भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 482 में से

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पृष्ठ 219

व्याप्तिलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १६१

व्याप्तिश्च^१ अशेष-साधनाश्रयाश्रित-साध्य-सामानाधिकरण्यरूपा । सा च व्यभिचारादर्शने सति सहचारदर्शनेन गृह्यते । तच्च सहचारदर्शनं भूयो दर्शनं सकृद्दर्शनं वेति^२ विशेषो नादरणीयः, सहचारदर्शनस्यैव प्रयोजकत्वात् ।

**अर्थ—**अशेष साधनों का जो आश्रय, तदाश्रित जो साध्य, उससे हेतु का जो सामानाधिकरण्य—यही व्याप्ति है। और उस व्याप्ति का ग्रहण, व्यभिचार के अदर्शन के साथ सहचार के दर्शन से होता है। उस सहचारदर्शन में भूयोदर्शन या सकृद्दर्शन रूप विशेष का कोई आदर नहीं है क्योंकि उस व्याप्ति में प्रयोजक सहचारदर्शन ही है।

**विवरण—**व्याप्तिस्वरूप क्या है? यह प्रश्न है। उसका उत्तर यह है कि—'अशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यम्' इसका अर्थ इस प्रकार है—अशेष = समस्त, साधन = धूम, के आश्रय = पर्वत आदि, के आश्रित = अग्न्यादि साध्य, के साथ हेतु (धूम) का सामानाधिकरण्य हो जिसका रूप है, वह व्याप्ति है। इसी का निकृष्ट लक्षण इस प्रकार है—'साधनतावच्छेदकावच्छिन्नसाधनाश्रयाश्रितसाध्यतावच्छेदकावच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यरूपा'। इस लक्षण का समन्वय इस प्रकार होगा। 'वह्निमान् धूमात्'—इस अनुमिति में धूम, साधन है। साधनता, धूमनिष्ठ है। साधनता का अवच्छेदक धूमत्व है। उस धूमत्व से अवच्छिन्न (पर्वत, चत्वर आदि भिन्न-भिन्न स्थान के साधनरूप) धूम व्यक्तियाँ हैं। उनकी आश्रय पर्वत आदि पदार्थ हैं, उन्हीं का आश्रय की हुई, साध्यतावच्छेदकरूप वह्नित्व से अवच्छिन्न वह्नित्वरूप साध्य व्यक्तियों, के साथ धूमव्यक्तियों का सामानाधिकरण्य (पर्वतादि समान अधिकरण पर वृत्तित्व) होना ही व्याप्ति का स्वरूप है। अर्थात् पर्वत आदि पक्ष पर, धूम और अग्नि का होना 'यत्र-यत्र धूमः तत्र-तत्र वह्निः' इस आकार का जो सामाधिकरण्य (एकाधिकरणवृत्तित्व) वही व्याप्ति का स्वरूप है। इस प्रकार व्याप्ति का लक्षण करने से, किसी एक वह्न्यादि साधन व्यक्ति के आश्रय महानसादि में रहनेवाले किसी


१. ननु व्याप्तिज्ञानं न संभवति, व्याप्तिग्राहकाऽनिरूपणात् । न च तर्कः व्याप्तिग्राहकः, तर्कस्यापि व्याप्तिमूलकत्वेन तस्यापि तर्कापेक्षायामनवस्थानात् न च सहचारदर्शनं तद्ग्राहकम्, सकृत् असकृद् वा सहचारदर्शने सत्यपि व्यभिचारज्ञाने सति व्याप्तिग्रहाभावः, इत्यतो व्याप्तिस्वरूपं प्रतिपादयति साचेति ग्रन्थेन । व्यभिचाराज्ञाने साध्यवदन्यवृत्तित्वज्ञानाभावे सति । तस्मात् व्यभिचाराऽदर्शनसहकृत-सहचारदर्शनस्यैव व्याप्तिज्ञानहेतुत्वमवगन्तव्यम् । एतेन "कार्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न न दर्शनात् ।" इति बौद्धोक्तं तादात्म्य-तदुत्पत्त्योर्व्याप्तिग्राहकत्वं निराकृतं भवति ।
२. 'सकृद्दर्शनं भूयोदर्शनं वेति'-इति पाठान्तरम् ।
११ व० प०