्भव है? 'कारण' शब्द सामान्य कारण का वाचक है और उनमें से जो असाधारण हो उसे ही 'करण' संज्ञा है। अर्थात् 'कारणत्व' व्यापक (करणत्व को अपेक्षा अधिक देश में रहनेवाला) धर्म है और 'करणत्व' उसका व्याप्य (कारणत्व को अपेक्षा न्यून देश में रहनेवाला) धर्म है और व्यापक नहीं होता वहाँ व्याप्य भी नहीं होता' अर्थात् परामर्श जब अनुमिति के प्रति कारण ही नहीं, तब वह कारण ही नहीं। तब वह 'करण' नहीं यह पृथक् कहना आवश्यक नहीं है।

जिस प्रकार लिङ्गपरामर्श अनुमिति के प्रति करण नहीं, उसी प्रकार ज्ञायमान (ज्ञात होनेवाला) लिङ्ग (हेतु) भी अनुमिति के प्रति करण नहीं हो सकता अर्थात् मूलस्थ 'तृतीय लिङ्गपरामर्श' शब्द, ज्ञायमान लिङ्ग का उपलक्षक है। ज्ञान में विषय होनेवाला लिङ्ग ही अनुमिति के प्रति करण है, ऐसा मानने पर 'पर्वतो वह्निमान् भविष्यद्धूमात्' (पर्वत वह्निमान् है क्योंकि उस पर अग्रिम क्षण में ही धूम उत्पन्न होगा) आदि स्थलों में सबको जो अनुमिति होती है वह नहीं होगी। क्योंकि उस समय वहाँ लिङ्ग नहीं है। इसलिये वहाँ पर उसके कारणत्व का व्यभिचार होता है। अतः उसमें करणत्व तो है ही नहीं। अतः प्राचीन नैयायिकों का यह मत ठीक नहीं है। इसलिये व्याप्तिज्ञान ही करण है।

१५४वेदान्तपरिभाषा[ व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम्

आपके कथनानुसार व्याप्तिज्ञान ही संस्कार द्वारा अनुमिति का कारण मान लिया जाय तो अनुमिति को संस्कारजन्य मानना होगा। और संस्कारजन्यज्ञान, स्मृतिरूप होने से, अनुमिति को भी स्मृति कहना होगा। इस आशङ्का का निराकरण करते हैं—

¹ न च संस्कार जन्यत्वेनाऽनुमितेः स्मृतित्वापत्तिः, ²स्मृति-प्राग-भाव ³स्य संस्का ⁴रमात्रजन्यत्वस्य वा स्मृतित्व-प्रयोजकतया संस्कार-ध्वंस-साधारण-संस्कारजन्यत्वस्य तदप्रयोजकत्वात् ।

अर्थ — अनुमिति को व्याप्तिज्ञान-संस्कारजन्य मान लिया जाय तो उस अनुमिति को 'स्मृति' कहना होगा। क्योंकि 'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' संस्कार से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को स्मृति कहते हैं—यह स्मृति का लक्षण अनुमिति पर घटित होता है। परन्तु यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि स्मृतिप्राग्भावजन्यत्व, या केवल संस्कार-जन्यत्व स्मृतित्व का प्रयोजक ( कारण ) माना गया है। इस कारण संस्कारध्वंस और स्मृति दोनों को साधारण ऐसा 'संस्कारजन्यत्व' रूप प्रयोजक, स्मृति का नहीं माना जा सकता।

विवरण — प्रथमतः महानस में व्याप्तिज्ञान होने पर, उसका अन्तःकरण पर सूक्ष्म संस्कार होता है। वही संस्कार पर्वत पर धूम के देखने पर उद्बुद्ध होता है, तदनन्तर व्याप्ति का स्मरणात्मक ज्ञान होता है ततः पश्चात् अनुमिति होती है यह क्रम है। इस क्रम को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्याप्तिज्ञान से संस्कार और संस्कार से अनुमिति होती है। अर्थात् अनुमिति में संस्कार कारण है।

परन्तु संस्कार को अनुमिति में कारण कहने पर 'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यह स्मृति का लक्षण अनुमिति में घटित हो जाने से अनुमिति को भी स्मृति कहना होगा। किन्तु यह अभीष्ट नहीं है। क्योंकि स्मृति, अनुभवरूप नहीं है, किन्तु अनुमिति अनुभव-रूप है, और 'मैंने कल वह्नि का अनुमान किया था' ऐसी अनुमिति की स्मृति,


१. संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिरिति स्मृतिलक्षणम् । तदा संस्कारजन्यत्वस्य अनुमितौ स्वीकारे अनुमितेरपि स्मृतित्वप्रसङ्गः इति शंकाकर्तुराशयः ।
२. स्मृति प्राग्भावजन्यज्ञानस्यैव स्मृतित्वनियमात् अनुमितेः स्मृतिप्राग्भावाऽजन्य-तया न स्मृतित्वम् ।
३. 'जन्यत्वस्य' इति पाठान्तरम् ।
४. स्मृतिप्राग्भावसाक्षात्कारस्य स्मृतिप्राग्भावजन्यतया स्मृतित्वापातादात्माश्रय-प्रसंगाच्चेति अरुच्या संस्कारमात्रजन्यत्वस्य प्रयोजकत्वमुच्यते । एवञ्च संस्कारेतरेन्द्रिय-सन्निकर्षाद्यसाधारणकारणाऽजन्यत्वे सति संस्कारजन्यत्वं स्मृतित्वप्रयोजकमुक्तम् । तेन अनुमिते लिङ्गज्ञानाद्यसाधारणकारणजन्यत्वान्न स्मृतित्वप्रसंगः इति समाधान-ग्रन्थस्याशयः ।

व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५५

अनुभवसिद्ध है। इसलिए व्याप्तिज्ञान, 'करण' है और संस्कार, 'अवान्तर व्यापार' है ऐसा आप भी नहीं कह सकते। अर्थात् आपके पक्ष में भी दोष है।

संस्कारजन्य ज्ञान को स्मृति कहते हैं—यह स्मृति का लक्षण गृहीत कर वादी ने यह शङ्का की थी। परन्तु 'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यह स्मृति का लक्षण नहीं हो सकता। क्योंकि वह स्मृति और संस्कारध्वंस दोनों के लिए साधारण है। अर्थात् वह लक्षण केवल स्मृति में ही घटित न होकर संस्कारध्वंस में भी घटित होता है। कारण, संस्कारनाश भी संस्कारजन्य ही होता है। संस्कार ही यदि नहीं होगा तो नाश किसका होगा ?

'ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वम्' ध्वंस में प्रतियोगी, कारण होता है—यह नियम है। अर्थात् अतिव्याप्ति दोष से दूषित होने के कारण 'संस्कारजन्यत्व' यह स्मृति का निर्दुष्ट लक्षण नहीं है। इससे यह सिद्ध हुआ कि 'संस्कारजन्यत्व' स्मृति का प्रयोजक नहीं है। इसीलिये अनुमति में संस्कारजन्यत्व होने पर भी 'स्मृतित्व' नहीं आ पाता। क्योंकि 'संस्कारजन्यत्व' स्मृति का लक्षण ही नहीं है।

'संस्कारजन्यत्व' यदि स्मृति में प्रयोजक नहीं है तो स्मृति में कौन प्रयोजक है ?

'स्मृतिप्रागभावजन्यत्व' या 'संस्कारमात्रजन्यत्व' को स्मृति का प्रयोजक समझना चाहिये।

प्रागभाव का अर्थ है—कार्य की उत्पत्ति से पूर्व स्थित, कार्य का अभाव। जिसका प्रागभाव रहता है उसी की उत्पत्ति होती है। इसलिये प्रत्येक कार्य में उसका प्रागभाव, कारण होता है। इस नियम के अनुसार स्मृति के प्रति भी उसका प्रागभाव कारण है ही। इस कारण--

स्मृतिप्रागभावजन्यत्व को ही स्मृति का प्रयोजक मानना पड़ता है। 'स्मृतिप्रागभावजन्यत्व' रूप स्मृतिलक्षण मानने पर संस्कारध्वंस में अतिव्याप्ति नहीं होती। क्योंकि संस्कारध्वंस, स्मृतिप्रागभावजन्य नहीं है, अपितु संस्कारजन्य है। इसलिये स्मृतिप्रागभावजन्यत्व ही स्मृतित्व में प्रयोजक है।

शंका--प्रत्येक कार्य के प्रति यदि उसका प्रागभाव कारण होता है तो प्रत्येक कार्य का 'तत्तत्प्रागभावजन्यत्व' ही लक्षण किया जाय। फिर किसी भी कार्य के प्रति दूसरा प्रयोजन मानने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। 'गो' का लक्षण 'गोप्रागभावजन्यत्व' ही करना चाहिये। तब प्रत्येक पदार्थ के भिन्न-भिन्न लक्षण जो किये गये हैं, वे सब व्यर्थ होंगे। ऐसी स्थिति में स्मृतिप्रागभावजन्यत्व को स्मृति का प्रयोजक कैसे माना जा सकता है ? सिवाय स्मृतिलक्षण स्मृतिघटित होने से आत्माश्रय दोष भी आता है।

समाधान—वादी का उपर्युक्त कथन ठीक है। इस अरुचि के कारण ही 'संस्कारमात्रजन्यत्वं वा' यह दूसरा स्मृतिप्रयोजक बताया गया है। इस पक्ष में कोई दोष नहीं आने पाता।

१५६ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम्

यद्यपि संस्कारध्वंस, संस्कारजन्य है तथापि संस्कारमात्रजन्य (केवल संस्कारजन्य) नहीं है। क्योंकि संस्कारध्वंस के प्रति चिरतरकालीन उद्बोधाभाव (चिरकाल तक संस्कारों का उद्बोध न होना) भी कारण होता है। परन्तु स्मृति को संस्कार के सिवाय किसी भी कारण की अपेक्षा नहीं होती। अनुमिति, लिङ्गज्ञानादि असाधारण कारणजन्य है अर्थात् संस्कारमात्रजन्य नहीं है। इसलिए उसे स्मृतित्व प्राप्त नहीं होता। 'संस्कारमात्रजन्यत्व' का अर्थ है कि संस्कार से जो अन्य, उससे जन्य न होकर केवल संस्कारजन्य। अनुमिति, संस्कारजन्य होने पर भी, संस्कार से भिन्न जो व्याप्ति-ज्ञान उससे भी वह उत्पन्न होती है। इसलिए अनुमिति को स्मृति नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों के लक्षण भिन्न-भिन्न हैं।

शंका—अनुमिति में स्मृतित्वापत्ति न होने पर भी आपके पक्ष में अन्यान्य दोष तो आते ही हैं। क्योंकि जब व्याप्तिस्मरण से अनुमिति होती है तब संस्कार, स्मृति को उत्पन्न कर नष्ट हो जाते हैं। परन्तु ऐसे स्थल में अनुमति का होना तो अनुभव-सिद्ध है। किन्तु आपके कथनानुसार संस्कार (व्यापार) तो वहाँ है नहीं। इस कारण संस्कारजन्यत्व व्यभिचरित होता है।

ग्रन्थकार इस शंका का अनुवाद कर समाधान करते हैं—

न च यत्र व्याप्तिस्मरणादनुमितिस्तत्र कथं^१ संस्कारो हेतुरिति वाच्यम्। व्याप्ति-स्मृतिस्थलेऽपि ^२तत्संस्कारस्यैवानुमितिहेतुत्वात्। न हि स्मृतेः सस्कारनाशकत्व-नियमः, स्मृतिधारादर्शनात्। न^३ चानुद्बुद्धसंस्कारादप्यनुमित्यापत्तिः, तदुद्बोधस्यापि सहकारित्वात्।

**अर्थ—**जहाँ व्याप्तिस्मरण से अनुमिति होती है वहाँ संस्कार को ही उसकी कारणता कैसे? यह शंका आपको नहीं करनी चाहिये। क्योंकि जहाँ व्याप्तिस्मृति से अनुमिति होती है वहाँ भी व्याप्ति के संस्कार को ही अनुमिति-हेतुत्व होता है। स्मृति को नियम से संस्कारनाशकत्व भी नहीं होता। अर्थात् स्मृति के प्रति कारणीभूत अनुभव-जन्य संस्कार का स्मृति उत्पन्न होने पर नाश होने का कोई नियम नहीं है। क्योंकि


१. कथं संस्कारो हेतुः अत्र अनुमितिपूर्ववर्तित्वाऽभावादित्यध्याहार्यम्।
२. संस्कारस्यैव व्याप्तिज्ञानजन्यसंस्कारस्यैव। एवकारेण व्याप्तिस्मृतिजन्य-सस्कारो व्यावत्यंते।
३. व्याप्तिसंस्कारो न व्यापारः, सत्यपि संस्कारे तदनुद्बोधे अनुमित्यनुदयाद् इति शंकाग्रन्थस्याशयः। उद्बुद्धसंस्कारस्यैव अनुमितिहेतुत्वान्न दोष इति समाधानग्रन्थस्याभिप्रायः। उद्बोधः अभिव्यक्तिः, फलजननाभिमुखत्वमित्यर्थः।

व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५७

धारावाहिक ( स्मृति का सतत होते रहना ) स्मृति का सभी को अनुभव है। यह भी शंका ठीक नहीं होगी कि 'स्मृति में संस्कारनाशकत्व यदि न मानें तो अनुद्बुद्ध ( उद्बुद्ध न हुए ) संस्कार से भी अनुमिति होने का प्रसंग आवेगा।'

क्योंकि स्मृति के प्रति संस्कारोद्बोध में भी सहकारि-कारणतया होने से स्मृति होने से पूर्व संस्कारोद्बोध होना ही चाहिये।

संस्कारोद्बोध का अर्थ है कि संस्कारों की जागृति = कार्योन्मुखत्व।

**विवरण—**व्याप्ति का स्मरण होने पर जहाँ अनुमिति होती है वहाँ संस्कार-जन्यत्व कहाँ है? इससे यह प्रतीत होता है कि संस्कारजन्यत्व व्यभिचरित है। क्योंकि व्याप्ति का स्मरण होने पर संस्कार का नाश हो जाता है। परन्तु ऐसी शंका करना ठीक नहीं।

क्योंकि व्याप्तिस्मृति से जहाँ अनुमिति होती है वहाँ भी हम व्याप्ति के संस्कार को ही अनुमिति में हेतु मानते हैं। क्योंकि 'स्मृति के होने पर उसके कारणभूत संस्कार नष्ट होते हैं' ऐसा सिद्धान्त हमारा नहीं है। इस कारण संस्कारजन्यत्व व्यभिचरित नहीं होता।

उपर्युक्त सिद्धान्त न मानने में दो कारण हैं—एक लाघव और दूसरा अनुभव। 'स्मृति होते ही पूर्व संस्कार नष्ट होते हैं।' यह मानने पर उसी विषय की पुनः स्मृति होने पर अग्रिम स्मृति में कारण होनेवाला दूसरा ही संस्कार मानना पड़ेगा। अग्रिम स्मृति होने पर पूर्वस्मृतिजन्य संस्कार भी नष्ट हो गया, तब तीसरी स्मृति के समय दूसरी स्मृति से उत्पन्न हुआ संस्कार मानना होगा। ऐसे अनन्त संस्कारों की कल्पना करने की अपेक्षा एक व्याप्ति संस्कार को ही अनुमिति के प्रति कारण मानने में लाघव है, और अनुभव भी ऐसा ही है। व्याप्ति के संस्कार से व्याप्ति का स्मरण होता है—यह अनुभव कहीं भी बाधित नहीं है। स्मृति परम्परा का अनुभव होने से स्मृति को संस्कार-नाशकत्व नहीं है। परन्तु तार्किक लोग 'स्मृति को उत्पन्न कर स्मृतिजनक संस्कार नष्ट हो जाता है, क्योंकि संस्कार स्मृति के लिए ही रहता है और स्मृति को उत्पन्न कर वह कृतकार्य हो जाता है। इस कारण संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति होने पर संस्कार का नाश होना अवश्यम्भावी है' ऐसा मानते हैं।

तार्किकों के इस ( स्मृति के होते हुए पूर्व संस्कार का नाश होता है ) अभ्युपगम के अनुसार यदि विचार किया जाय तो स्मृति परम्परा में द्वितीय, तृतीय स्मृति की उत्पत्ति का कोई कारण ही नहीं रहता। पहली स्मृति में कारण बने हुए एक संस्कार का नाश होने पर भी दूसरे संस्कार से स्मृति होगी' यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि इस पक्ष में अनन्त संस्कारों की कल्पना करनी पड़ती है, जो कि गौरव दोष से दूषित है। और ऐसा मानने में अनुभव या अन्य कोई प्रमाण भी नहीं है।

**शंका—**संस्कार-व्यक्तियों का आनन्त्य न होने पर भी उद्बोधक के सहित स्थित एक संस्कार से जो एक स्मृति उत्पन्न होती है, वह ही स्वयं नष्ट होते-होते दूसरे

१५८ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम्

संस्कार को उत्पन्न कर के नष्ट होती है । फिर वह उत्पन्न हुआ संस्कार उसने अग्रिम स्मृति को उत्पन्न करता है । इस प्रकार स्मृतिपरम्परा ( धारा ) का होना युक्तियुक्त होता है ।

समाधान—तार्किकों की यह कल्पना उचित प्रतीत नहीं होती । स्मृति के होते ही उसके कारणभूत संस्कार का नाश होता है ऐसी कल्पना करने की अपेक्षा जिस अनुभव से जो संस्कार उत्पन्न हुआ वही संस्कार, उद्बोधक निमित्त से युक्त होने पर उससे स्मृति उत्पन्न होती है । परन्तु उस संस्कार से उत्पन्न हुई स्मृति, अपने उत्पादक संस्कार का नाश नहीं करती, बल्कि उस स्वजनक संस्कार को अधिक दृढ़ करती है । अतः स्मृति, स्वजनक संस्कार का नाश करती है, ऐसी कल्पना करने की अपेक्षा वह स्वजनक संस्कार को दृढ़ करती है, ऐसी कल्पना करने में ही अतिशय लाघव है । कल सुने हुए शास्त्रार्थ का आज स्मरण होता है और उस स्मरण से पूर्व संस्कार दृढ़ होता है । इससे यह स्पष्ट है कि स्मृति, स्वजनक संस्कार का नाश नहीं करती । श्रुत-शास्त्रार्थ का स्मरण होने पर यदि उसके कारणभूत संस्कारों का नाश हुआ होता, और उस स्मृति के द्वारा अन्य नवीन ही संस्कार उत्पन्न किया होता तो शास्त्रार्थ में दृढ़त्व कैसे आता ?

शिवाय संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति, और स्मृति के होने पर उत्पन्न होनेवाले संस्कार के द्वारा ही स्मृति का नाश होता है, यह यदि माना जाय तो संस्कार को ही स्मृतिजनकत्व और उसका विनाशकत्व है, यह कहना होगा । इसी प्रकार स्मृति से उत्पन्न हुए संस्कार में ही स्मृतिजन्यत्व और नाश्यत्व है, यह भी कहना होगा । इस प्रकार अनेक विरुद्ध पदार्थों की कल्पना करनी पड़ती है । ‘स्मृति को संस्कारनाशकत्व है’ यह पक्ष श्रेयोवह नहीं है ।

‘संस्कार ही अनुमिति में हेतु है’ यह मानने पर उद्बुद्ध न हुए संस्कार से अनुमिति होने लगेगी—यह आशंका उचित नहीं है । क्योंकि पक्षधर्मताज्ञानजन्य संस्कार का उद्बोध होना भी अनुमिति में सहकारि-कारण है, अर्थात् उद्बुद्ध संस्कार से ही अनुमिति होती है ।

एवं¹ च अयं धूमवानिति पक्ष²धर्मताज्ञाने³न, धूमो⁴ वह्निव्याप्य


१. एवं च—अनुमिति परामर्शस्य कारणत्वे निराकृते उद्बुद्धसंस्कारस्य कारणत्वे सिद्धे च । ‘पर्वतो वह्निमान्’ इत्यनुमितौ असाधारणकारणस्य पक्षधर्मताज्ञानस्य आकारः ‘अयं धूमवान्’ इति ।
२. पक्षधर्मताज्ञाने—पक्षस्य धर्म एव पक्षधर्मता, स्वार्थे ‘तल्’ प्रत्ययः । सा च धूमादिरूपलिङ्गवत्ता, तस्या ज्ञाने अर्थात् लिङ्गप्रकारक-पक्षविशेष्यकज्ञाने । अत एव—‘अयं धूमवान्’ इत्याकारः प्रदर्शितः ।
३. ‘ने धूमोः’ इति पाठान्तरम् ।
४. अनुमितौ द्वितीयमसाधारणं कारणं दर्शयति ‘धूमो वह्निव्याप्यः’ इति महान-

व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५९

इत्यनुभवाहितसंस्कारोद्बोधे च सति, वह्निमानित्यनुमितिर्भवति, न तु मध्ये व्याप्तिस्मरणं तज्जन्य¹वह्निव्याप्य धूमवानित्यादि²विशेषणविशिष्टं ज्ञानं वा हेतुत्वेन कल्पनीयम्, गौरवात् मानाभावाच्च ।

अर्थ--इस प्रकार 'यह धूमवान् है' ऐसा पक्षधर्मताज्ञान होने पर और 'धूम वह्निव्याप्य है' इस अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कार का उद्बोध होने पर 'वह्निमान्' इत्याकारक अनुमिति होती है । परन्तु पक्षधर्मताज्ञान और अनुमितिज्ञान इन दोनों में व्याप्ति का स्मरण या तज्जन्य ( व्याप्तिजन्य ) वह्निव्याप्य धूमवान् इत्यादि विशेषण-विशिष्ट ज्ञान, इनमें से किसी की भी अनुमिति के प्रति हेतुरूप से कल्पना करना योग्य नहीं है । क्योंकि कल्पना करने में गौरव दोष है तथा कोई प्रमाण भी नहीं है ।

विवरण--पूर्वोक्त प्रकार से व्याप्तिज्ञान में अनुमिति का करणत्व है । और व्या-प्तिज्ञान का संस्कार, व्यापार है । तथा पक्षधर्मताज्ञानजन्य-संस्कारोद्बोध, सहकारी है । इतना होनेपर 'यह पर्वत वह्निमान् है' ऐसी अनुमिति होती है ।


सादिषु धूमे हेतौ साध्यसहचारदर्शनात् साध्यव्यभिचाराऽदर्शनाच्च साध्यसामानाधि-करण्यरूपाया व्याप्तेरनुभवो जायते, तेन तद्विषयकः संस्कारो जन्यते । अथ तद्व्या-प्तिसंस्कारवतः पुरुषस्य लिङ्गदर्शनात् तत्संस्कारस्य असाधारणकारणत्वं प्रदर्शितम् । तथा च 'पर्वतो धूमवान्' इति पक्षधर्मताज्ञाने 'धूमो वह्निव्याप्यः' इति व्याप्ति-संस्का-रोद्बोधे च सति 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यनुमितिर्जायते इति मध्ये (पक्षधर्मताज्ञानानु-मित्योर्मध्ये) व्याप्तिस्मरणं (धूमो वह्निव्याप्यः-इत्याद्याकारकं स्मरणं) तज्जन्यं व्याप्तिस्मरणजन्यं इत्यादि विशिष्टज्ञानं (वह्निव्याप्य धूमवानयं पर्वत: इत्याद्याकारकं परामर्शज्ञानं) न कल्पनीयमिति निष्कर्षः । अत्र च १-पक्षधर्मताज्ञानं २-व्याप्तिसंस्का-रोद्बोधः इति कारणद्वयादेव अनुमितिः, व्याप्तिसंस्कारोद्बोधस्तु धूमज्ञानमात्रेणैव, न तु पक्षधर्मताज्ञानेन । अत एव पक्षधर्मताज्ञानव्याप्तिसंस्कारयोर्द्वयोरेवानुमितिकारणत्व-मिति लघुचन्द्रिकायामुक्तम् ।

नैयायिकास्तु--व्याप्तिज्ञानं, व्याप्तिस्मरणं, पक्षधर्मताज्ञानं, लिङ्गपरामर्शश्च अनु-मितिसामग्रीति मन्यन्ते । पक्षधर्मताज्ञानोद्बुद्धसंस्कारेतिसामग्रीद्वितयेनानुमित्युपपत्तौ अधिकसामग्रीकल्पने गौरवं बाधकम् । यदि व्याप्तिस्मरणस्य परामर्शज्ञानस्य चानुमिति-हेतुत्वं प्रामाणिकं भवेत् तदा तद्गौरवं प्रामाणिकत्वादबाधकं भवेदपि । किन्तु व्याप्ति-स्मरणादेरनुमितिहेतुत्वे किञ्चित् प्रमाणं नास्ति । तस्मात् अप्रामाणिकगौरवस्य बाधक-त्वमुचितमेवेत्यवगन्तव्यम् ।


१. 'न्यं'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'दि विशिष्टज्ञानं वा०'- इति पाठान्तरम् ।

१६० | वेदान्तपरिभाषा | [ पर्वतांशे प्रत्यक्षत्वम्

इस कारण पूर्वोक्त अनुमिति की सामग्री और अनुमिति इन दोनों में गौरव दोष के तथा प्रमाणाभाव के कारण परामर्श आदि की कल्पना की आवश्यकता नहीं है। 'पर्वतो वह्निमान्' इसे एक ही अनुमित्यात्मक ज्ञान समझने वालों के निराकरणार्थ सिद्धान्ती कहता है—

तच्च^१ व्याप्तिज्ञानं वह्निविषयक^२ज्ञानांश एव करणम्, न तु पर्वतविषयक^३ज्ञानांश इति। पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानस्य वह्न्यंश एवाऽनुमितित्वं न पर्वताद्यंशे, तदंशे प्रत्यक्षत्वस्योपपादितत्वात्।

**अर्थ—**और वह व्याप्तिज्ञान वह्निविषयक ज्ञान अंश में ही करण है, पर्वतविषयक ज्ञान अंश में नहीं। इसलिये 'पर्वतवह्निमान् है' इस ज्ञान को वह्नि अंश में ही अनुमितित्व है, पर्वत आदि अंश में नहीं। पर्वत आदि अंश में उस ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। यह यह हमने प्रत्यक्षपरिच्छेद में उपपादन किया है।

**विवरण—**प्रत्यक्ष परिच्छेद में—जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष, इन्द्रियसन्निकृष्ट रहता है उस अनुमितिज्ञान में अनुमित वह्नि-आदि अंश में ज्ञान को अनुमितित्व रहता है और इन्द्रियसन्निकृष्ट पर्वत आदि अंश में प्रत्यक्षत्व रहता है—उपपादन किया है। 'मैं पर्वत को देखता हूँ और वह्नि का अनुमान करता हूँ' यही अनुभव में आता है। इसलिये वहां अनुमिति और प्रत्यक्ष, दो प्रकार का ज्ञान मानना पड़ता है। जातित्व, उपाधित्व आदि तार्किकों की परिभाषा में कोई प्रमाण नहीं है, यह पीछे कह चुके हैं। इस कारण एक ही ज्ञान में अंश भेद से परोक्षत्व तथा अपरोक्षत्व के होने में कोई विरोध नहीं है।

उपर्युक्त उपपादन से 'अनुमिति में कारण व्याप्तिज्ञान है'—यह सिद्ध होने पर भी व्याप्ति का स्वरूप क्या है? यह प्रश्न पैदा होता है। इसलिये ग्रंथकार अग्रिम ग्रन्थ से से व्याप्ति का स्वरूप बताते हैं।


१. 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यस्य ज्ञानस्य अंशद्वयम्—एकः पर्वतविषयकत्वांशः, द्वितीयः वह्निविषयकत्वांशः। तत्र वह्निविषयकत्वांशे एव ज्ञाने व्याप्तिज्ञानं करणम्। न सन्निकृष्टपक्षकांशे पर्वताद्यंशे व्याप्तिज्ञानं करणम् व्याप्तिज्ञानाऽजन्यत्वात्, तस्य तु प्रत्यक्षत्वेन इन्द्रियजन्यत्वात्। एवं च पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं, वह्न्यंशे च अनुमितित्वम्। वह्निविषयकत्वांशे--पर्वतवह्निसम्बन्धांशे इत्यमरः। तदुक्तं शास्त्रदीपिकायाम्—"यथा दध्ना जुहोति इति विशिष्टविषयोऽपि विधिः विशेषणपरो भवति तथैव इहापि विशिष्टविषयमेव अनुमानं विशेष्य-विशेषणयोः प्राप्तत्वात् सम्बन्धविषयं भवति।" २. 'कत्वांश एव कारणम्'—इति पाठान्तरम्। ३. 'कत्वांश इति'—इति पाठान्तरम्।

व्याप्तिलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १६१

व्याप्तिश्च^१ अशेष-साधनाश्रयाश्रित-साध्य-सामानाधिकरण्यरूपा । सा च व्यभिचारादर्शने सति सहचारदर्शनेन गृह्यते । तच्च सहचारदर्शनं भूयो दर्शनं सकृद्दर्शनं वेति^२ विशेषो नादरणीयः, सहचारदर्शनस्यैव प्रयोजकत्वात् ।

**अर्थ—**अशेष साधनों का जो आश्रय, तदाश्रित जो साध्य, उससे हेतु का जो सामानाधिकरण्य—यही व्याप्ति है। और उस व्याप्ति का ग्रहण, व्यभिचार के अदर्शन के साथ सहचार के दर्शन से होता है। उस सहचारदर्शन में भूयोदर्शन या सकृद्दर्शन रूप विशेष का कोई आदर नहीं है क्योंकि उस व्याप्ति में प्रयोजक सहचारदर्शन ही है।

**विवरण—**व्याप्तिस्वरूप क्या है? यह प्रश्न है। उसका उत्तर यह है कि—'अशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यम्' इसका अर्थ इस प्रकार है—अशेष = समस्त, साधन = धूम, के आश्रय = पर्वत आदि, के आश्रित = अग्न्यादि साध्य, के साथ हेतु (धूम) का सामानाधिकरण्य हो जिसका रूप है, वह व्याप्ति है। इसी का निकृष्ट लक्षण इस प्रकार है—'साधनतावच्छेदकावच्छिन्नसाधनाश्रयाश्रितसाध्यतावच्छेदकावच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यरूपा'। इस लक्षण का समन्वय इस प्रकार होगा। 'वह्निमान् धूमात्'—इस अनुमिति में धूम, साधन है। साधनता, धूमनिष्ठ है। साधनता का अवच्छेदक धूमत्व है। उस धूमत्व से अवच्छिन्न (पर्वत, चत्वर आदि भिन्न-भिन्न स्थान के साधनरूप) धूम व्यक्तियाँ हैं। उनकी आश्रय पर्वत आदि पदार्थ हैं, उन्हीं का आश्रय की हुई, साध्यतावच्छेदकरूप वह्नित्व से अवच्छिन्न वह्नित्वरूप साध्य व्यक्तियों, के साथ धूमव्यक्तियों का सामानाधिकरण्य (पर्वतादि समान अधिकरण पर वृत्तित्व) होना ही व्याप्ति का स्वरूप है। अर्थात् पर्वत आदि पक्ष पर, धूम और अग्नि का होना 'यत्र-यत्र धूमः तत्र-तत्र वह्निः' इस आकार का जो सामाधिकरण्य (एकाधिकरणवृत्तित्व) वही व्याप्ति का स्वरूप है। इस प्रकार व्याप्ति का लक्षण करने से, किसी एक वह्न्यादि साधन व्यक्ति के आश्रय महानसादि में रहनेवाले किसी


१. ननु व्याप्तिज्ञानं न संभवति, व्याप्तिग्राहकाऽनिरूपणात् । न च तर्कः व्याप्तिग्राहकः, तर्कस्यापि व्याप्तिमूलकत्वेन तस्यापि तर्कापेक्षायामनवस्थानात् न च सहचारदर्शनं तद्ग्राहकम्, सकृत् असकृद् वा सहचारदर्शने सत्यपि व्यभिचारज्ञाने सति व्याप्तिग्रहाभावः, इत्यतो व्याप्तिस्वरूपं प्रतिपादयति साचेति ग्रन्थेन । व्यभिचाराज्ञाने साध्यवदन्यवृत्तित्वज्ञानाभावे सति । तस्मात् व्यभिचाराऽदर्शनसहकृत-सहचारदर्शनस्यैव व्याप्तिज्ञानहेतुत्वमवगन्तव्यम् । एतेन "कार्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न न दर्शनात् ।" इति बौद्धोक्तं तादात्म्य-तदुत्पत्त्योर्व्याप्तिग्राहकत्वं निराकृतं भवति ।
२. 'सकृद्दर्शनं भूयोदर्शनं वेति'-इति पाठान्तरम् ।
११ व० प०

१६२ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्याप्तिलक्षणम्

एक धूमादि साध्य का सामानाधिकरण्य ग्रहण कर 'पर्वतो धूमवान् वह्नेः' यह यदि किसी ने अनुमान किया तो वह्निरूप असद्हेतु में व्याप्तिलक्षण की अतिव्याप्ति होगी—ऐसी आशंका करने पर उसका निवारण इस प्रकार होगा—महानस में अग्नि है, इसलिये महानस उसका आश्रय है। महानस में उसके आश्रय से धूम भी रहता है। इसलिये महानस की अग्नि को साधन बनाकर और महानस के ही धूम को साध्य बनाकर उन दोनों का सामानाधिकरण्य है अर्थात् ये दोनों एक ही अधिकरण महानस में रहते हैं। इसी आधार पर जहाँ अग्नि वहाँ धूम, ऐसी व्याप्ति मानकर '(१) पर्वत धूमवान् है (२) क्योंकि उस पर अग्नि है' यह अनुमान यदि कोई करे तो इसमें अग्नि रूप हेतु सत् न होकर असत् है, क्योंकि वह्नि-व्याप्य धूम की तरह धूम-व्याप्य वह्नि नहीं है। अयोगोलक में (तपाकर लाल किये हुए लोहे के गोले में) अग्नि होता है, किन्तु धूम नहीं होता। इसलिए वह्नि सत् हेतु नहीं है, किन्तु व्यभिचारी है। यहाँ पर साधनतावच्छेदक (वह्नित्व) से अवच्छिन्न—समस्त वह्नियों के आश्रय महानस, पर्वत, तप्तायोगोलक आदि इनमें से आयोगोलक रूप आश्रय पर साध्यतावच्छेदक (धूमत्व) से अवच्छिन्न हुआ एक भी धूम नहीं है। इस कारण उनका (वह्नि और धूम का) पूर्वोक्त सामानाधिकरण्य नहीं दिखाया जा सकता। इसलिये व्याप्ति का लक्षण वह्निरूप असत् हेतु पर अतिव्याप्त नहीं है।

शंका—ऐसी व्याप्ति का ग्रहण किस प्रमाण से होता है ? तर्क से उसका ग्रहण नहीं हो सकता। क्योंकि व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप करना रूप जो तर्क है, वह व्याप्ति के अधीन है। सहचारदर्शन से भी व्याप्ति का ग्रहण नहीं हो सकता। क्योंकि दो पदार्थों का साहचर्य एक बार या बार-बार दीखने पर भी उसका (साहचर्य का) क्वचित् व्यभिचार भी दिखाई देता है। इस शंका का समाधान 'सा च०' ग्रंथ से किया है। व्यभिचार के अदर्शन के साथ सहचारदर्शन से उस व्याप्ति का ग्रहण किया जाता है।' जैसे धूम अग्नि का व्यभिचार दिखाई न देते हुए उनका सहचार दीखने से ही धूम-वह्नि-व्याप्य है, यह ज्ञान होता है। जहाँ धूम हो वहाँ अग्नि अवश्य ही होती है। धूम है और अग्नि न हो, यह कभी नहीं होता। इस रीति से धूम और अग्नि के व्यभिचार का अनुभव न आकर सहचार के अनुभव होने से ही धूम और अग्नि की व्याप्ति का ज्ञान हो जाता है। दो पदार्थों का नियमेन एकत्र दीखना ही सहचारदर्शन है। चाहे वह अनेक बार देखने से हुआ हो या एक बार के देखने से हुआ हो। केवल व्यभिचारशून्य सहचारदर्शन की आवश्यकता है अर्थात् जिनका सहचार ज्ञात हुआ हो, उनकी व्याप्ति का ग्रहण होता है और जिनका सहचार ज्ञात नहीं हुआ उनकी व्याप्ति का ग्रहण नहीं होता। इस अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सहचारदर्शन ही व्याप्तिज्ञान में हेतु है, यह लाघव से सिद्ध होता है। इसलिये सहचारदर्शन में ही व्याप्ति का प्रयोजकत्व है। भूयोदर्शन या सकृद्दर्शन उसमें प्रयोजक नहीं है।

अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः ] अनुमानपरिच्छेदः १६३

इस रीति से अनुमिति में व्याप्तिज्ञान करण होने से उसे ही अनुमानत्व है। यह सिद्ध कर अब वेदान्त-सिद्धान्त में नैयायिकों की तरह अनुमान का त्रिविधत्व ( तीन प्रकार ) स्वीकार नहीं किया है, इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—

'तच्चानुमानमन्वयिरूपमेकमेव, न तु केवलान्वयि। सर्वस्यापि धर्मस्यास्मन्मते ब्रह्मनिष्ठात्यन्ताभाव-प्रतियोगित्वेन अत्यन्ताभावाप्रतियोगि-साध्यकत्वरूप-केवलान्वयित्वस्याऽसिद्धेः।

**अर्थ—**और वेदान्तमत में वह अनुमान अन्वयिरूप एक ही है। केवलान्वयि नहीं। क्योंकि हमारे मत में समस्त धर्म, ब्रह्मनिष्ठ अत्यन्ताभाव के प्रतियोगी होने से, जिस अनुमान का साध्य, अत्यन्ताभाव का अप्रतियोगी हो ऐसे केवलान्वयी की असिद्धि है।

**विवरण--**नैयायिक केवलान्वयि, केवलव्यतिरेक ओर अन्वयव्यतिरेकि भेद से तीन प्रकार का लिंग ( हेतु ) मानते हैं। किन्तु वेदान्त सिद्धान्त में अन्वयिरूप एक ही लिङ्ग का स्वीकार किया गया है। अन्वयिरूप का अर्थ है अन्वयमुख व्याप्तिज्ञानरूप।

**शंका—**नैयायिकों के बताये हुए लिंग के तीन भेद लोक में प्रसिद्ध हैं, तब आप एक ही प्रकार का अनुमान किस तरह स्वीकार कर रहे हैं?

**समाधान—**नैयायिकों के पहले भेद का निराकरण 'न तु केवलान्वयि'-ग्रन्थ से किया है। नैयायिकों के कथनानुसार—केवलान्वयि-लिंग हमें मान्य नहीं है। हम तो अन्वयिरूप एक ही लिंग मानते हैं। क्योंकि उनके स्वीकृत केवलान्वयि लिंग का साध्य, अत्यन्ताभाव का अप्रतियोगी होता है, अर्थात् केवलान्वयि लिंग का साध्य, कभी भी अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी नहीं हुआ करता। ( केवलान्वयि लिंग के साध्य का अभाव


१. अनुमानत्रैविध्यमपि नैयायिकवत् वेदान्तिनां मते नास्ति। नैयायिकास्तु अनुमानं त्रिविधम्-अन्वयव्यतिरेकि केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि चेति वदन्ति। तत्र साधनसत्त्वे साध्यसत्त्वमन्वयः, तन्मूलिका या व्याप्तिः, सा च अशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यरूपा, तन्मात्रमूलकं यदनुमानं तत् केवलान्वयि। साध्याभावे साधनाभावो व्यतिरेकः, तन्मूलिका व्याप्तिः व्यतिरेकव्याप्तिः, सा च साध्याभावव्यापकसाधनाभावप्रतियोगित्वरूपा, तन्मात्रनिबन्धनमनुमानं केवलव्यतिरेकि। उभयव्याप्तिमूलकमनुमानमन्वयव्यतिरेकि। तत्र 'सर्वं वाच्यं प्रमेयत्वात्' इति प्रथममनुमानम्। 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्' इति द्वितीयमनुमानम्। 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' इति तृतीयमनुमानम्।

मीमांसकास्तु--व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानेन नानुमितिः, साध्याभाव-साधनाभावयोर्व्याप्तिग्रहेण कथं साधनेन साध्यान्मानं भवेत् ? अतोऽन्वयिरूपमेकमेवानुमानं, नान्वयव्यतिरेकि केवलव्यतिरेकि वानुमानं किञ्चिदस्तीति वदन्ति। तन्मीमांसकमतमेव मनसि निधाय ग्रन्थकारः 'तच्चानुमान'मिति वर्णयति।

१६४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः

कभी नहीं रहता )। परन्तु हमारे मत में ऐसा कोई साध्य पदार्थ ही सम्भव नहीं है। क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इस श्रुति से ब्रह्मातिरिक्त समस्त वस्तुओं में ब्रह्मनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगित्व रहता है। अर्थात् ब्रह्म रहने वाला समस्त वस्तुओं का जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता समस्त वस्तुओं में है। (ब्रह्म में कोई भी द्वैत वस्तु नहीं होती) इस कारण अत्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यक ऐसे केवलान्वयित्व की सिद्धि नहीं हो पाती।

इस प्रकार नैयायिकाभिमत तीनों लिङ्गों में केवलान्वयी रूप पहले भेद का निराकरण कर केवल-व्यतिरेकी रूप दूसरे भेद का निराकरण करते हैं—

नाप्यनुमानस्य व्यतिरेकि-रूपत्वम् । साध्याभावे साधनाऽभाव-निरूपित-व्याप्तिज्ञानस्य साधनेन साध्यानुमितावनुपयोगात् । कथं तर्हि धूमादावन्वय-व्याप्तिमविदुषोऽपि व्यतिरेक-व्याप्तिज्ञानादनुमितिः ? अर्थापत्ति-प्रमाणादिति वक्ष्यामः ।

अर्थ-- केवलव्यतिरेकि-अनुमान भी नहीं हो सकता (अनुमान में केवलव्यतिरेकि रूपता भी नहीं है) क्योंकि साध्य के अभाव में साधनाभाव निरूपित व्याप्तिज्ञान का, साधन के द्वारा साध्य की अनुमिति कर्तव्य होने पर (करनी हो तो) कोई उपयोग नहीं है।

शंका— धूमादि हेतु के होने पर अन्वय व्याप्ति का ज्ञान न रखने वाले व्यक्ति को भी व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से ही अग्नि की अनुमिति कैसे हो जाती है ?

समाधान— वह अनुमिति अर्थापत्ति प्रमाण से होती है यह हम आगे बतावेंगे ।

विवरण— व्यतिरेक-व्याप्ति ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अनुमिति का कारणत्व हो, व्यतिरेकित्व है। नैयायिकों ने व्यतिरेकव्याप्ति का परिष्कृत लक्षण किया है— 'साध्याभावव्यापकीभूताभाव-प्रतियोगित्वं-व्यतिरेकव्याप्तिः' साध्य का अभाव जहाँ हो वहाँ नियम से रहने वाला जो साधन का अभाव, उसका प्रतियोगित्व ही व्यतिरेक व्याप्ति कहलाती है। यथा—साध्य (अग्नि) का जहाँ अभाव रहता है वहाँ साधन (धूम) का भी अभाव रहता है। इसलिये धूम, साध्याभावव्यापकीभूत अभाव का प्रतियोगी होता है। उसका इस प्रकार प्रतियोगी होना (जहाँ वह्नि का अभाव हो वहाँ धूम का भी अभाव रहना) ही व्यतिरेकव्याप्ति है। धूम का सत्त्व (अस्तित्व) यदि हो तो वह्नि का भी सत्त्व (अस्तित्व) रहता है। इस कारण, व्याप्य (धूम) व्यापक (वह्नि) की कल्पना हो सकती है। परन्तु दो अभावों का कार्यकारणभाव और व्याप्यव्यापकभाव इसके विपरीत रहता है। यथा—जहाँ जहाँ वह्नि का अभाव रहता है, वहाँ वहाँ धूम का भी अभाव रहता है। इस कारण साध्य जो अग्नि, उसके अभाव से,